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Purpose of festivals - in the present references. त्यौहार एवं व्रत का उद्देश्य- वर्तमान परिपेक्ष में|

 त्यौहार एवं व्रत का उद्देश्य- वर्तमान परिपेक्ष्य में|
श्रीमती कल्पना व्यास उज्जैन
हमारे देश में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक बिना लिंग भेद के, उत्सव- त्योहार का आगमन जन मानस को बड़े ही आनंद और उल्लास से भर देता है, जितना बड़ा त्यौहार उतना बड़ा आनंद का अवसर होता है| 
 यूँ तो वर्ष भर प्रतिदिन कोई न कोई व्रत और त्योहार सनातन धर्म में सम्मलित है| पूर्व काल से ही, वर्षाकाल में अनेक प्राकृतिक समस्यायें विशेषकर आवागमन की, कृषि कार्य भी लगभग कम हो जाता है, इसके चलते अधिकांश व्यक्ति, विशेषकर महिलाओं के पास खाली समय अधिक रहता था|
यह प्रमाणित है कि "खाली दिमाग शैतान का घर". 
इसलिए जैसा की कहा जाता है की "व्यस्त रहो मस्त रहो"|

जब व्यस्तता नहीं होगी तब अनावश्यक विचार मष्तिष्क (खुराफातें) में उत्पन्न होंगी जिससे अनावश्यक संकट, विरोध आदि होने लगेंगें| अतः एक प्रकार से त्योहार व्यस्त रखने के एक प्रबल रास्ता रहा है|

Is there anything else more important, than matching the horoscope for marriage?

Is there anything else more important, than matching the horoscope for marriage?
 विवाह निश्चित करने के लिए, जन्म पत्रिका मिलाने से अधिक जरुरी, कुछ और है?
औदीच्य वैवाहिकी विज्ञापन सेवा
पिछले दो तीन दशक से जन्म कुंडली मिलाने का चलन, चरम सीमा पर है, आज “पड़े-लिखे” जो स्वयं को विद्वान समझते हें वे भी कुंडली मिलान को प्राथमिक आवश्यकता मान रहे हें| जबकि 30 40 वर्ष पूर्व अधिकांश विवाह कार्य बिना कुंडली मिलाये किये जाते रहे है, में स्वयं और मेरे हम उम्र अन्य कई मित्र भी बिना जन्म पत्रिका मिलाये विवाह कर आज भी सुखी जीवन जी रहे हें| जबकि पिछले एक दशक से जन्म पत्रिकाएं मिलाने के बावजूद भी कई युवा युवती संतान हीनता, तलाक, अलगाव,  अथवा कडुवाहट भरा जीवन जीने के लिए विवश है|  

“ठाकुर सुहाती या चापलूसी स्वीकार न करने पर “औदीच्य बंधू” मासिक इन्दोर के सम्पादक मंडल में परिवर्तन संभावित?

जनवरी औदीच्य बंधू का डिजिटल एडिशन प्रस्तुत है विचारने योग्य इस लेख के साथ-
“ठाकुर सुहाती या चापलूसी स्वीकार न करने पर “औदीच्य बंधू” मासिक इन्दोर के सम्पादक मंडल में परिवर्तन संभावित?

औदीच्य बंधू  जनवरी 17 डिजिटल अंक 
औदिच्य बंधू मासिक पत्रिका का दिसमबर के बाद अब पुन: जनवरी 17 का नव वर्ष का नया अंक सम्पादक मंडल के नामों से रहित, अपने आप में विशेष हैI दिसम्बर के पिछले अंक से ही पूर्व सम्पादक मंडल प्रमुख सर्व श्री ओंम ठाकुर, संपादक सर्व श्री धर्मेन्द्र रावल, सर्व श्री उद्दव जोशी प्रबंध संपादक सर्व श्री मनमोहन ठाकर जी के नाम उनकी जगह देखने नहीं मिले प्रमुख संपादक श्री ओम जी के सत्य को इंगित करता हुआ लेख दिसंबर अंक में देखा गया था, नई पुन: पीड़ा के साथ लिखा गया स्वतंत्र कलम से लिखा गया शायद अब अंतिम लेख हो सकता हैI
जैसा की सभी जानते हें की पिछले दिनों अखिल भारतीय औदिच्य महासभा अध्यक्ष के चुनाव आर्थिक धरातल पर वर्चस्व की भावना स्थापित करने के उद्देश्य से लादे गए थे, जिन्हें महत्वाकांक्षियों ने अपने पक्ष में कर लिया थाI इसके बाद अगले चरण में स्वतंत्र पत्रिका औदिच्य बंधू जिसके जन्म के लिए महासभा की कोई भूमिका नहीं हैI

