मंगलवार, 2 सितंबर 2014

औदीच्य ब्राह्मणो की प्राचीनता और श्रेष्ठता - श्री पं. अमृत वसंत पंडया (पुरातत्व विद)

औदीच्य ब्राह्मणो की प्राचीनता और श्रेष्ठता - श्री पं. अमृत वसंत पंडया (पुरातत्व विद)
 



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औदीच्य बंधु पत्रिका 2014

औदीच्य बंधु सितंबर 2014 















                                                                 





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 सहस्त्र औदिच्य ब्राम्हण समाज के हित में प्रसारित  
अखिल भारतीय औदीच्य महासभा का मुखपत्र 


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औदीच्य बंधु 
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सोमवार, 1 सितंबर 2014

जीवन साथी का चयन - जीवन की एक बड़ी उपलब्धि।


जीवन साथी
  परम पिता परमात्मा ने सृष्टि को प्रकृति, प्रेम, और परिचय से संवार कर मानव जीवन को उर्जा प्रदान की है। प्रकृति ने मानव को सारी सुख सुविधाओं से नवाजा, प्रेम ने मानवीय भावना और अनुभूति को बढाया तो परिचय ने सृष्टि के कण कण को अपनत्व प्रदान किया। सांसारिक कार्यो के लिए साधनों की पूर्ति का मुख्य आधार परिचय है ! हर व्यक्ति अपने  जीविकोपार्जन के सारे सर्व सुलभ साधन एक दूसरे के सहयोग से उपलब्ध करता है किन्तु  अपने बेटे बेटियों के लिए योग्य जीवन साथी का चयन सामाजिक परिचय के बिना संभव नहीं होता है !

रविवार, 31 अगस्त 2014

औदीच्य ब्राह्मण समाज गुना की मासिक बैठक- गोविन्द माधव जयंती पर अनेक कार्यक्रम गुना

औदीच्य ब्राह्मण समाज गुना की मासिक बैठक- गोविन्द माधव जयंती पर अनेक कार्यक्रम
गुना--- समाचार द्वारा डॉ ओ पी व्यास गुना 
      औदीच्य ब्राह्मण समाज गुना की पाक्षिक बैठक का आयोजन सिसोदिया कालोनी में श्री सुरेन्द्र वशिष्ठ के निवास पर डॉ. ओ.पी.व्यास की अध्यक्षता में रखी गयी। बैठक में सदस्यता अभियान पूरा करने और कार्तिक पूर्णिमा 6 नवम्बर को भगवान गोविन्द माधव की जयंती उत्साह के साथ मनाने के लिए समिति के गठन पर विचार किया गया । यह समिति व्यापक प्रचार प्रसार कर सांस्कृतिक कार्यक्रम रांगोली रुद्राभिषेक संध्या वंदन, विप्र समाज के उत्थान पर विचार गरीबों के लिए शीत ऋतू के वस्त्र बांटने आदि कार्य क्रम किए जायेंगे। बैठक में विष्णु प्रसाद वशिष्ठ के निवास पर ब्राह्मण समाज के बच्चों के लिए संस्कार शाला चलाने का प्रस्ताव रखा गया। इसमें युवा प्रोढ़ बुज़ुर्ग वर्ग को पण्डित श्री मान बृज मोहन जी शर्मा द्वारा नैतिक एवं धार्मिक शिक्षा दी जावेगी । समाज की अगली बठक 14 सितम्बर को श्री मान पुरुषोत्तम शर्मा विंध्याचल कोलोनी पर आयोजित की जायेगी . सभी सजातीय बन्धुओं से बैठक में उपस्थित होने की अपील की गयी॥
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शनिवार, 30 अगस्त 2014

Rm 140802 युवक.-खुशवंत रावल बी॰ ए॰ बी॰ एड॰

Rm 140802 युवक.
नाम-                                               खुशवंत रावल  
पिता का नाम-                                 स्व. पन्नालाल रावल

स्वगत-

स्वगत      
स्वगत
डॉ.मधु सूदन व्यास
<http://audichyabandhu.blogspot.com>
क्षमा मांगने का यह अर्थ कदापि नहीं होता की क्षमायाचना करने वाले ने कोई अपराध किया ही हो! यह विनम्रता का प्रतीक है। जो जितना अधिक विनम्र होगा उतना ही अधिक झुकता रहेगा। हरे भरे फलों से लदे ब्रक्ष ही झुकते हें। जो घमंड में चूर होते हें वे शीघ्र ही सूखे पेड़ की तरह गिर कर नष्ट हो जाया करते हें। 