उज्जैन में सहस्र औदीच्य समाज की "वरिष्ठजन समिति" एक प्रेरणा|

उज्जैन में सहस्र औदीच्य समाज की "वरिष्ठजन समिति" एक प्रेरणा| 
    यह बात कही है 1 नवम्बर 2015 को भोपाल में आयोजित प्रथम परिचय सम्मेलन के अवसर पर श्री हीरालाल जी त्रिवेदी, आयुक्त सूचना विभाग भोपाल ने अपने उद्बोधन में|
  अपने कहा ‘‘सहस्त्र औदीच्य समाज वरिष्ठजन समिति उज्जैन समाजहित के आयोजन संपादित कर रही है जो प्रेरणास्पद और अनुकरणीय है।
   सहस्त्र औदीच्य समाज वरिष्ठजन समिति उज्जैन व्दारा की जा रही कल्याणकारी गतिविधियों की जानकारी अ.भा. औदीच्य महासभा के मुख पत्र ‘‘औदीच्य बन्धु‘‘ के माध्यम से प्रस्तुत की जा रही है । 
      सम्पूर्ण भारत वर्ष में पंजीकृत एवं शासन से मान्यता प्राप्त एक अशासकीय संगठन ‘‘सहस्त्र

समय पे जो मिल जाये भय्या, वह ही भाग बनाय|

समय पे जो मिल जाये भय्या, वह ही भाग बनाय|

वर्तमान में विवाह योग्य कन्याओं की कमी ने युवको के लिए युवतियों के विकल्प कम किये हें, फिर भी युवक [या लड़के वाले?] भाव खाते हें| -
कुछ लिखने का प्रयास है क्षमा सहित- डॉ मधु सूदन व्यास







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महासभा अध्यक्ष माननीय श्री रघुजी की मान प्रतिष्ठा को अपूर्णीय क्षति? -प्रबोध पंड्या उज्जैन|

महासभा अध्यक्ष माननीय श्री रघुजी की मान प्रतिष्ठा को अपूर्णीय क्षति?
 -प्रबोध पंड्या उज्जैन|
काश! राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को इन लोगों ने अँधेरे में ना रखा होता?
महासभा की साधारण सभा में घटित असाधारण दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर हर कोई अपना पक्ष रख रहा है|  श्री मुकेश जी जोशी की ''आंखों देखि''  कुछ को सटीक तो कुछ को अनर्गल लगी|

अ. भा. औदीच्य महासभा की साधारण सभा के घटनाक्रम का सही एवं तथ्यात्मक विवरण -प्रस्तुत कर्ता - रमेश पण्ड्या, उज्जैन

अ. भा. औदीच्य महासभा की साधारण सभा के घटनाक्रम का सही एवं तथ्यात्मक विवरण
प्रस्तुत कर्ता - रमेश पण्ड्या,  उज्जैन


     औदीच्य बन्धु के माह फरवरी 2015 के अंक में समाज के बन्धुओं व्दारा अपने अपने ढंग से  अ. भा. औदीच्य महासभा की बैठक दिनांक 11 जनवरी 2015  के घटनाक्रम पर प्रतिकियांए व्यक्त की गई है। कुछ प्रतिक्रियांए पूर्वाग्रह से ग्रसित थी,   तथा एक बन्धु व्दारा अपनी बौध्दिक शक्ति का पूर्ण उपयोग व्यक्ति विशेष की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से ही प्रतिक्रिया व्यक्त की गई। प्रतिक्रिया विशेष जिसमें स्पष्ट तौर पर मेरा नाम उल्लेखित किया गया है,  पूर्णतः असत्य एवं समाज को भ्रामक जानकारी देने वाली प्रतिक्रिया तो है ही वहीं दूसरी और मेरी एवं समाज  के वरिष्ठजनों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने की कुचेष्टा है।

महासभा अध्यक्ष(औदीच्य ब्राह्मण समाज) के चुनाव में बड़ी -छोटी सम्भावाद|

महासभा अध्यक्ष(औदीच्य ब्राह्मण समाज) के चुनाव में बड़ी -छोटी सम्भावाद|
अखिल भारतीय औदीच्य महासभा के चुनाव 11 जनवरी 15 में हुए हंगामें के विषय में एक बात शोध में हमारे सामने आई है, वह यह की चूँकि श्री रघुनन्दन जी शर्मा छोटी सभा के हैं इसलिए उन्हें नहीं बनाने देना| हालाँकि
यह भी सही है की बड़ी सभा के बहुत से सदस्य और  प्रभावशाली इस छोटी बड़ी संभा भेद को नही मानते|
इस परिस्थिति में में यह बात बता देना आवश्यक समझ्र रहा हूँ, की सभी समाज जन जिनमें बड़ी सभां के लोग भी सम्मलित हें, वे स्वयं नहीं जानते की बड़ी संभा कहाँ से उत्पन्न हुई, |

भारत रत्न और हम-निरन्तर सिंह पण्ड्या.

भारत रत्न और हम
मित्रो,
 भारत रत्‍न हमारे देश का उच्‍चतम नागरिक सम्‍मान है, जो कला, साहित्‍य और विज्ञान व अन्य क्षेत्रो में अपनी साधारण सेवा के लिए तथा उच्‍चतम स्‍तर की लोक सेवा को मान्‍यता देने के लिए प्रदान किया जाता है। किन्तु मेरी राय में इस देश का हर वह नागरिक जो देश की प्रगति में इमानदारी से कार्य कर, देश को आर्थिक और वैश्विक रूप से बलवान बना रहा हो, देश की गति व उद्दार के लिए कार्य कर रहा हो, असल माइने में वह ही भारत रत्न है| जिसके लिए उन्हें किसी तमगे की जरुरत नहीं है|  
किन्तु देश की विडम्बना यह है, की भारत की आजादी के बाद से आज तक कुछ राजनितिक दल अपने फायदे के लिए भारत रत्न  जेसे उच्‍चतम नागरिक सम्‍मान को उनके ही कुछ चित-परिचित, नाते-रिश्तेदारों को दे देते है| किन्तु असल में भारत रत्न तो हर भारतीय के दिल का वो जज्बा है, जो भारत की आन बान शान के लिए कुछ भी कर गुजरने को प्रेरित करता है|  
इस सम्मान को पाने वाले वे लोग होते है, जिनके जीवन का एक ही लक्ष्य था एक ही उद्देश्य था, और उसे पाने के लिए वे अपने जीवन में आने वाली बाधाओं को दृढ निश्चयी होकर लांघते हुए अपने लक्ष्य को आत्मसात कर गए| जो लोग अपने चित्त को चारों और बिखेर कर कार्य करते है, उन्हें सेकड़ो वर्षो तक सफलता का मूल्य मालूम नहीं होता, अतः अपने जीवन का लक्ष्य स्पष्ट रखें, और अपने कार्य को पूर्ण हृदय से निष्ठा पूर्वक निडर होकर ना सिर्फ किताबी कीड़े बनकर बल्कि इस संसार के व्यावहारिक जीवन के गुणों को अपना कर अपना लक्ष्य हासिल करे|
जो व्यक्ति इन गुणों को अपनाकर देश के विकास में अपना अमूल्य योगदान देता है, वो ही भारत रत्न है|  

निरन्तर सिंह पण्ड्या
 Er Nirantar Singh Pandya
 ( दोंदवाडा,दोतरडी)

9685013001
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दोराहे पर खड़ा है औदीच्य समाज!- क्या सपने टूट जायेंगे?