सभी हरे भरे पेड़ों को चाहते हें, वहीं सूखे पेड़ों को शीघ्र हटा देना आवश्यक समझते हें।  
मधु सूदन 
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क्षणिक जोश,अधेर्य,निराशा,और आत्म विश्वास की कमी -ये "नास्तिकता" के चिन्ह हें।
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अपने को बड़ा मान लेने से केवल अपनी ही हानी नहीं होती, उन्नति भी रूक जाती हे क्योंकि ओरों को तुच्छ समझ उनसे कुछ सीख नहीं पाते। 
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बड़े काम की छोटी बातें

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कर्म सरल है ,विचार करना कठिन है !
धर्म सरल है ,सैट धर्म करना कठिन है !
दान करना सरल है ,गुप्त रखना कठिन है !
जग की असलियत जानना सरल है ,इस पर अमल करना कठिन है !
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दूसरो के साथ वह व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसंद नही|


जिन्हें लम्बी जिंदगी जीनी हो, वे बिना कड़ी भुख लगे कुछ भी न खाने की आदत डालें । 


जिसनें जीवन में स्नेह, सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया सचमुच वह सबसे बड़ा कलाकार है । 


 विपरीत परिस्थितियो में भी जो ईमान, साहस और धैर्य को कायम रख सके,वस्तुतः वही सच्चा शूरवीर है 


 कायर मृत्यु से पूर्व अनेको बार मर चुकता है, जबकि बहादुर को मरने के दिन ही मरना पड़ता है



 ईष्या आदमी को उसी तरह खा जाती है, जैसे कपड़ो को कीड़ा । 


 ईमानदार होने का अर्थ है हजार मनकों में से अलग चमकने वाला हीरा । 


 अपनी रोटी-मिल-बाँटकर खाओ ताकि तुम्हारे सभी भाई सुखी रह सके। 


 जीवन का अर्थ है 'समय' जो जीवन से प्यार करते हों, वे आलस्य में समय न गवायें ।


गृहस्थ एक तपोवन है, जिसमें संयम,सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है । 


पाप अपने साथ रोग,शोक पतन ओर संकट भी लेकर आता है 


सार्थक और प्रभावी उपदेश वह है, जो वाणी से नहीं,अपने आचरण से प्रस्तुत किया जाता है । 

अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हो । 


मनुष्य का जन्म तो सहज होता है, पर मनुष्यता उसे कठिन प्रयत्न से प्राप्त करनी पड़ती है । 


अनजान होना उतनी  लज्जा की  बात नहीं, जितनी सीखने के लिए तैयार न होना । 


असफलता केवल यह सिद्व करती है कि सफलता  का प्रयास पूरे मन से नहीं हुआ । 


 देवता आशीर्वाद देने में तब गुँगे रहते हैं, जब हमारा ह्दय उनकी वाणी सुनने में बहरा रहता है ।


सभ्यता का स्वरूप है-सादगी, अपने लिए कठोरता और दूसरों के लिए उदारता । 


योग्यता और परिस्थिति को ध्यान में रखकर महात्वाकांक्षाएँ न गढने वाला दुखी रहता और उपहास सहता है ।


पढ़ने योग्य लिखा जाय,इससे लाख गुणा बेहतर यह है कि लिखनें योग्य किया जाय । 


दूसरो के साथ वैसी ही उदारता बरतो जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती है । 


बुद्विमान वे हैं जो बोलने से पहले सोचते हैं, मूर्ख वे हैं जो बोलते पहले और सोचते बाद में हैं । 


परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी और कर्तव्य परायणों के लिए सुरक्षित है । 


जो बच्चों को सिखाते हैं उन पर बड़े खुद अमल करे, तो यह संसार स्वर्ग बन जाए । 


सबसे बड़ा दीन दुर्बल वह है, जिसका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं । 


अच्छी पुस्तकें जीवन्त देव प्रतिमाएँ हैं । उनकी आराधना से तत्काल प्रकाश और उल्लास मिलता है । 


मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं,वह उनका निर्माता,नियंत्रणकर्ता और स्वामी है । 


आलस्य से बढ़कर अधिक घातक और अधिक समीपवर्ती शत्रु नहीं । 


आय से अधिक खर्च करने वाले तिरस्कार सहते और कष्ट भोगते हैं । 


किसी का सुधार उपहास से नहीं, उसे नये सिरे से सोचने और अदलने का अवसर देने से होता है । 


जो जैसा सोचता और करता है,वह वैसा ही बन जाता है । 


 सज्जन् आमीरी मे गरीब जैसे नम्रऔर गरीबी में अमीर जैसे उदार होते हैं । 


कुकर्मी से बढ़कर अभागा कोई नहीं, क्योकि विपत्ति में उसका कोई साथी नहीं रहता । 


बडप्पन अमीरी में नहीं, ईमानदारी और सज्जनता में सन्निहित है । 


उन्हे मत सराहो, जिनने अनीतिपूर्वक सफलता पाई और सम्पति कमाई । 


प्यार और सहकार से भरा पूरा परिवार ही धरती का स्वर्ग होता है । 


प्रसन्न रहनें के दो ही उपाय है-आवश्यकताएँ कम करें और परिस्थितियों से तालमेल बिठायें । 