दोराहे पर खड़ा है औदीच्य समाज!- क्या सपने टूट जायेंगे?
 अखिल भारतीय औदीच्य महासभा का शुभारंभ आषाढ क्रष्णपक्ष 10 संवत 1960 सन 1903 में मथुरा में हुआ था।  सौ वर्षों के इस इतिहास में लगभग सभी महासभा अध्यक्षों के कार्यकाल में कुछ न कुछ होता ही रहा है।
1903 से वर्ष 2014  तक महासभा के कई सम्मेलन या बेठकें हुई, पर जो उपलब्धि विगत चार वर्षों में, (वर्ष २०१० से २०१४ तक)  उल्लेखनीय कार्य हुए, एसा पूर्व में कभी नही हुआ था। वर्ष 2009 से अखिल भारतीय औदीच्य महासभा के अध्यक्ष पद पर श्री रघुनन्दन जी शर्मा के सर्व सम्मति से निर्वाचित होने के पश्चात, महासभा जैसे सोते से जग उठी।  नए परिवर्तन, विकेन्द्रीकरण के अंतर्गत प्रादेशिक और जिला इकाइयों का गठन, महिला एवं युवा प्रदेश और जिला इकाइयो का गठन, अभूतपूर्व सदस्यता अभियान, कई साधारण ओर विशेष सभाओं का केंद्र, प्रादेशिक और जिला स्तर पर आयोजन कई एतिहासिक निर्णय, गुजरात के औदीच्य बंधुओं को जोडेने का कार्य, समाज से संबन्धित पुस्तक श्रीस्थल प्रकाश” का हिन्दी अनुवाद प्रकाशन,आदि, 2013 के अंत तक सम्पन्न हुए। वर्ष 2014 के प्रारम्भ में बहू प्रतिक्षित अखिल भारतीय औदीच्य महासभा का लंबित और संशोधित पंजीयन का काम सम्पन्न होना बड़ी उपलब्धि रही है। 

वर्चस्व की लड़ाई में नेतृत्व का कर्तव्य ।


 वर्चस्व की लड़ाई में नेतृत्व का कर्तव्य । 
   युग परिवर्तन के साथ समाज सेवा भी व्यावसायिकरण की और गति कर रही है।  अभी तक समाज सेवा के क्षेत्र में माना जाता रहा है, की समाज सेवा, सम्पूर्ण समाज को दिशा देने का एक सार्थक प्रयत्न है, अत: समाज सेवकों को सम्मानित किए जाने की परंपरा हो गई। उन्हे मंच पर आसीन कर गुणगान कर शाल-श्रीफल, उपाधियों, आदि विविध प्रकारों से सम्मानित किया जाता देख, अनेक व्यक्तियों में महत्वाकांक्षा का जन्म होने लगा। उन सभी का समाजसेवा के प्रति उत्साहित होना भी एक स्वाभाविक भी था। 

कार्तिक पूर्णिमा और गोविन्द माधव जयंती की शुभकामनाये.

जय गोविन्द माधव
आज कार्तिक पूर्णिमा अर्थात हम सब औदीच्य ब्राह्मणों के गुजरात सिद्धपुर आने की वर्ष ग्रंथि| इस दिन की याद् हम अपने इष्ट देव भगवान गोविन्द माधव की जयंती के रूप में आयोजित करते हें. आज से लगभग एक हजार छब्बीस वर्ष पूर्व उत्तर दिशा से आये ब्राह्मण जो उदीच्य ब्राहमण कहाते थे| सिद्धपुर आकर सहस्र औदीच्य ब्राह्मण कहाने लगे| कालांतर में मुस्लिम आक्रमण कारियों के गुजरात आक्रमण, परिवार बड़ने आजीविका प्राप्ति हेतु अपनी महाराजा मूलराज सोलंकी द्वारा प्रदत्त ग्राम और जागीर को छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा| जो देश के विभिन्न भागों विशेषकर तीर्थ क्षेत्रों में स्थापित हुए|
देव दुर्देव से विपत्ति के कारण हम सबका वैदिक ज्ञान निरंतर अभ्यास की कमी और नई पीडी को न मिल पाने से नष्ट प्राय हो गया| पिछले पांच विशेषकर २०० वर्ष पूर्व की दासता ने और भी रहा सहा नष्ट कर दिया| आज हमारे पास ब्राहमण कहलाने लायक केवल नाम रह गया है| हालाँकि वैदिक ज्ञान के अतिरक्त अन्य ज्ञान की प्राप्ति में समाज ने विश्व में अपना विशेष स्थान पाया है, इस बात का प्रमाण हमारे कई विद्वतजन वैज्ञानिक, शोधकर्ता, आदि हें|
एक बात और जो हमको एक सूत्र में बांधती है वह है, कुलदेवी, इष्ट देव आदि की आराधना| हम गुजरात से चलकर छोटे बड़े कई समूहों में अलग अलग ग्राम, शहरों में पहुंचे, जहाँ आजीविका की प्राथमिकता ने सब कुछ अन्य पीछे छोड़ दिया, हम अपने इष्टदेव गोविन्द माधव से दूर क्या हुए उन्हें भुला बैठे|
अब जबकि हम सक्षम हें, संपन्न भी हें,  और अब अधिक संख्या में भी हें, तो हमको अपनी विरासत अपनि संतानों को देनी ही होगी| कार्तिक पूर्णिमा पर हम भगवान गोविन्द माधव की जयंती मना कर संगठन इस महत कार्य को पूरा कर रहे हें, हमारी आने वाली पीडी हमारे प्राचीन गौरव को जाने, ही नहीं उसको जीवन में उतारकर पुन: समाज में श्रेष्टता स्थापित कर सके, और राजा और राज्य का सिर मोर बनकर रहे, फिर अब तो राजा तलवार के जोर पर न बनकर वोट के जोर पर बनते हें तो हम सब भी संगठित होकर स्वयं शासक प्रशासक या नियंत्रक बन कर गोरव स्थापित क्यों न करें|

भगवान गोविन्द माधव जयंती के इस अवसर पर और अनेक अवसर तलाश कर, हम इसी तरह एकत्र हों, यह संगठन आगे बढाएं, वह शक्तिशाली बने इसी भावना के साथ सभी को शुभ कामनाएं|        
डॉ मधु सूदन व्यास 
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नवरात्रि व्रत का महत्व और वास्तविकता।




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‘ नो उल्लू बनाविंग ‘‘

‘ नो उल्लू बनाविंग ‘‘

   आज कल बडे जोर शोर से धूम मचा रहा है एक स्लोगन ‘‘ नो उल्लू बनाविंग‘‘ क्यों कि हम सब एक दूसरे को कहीं न कहीं उल्लू बनने/बनाने में लगे है। इस विज्ञानमय जगत में हर आदमी तत्काल हाजिर जवाब देकर कह देता है कि ‘‘नो उल्लू बनाविंग‘‘।

॥श्रीस्थल प्रकाश को घर-घर का प्रकाश बनाएँ॥

श्रीस्थल प्रकाश को समाज के घर-घर का प्रकाश बनाएँ। 
सहस्रौदीच्यों के गौरव की गाथा अगली पीढ़ी भी गायें ॥
उज्जैन से बाहर श्रीस्थल प्रकाश प्राप्त करने हेतु  श्रीस्थल प्रकाश ग्रन्थ  हेतु-
एक पुस्तक = रु- 150+25 रजि पोस्ट खर्च) कुल रु- 175/
10+2  = 1500+ पोस्टेज अतिरिक्त लगभग 100/- कुल रु=1600/- 
50+10 =  रु 7500+ अतिरिक्त पोस्टेज  व्यय लगभग 300/- रु कुल रु=7800/-
  राशि बेंक ड्राफ्ट/ मनीआर्डर अथवा सीधे अखिल भारतीय औदीच्य महासभा मध्यप्रदेश शाखा 
 पंजाब नेशनल बेंक उज्जैन, अकाउंट नंबर Punb 2963000103121857 / में जमा करें
 ई-मेल- audichyamp@gmail।com/
 अपना पिन कोड सहित पता एवं राशि जमा कर सूचना देवें। 
संपर्क - फोन नं-0734-2514343/ 0734-2515677 पर सूचित अवश्य करें।
 प्रकाश दुबे- 41 विध्या नगर उज्जैन मप्र 
श्रीस्थल अर्थात सिद्धपुर नाम है, उस स्थान का जहाँ से सहस्त्रोदीच्य ब्राह्मणो को पहचाना गया था, विश्व में उनकी विद्वता और ज्ञान का सम्मान किया गया था। आज एक सहस्र वर्ष में हम एक करोड़ से अधिक होकर विश्व के प्रत्येक भाग में स्थापित होकर अपने ज्ञान से उस देश को सम्पन्न बनाने में सतत अपना योगदान कर रहे हें। नई जगह नया समाज नये संघर्ष के साथ पीढ़ी-दर पीढ़ी हम खो भी देते हें,"कुछ गौरव के पल" जो हमारे अतीत गौरव के इतिहास को स्मरण रखकर इस माध्यम से ही चिरजीवी रखा जा सकता है।