काम की अधिकता से नहीं ,आदमी उसे भार समझकर अनियमित रूप से करने पर थकता है ।


जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर है,ईश्वर केवल उन्हीं की सहायता करता है । 


अपनें को मनुष्य बनाने का प्रयत्न करो, यदि इसमें सफल हो गए, तो हर काम में सफलता मिलेगी । 

वेदमूर्ति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा रचित युग निर्माण योजना के अधिकृत 
सद् वाक्य 

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

पारिवारिक समस्याएँ और निवारण।

      पति-पत्नी में झगड़ा होना आज आम समस्या हो रही है। छोटा मोटा हल्का फुल्का विवाद होना तो कोई खास बात नहीं, पर यह झगड़ा अधिक बड जाए और मार पीट तक पहुँच जाए तो यह अति वाद है। 
पुरुष प्रधान हमारे समाज में पुरुष स्वयं को पूर्ण निर्णायक मान कर चलता है। एसे में जरा भी विरोध उसके अहंकार को ठेस पाहुचाने लगता है। वर्तमान में महिलाओं ने भी शिक्षा के क्षेत्र में भी समकक्षता प्राप्त कर ली है।  एसे में जब पती और पत्नी दोनों ही समकक्ष योग्यता धारी हों तो अकसर समस्या और बड़ जाती है। 
वर्तमान में सुख सुविधा की अधिक चाह ने अपने बेटे के विवाह हेतु समकक्ष या अधिकतम योग्यता धारी बहू लाने जिससे अधिकतम सुख के साधन प्राप्त किए जा सकें, लाने की इच्छा पेदा कर दी है। 
विवाहोपरान्त यदि पुरुष का पद और वेतन अधिक है, तब तो अधिकतर ठीक हो सकता है,  परंतु यदि महिला का पद बड़ा या बराबर का हुआ तो महिला भी परिवार में अपना सम्मान पुरुष के समान ही पाने की इच्छा रखने लगती हें। यह गलत भी नहीं है। 

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

प्रत्येक व्यक्ति के चार प्रकार के रहस्य- डॉ मधु सूदन व्यास

स्वयं को पूरी तरह जान लेने से ही व्यक्तित्व का पूर्ण विकास संभव है।
प्रत्येक व्यक्ति में चार प्रकार के रहस्य होते हें।
एक वह जिससे स्वयं सहित सभी परिचित होते हें।
दूसरा जिसे वह स्वयं जानता हें, दूसरा कोई नहीं जानता।
तीसरा  वह जिसे और सब जानते हें, पर वह खुद नहीं जानता।
और चौथा  वह जिसे कोई भी नहीं जानता।
जिस रहस्य को सब जानते हें, उससे व्यक्तित्व विकास में कोई विशेष फर्क नहीं पढ़ता।
जिसको वह स्वयं जानता है,  उससे दूसरे को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।
शासकीय सेवाकाल में मप्र शासन द्वारा प्रशासन प्रशिक्षण
(Administration) हेतु दिल्ली में प्रशिक्षण को दोरान प्राप्त ज्ञान के
 अनुसार यह लेख लिखा गया है। )
चौथा रहस्य जिसे कोई नहीं जानता  उसकी खोज के लिए ही ऋषि मुनि वन में तपस्या किया करते थे, सामान्य जीवन जीने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के लिए इस रहस्य की खोज कर पाना आसान नहीं।

पर उसके जिस तीसरे रहस्य को और सब जानते हें, वह स्वयं नहीं जानता, यदि वह उसको जान पाये तो व्यक्तित्व में परिवर्तन ला सकता है, (जैसे हनुमान अपने रहस्य को जान कर लंका पार कर सके थे।) प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए, कि वह निरंतर इस खोज में लगा रहे , कि दूसरे उसके बारे में क्या अधिक जानते हें, जो वह नहीं जानता । इससे उसका सर्वांगीण व्यक्तित्व का विकास होता रहता है। अपनी शक्ति और सामर्थ्य को जान कर ही कोई विशेष बन जाता है।
बाल्यावस्था में उसकी इस रहस्य शक्ति को माता-पिता और गुरु जानते हें, बाद में उसके मित्र साथी, पत्नी, आदि नजदीकी व्यक्ति ।  ये सब आपको समय समय पर जाने अनजाने आपको सतत इनके प्रति आकर्षित कराते रहते हें, यदि हम समझकर लाभ उठाते हें, तो प्रभावशाली बनते चले जाते हें।
पर जो अहंकार वश में स्वयं को जानना ही नहीं चाहता, वह कूप मंडूक की तरह ही अपना जीवन व्यतीत करता है।

 आत्म चिंतन - डॉ मधु सूदन व्यास
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