जीवन संघर्ष रत वे जाति जो अपना इतिहास सुरक्षित रखती हें वे ही ठहर पातीं हें। एक नेत्रहीन व्यक्ति की तरह अल्पसंख्यक और शांति प्रिय जातियाँ इतिहास के माध्यम से ही अपनी उन्नति का मार्ग टटोल सकतीं हें। वर्तमान दादागीरी, दवंगता, और विद्वत जन के प्रति नित नए हो रहे षडयंत्रों के विरुद्ध शुद्ध, सात्विक और प्रताड़ित जातियों को उनके जींस से प्राप्त ज्ञान, बल, को स्मरण कराने के लिए इतिहास से बढ़कर कोई साधन नहीं है।

दहेज में कार या हाथी बांधा द्वार ?

कन्या और कार
         
          पुत्री परिवार की पावनता, कन्या कलियों की मुस्कार, और बेटी बचपन का संस्कार, जैसे अलंकरणों से युक्त है।  बेटी माँ की गोद से लेकर गोदावरी के किनारों तक अठखेलियाँ करते हुवे पुष्पित,पल्लवित हो,  कन्या का रूप ग्रहण कर लेती है । इसी बेटी पुत्री, कन्या को कवियों, साहित्यकारों,कथाकारों, सन्तो, महन्तों ने मासूम शब्दों,आदर सूचक वर्णनों एवं  उपदेशों से नवाजा है। ‘‘बेटी बेटा एक समान ‘‘ के पाठ का पय पान सभी लोग एक दूसरे को कराने में लगे हैं,  और बेटीयों पर जुल्म की इन्तहा भी  कर रहे हैं। दोनों का  महत्व अपनी अपनी जगह है किसी को समझाने से कोई असर नहीं होगा। समय आने पर परिवार खुद ब खुद इसका एहसास कर लेता है।

होली के शुभ अवसर पर शुभ कामना सहित प्रस्तुत है एक विचार।

होली के शुभ अवसर पर शुभ कामना सहित प्रस्तुत है एक विचार। 
जब भी कोई त्योहार या सुख-दुख के प्रसंग आते हें, तो सभी नजदीकी याद आते हें। देश में रह रहे तो आपस में अकसर मिल ही जाते हें, पर सुदूर रोजी-रोटी, ज्ञान, मान, धन, आदि अनेकों कारणो से विदेशों में निवास कर रहे अपनों की कमी खलती है, और एसा भी नहीं की यहाँ केवल हमको ही यह मिसींग तकलीफ देती है, विदेशों में रह रहे आत्मीयों को भी कष्टकारी होती है। 
यदि एक से अधिक पुत्र या पुत्री किसी माता-पिता के हें, ओर उनमें से एक दो ही बाहर हें तो फिर भी ठीक है, पर जिनके एक या दो संतान ही हें ओर वे दोनों ही विदेश में हें, तो फिर उन माता-पिता के मानसिक कष्ट को समझपाना अन्य के लिए मुश्किल होता है। 

 कष्ट उठाकर बच्चो को ऊंची से ऊंची तालीम दी, अधिक पड़ने के लिए विदेशों में भी भेजा, गर्व से छाती भी फूल गई। जब तक शरीर ने साथ दिया तबतक समाज में बेटे बेटियों की उपलब्धि पर गर्व करते रहे, पर जब शरीर कमजोर हुआ तो  पुत्र पौत्र का सानिध्य सुख की चाह कचोटने लगते है। 

यह बात तो ठीक है, की सभी को मरना तो एक दिन है, ही और कोई पुत्र-पौत्र या कोई खुशी और धन की प्रचुरता भी इसको रोक नहीं सकती, पर अपने नज़दीकियों का विलगाव मौत को ओर भी कष्ट कारी बनाता है। यह भी कोई भुक्त भोगी या किसी को इस कष्ट को उठाते हुए देख कर ही जाना जा सकता है।

विदेशो में रहने वालों के कष्ट भी वे ही जानते हें, हम यहाँ दूर से बेठकर केवल उनको हमेशा सुख उठाते समझते रहते हें, और उनसे कुछ न कुछ पाते रहने की से खुश भी बहुत होते हें। पर उनके लिए दस बीस साल तो ठीक है, पर उनकी नई पीड़ी जो वहाँ विदेशों में पल बड्कर जब वयस्क होती है तब ही उनके माता पिता को भी क्या देश की याद न आती होगी यह समझना भूल होगी। 
हाँ तब तक देर हो चुकी होती है। और कहावत सिद्ध हो जाती है की  "अब पछताए का हौत है जब चिड़ियाँ चुग गई खेत" । 
होली के इस अवसर पर आशा है की पहिले ही समझ लेंगे सब कुछ । 
हौली की शुभ कामना सहित प्रस्तुत है एक विचार।  
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सामाजिक जीवन व्यवस्था का मूलाधार- विवाह संस्कार।


सामाजिक जीवन व्यवस्था का मूलाधार- विवाह संस्कार

    बांसुरी के छिद्रों में बहता हुआ पवन, जैसे मधुर स्वर बन कर बाहर गुंजायमान होता है, उसी प्रकार सनातन धर्म के 16 संस्कारों को जीवन के अलग अलग खण्डों में बाट कर मनुष्य की मानसिक, शारीरिक, आध्यात्मिक शक्ति को विकसित, किया जाता है।

स्वरूचि भोज की अंतव्यथा।

  स्वरूचि भोज की अंतव्यथा - भोजन का अपव्यय रोकना होगा।
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    मेरा जन्म बफे पार्टी के नाम से पाश्चात्य सभ्यता में हुआ। जहां थोडी सी जगह में, कम लोगों को, अच्छी सेवा, सुन्दर सजावट और मधुर स्वाद के साथ मैं अपनी सेवा देता आ रहा था। पश्चिम के लोग तो अपने हाथों से खाना लेकर खाना पसन्द करते हैं! वहां एक दूसरे को परोसने की संस्कृति कभी पनपी ही नहीं!  मंहगे सूट, मंहगे शुज तथा खडे खडे ही खाने की आदत, ने मुझे चलन में ला दिया। एक देश में दूसरे देश के निवासीयों का जब से आवागमन शुरू हुआ तबसे हर देश की संस्कृति और संस्कार दूसरे देशों में अपने पैर जमाने लग गये ! मैं कब हिन्दुस्तान की सरजमी पर प्रगट हो गया, और प्रचलन में आ गया इसका मुझे पता ही नहीं चला! भारत की सरजमी पर आकर मैं गौरवान्वित तो हूं, क्योंकि यहां जो संस्कृति, संस्कार, प्रेम और परिवार है, वैसा अन्य किसी देश में मुझे देखने को नहीं मिला। यहां आकर मैं स्वयं को अकेला महसूस कर रहा हूं, क्योंकि मेरे अन्य सहोदर जो भारत वासियों को पत्तलों पर प्रेम भाव के साथ भोजन कराते थे, मेरे आगमन से धीरे धीरे विलुप्त होने लगे।

मन में संजोए सपने, आए थे युवा सारे, देकर नई दिशाएँ, उज्जयनी समाज ने संवारे।

मन में संजोए सपने, आए थे युवा सारे, देकर नई दिशाएँ, उज्जयनी समाज ने संवारे।
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औदीच्‍य ब्राहमण समाज उज्‍जैन, व्‍दारा परिचय की परम्‍परा को लगातार पिछले 14 वर्षो से जीवन्‍त बनाये रख कर, संख्‍याधिक अभिभावकों के परिवारों में खुशी, बेटियों के मांग में सिन्‍दूर तथा बेटों के सपनों को साकार किया है। सम्‍मेलन में आये प्रत्‍याशियों का कहना है कि हमने अपने जीवन साथी चयन के लिए जो सपने संजोये थे, उन्‍हे परिचय के माध्‍यम से समाज ने साकार स्‍वरूप दिया। 
 पूर्व परिचय सम्मेलन समिति द्वारा, इस बार युवा पीढी एवं महिला मण्‍डल की उर्जा का सामयिक सदुपयोग करने हेतु, परिचय सम्‍मेलन की बागडोर, उज्‍जैन नगर के युवा एवं महिला संगठन को जिस विश्‍वास के साथ सौंपी गई थी जो सफल आयोजन से पूर्ण हुई।