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Speech is an art,भाषण देना या सार्वजनिक रूप से बोलना एक कला है|

भाषण देना या सार्वजनिक रूप से बोलना एक कला है|
डॉ मधुसूदन व्यास
   हम किसी को भाषण देते हुए या सार्वजनिक बोलते देखते हें, तब आप एक श्रोता, और समीक्षक होते हें, और वक्ता की कमियों अथवा उससे असहमत होने पर उसका मजाक बनाते हें, आपको लगता है की आप वक्ता से, अधिक और अच्छा जानते हें, तर्क-वितर्क और बहस के दोरान तो आप अपनी बात सिद्ध करने पर तुले रहते हें|  जब

समय पे जो मिल जाये भय्या, वह ही भाग बनाय|

समय पे जो मिल जाये भय्या, वह ही भाग बनाय|

वर्तमान में विवाह योग्य कन्याओं की कमी ने युवको के लिए युवतियों के विकल्प कम किये हें, फिर भी युवक [या लड़के वाले?] भाव खाते हें| -
कुछ लिखने का प्रयास है क्षमा सहित- डॉ मधु सूदन व्यास







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नवरात्रि व्रत का महत्व और वास्तविकता।




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पारिवारिक समस्याएँ और निवारण।

      पति-पत्नी में झगड़ा होना आज आम समस्या हो रही है। छोटा मोटा हल्का फुल्का विवाद होना तो कोई खास बात नहीं, पर यह झगड़ा अधिक बड जाए और मार पीट तक पहुँच जाए तो यह अति वाद है। 
पुरुष प्रधान हमारे समाज में पुरुष स्वयं को पूर्ण निर्णायक मान कर चलता है। एसे में जरा भी विरोध उसके अहंकार को ठेस पाहुचाने लगता है। वर्तमान में महिलाओं ने भी शिक्षा के क्षेत्र में भी समकक्षता प्राप्त कर ली है।  एसे में जब पती और पत्नी दोनों ही समकक्ष योग्यता धारी हों तो अकसर समस्या और बड़ जाती है। 
वर्तमान में सुख सुविधा की अधिक चाह ने अपने बेटे के विवाह हेतु समकक्ष या अधिकतम योग्यता धारी बहू लाने जिससे अधिकतम सुख के साधन प्राप्त किए जा सकें, लाने की इच्छा पेदा कर दी है। 
विवाहोपरान्त यदि पुरुष का पद और वेतन अधिक है, तब तो अधिकतर ठीक हो सकता है,  परंतु यदि महिला का पद बड़ा या बराबर का हुआ तो महिला भी परिवार में अपना सम्मान पुरुष के समान ही पाने की इच्छा रखने लगती हें। यह गलत भी नहीं है। 

प्रत्येक व्यक्ति के चार प्रकार के रहस्य- डॉ मधु सूदन व्यास

स्वयं को पूरी तरह जान लेने से ही व्यक्तित्व का पूर्ण विकास संभव है।
प्रत्येक व्यक्ति में चार प्रकार के रहस्य होते हें।
एक वह जिससे स्वयं सहित सभी परिचित होते हें।
दूसरा जिसे वह स्वयं जानता हें, दूसरा कोई नहीं जानता।
तीसरा  वह जिसे और सब जानते हें, पर वह खुद नहीं जानता।
और चौथा  वह जिसे कोई भी नहीं जानता।
जिस रहस्य को सब जानते हें, उससे व्यक्तित्व विकास में कोई विशेष फर्क नहीं पढ़ता।
जिसको वह स्वयं जानता है,  उससे दूसरे को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।
शासकीय सेवाकाल में मप्र शासन द्वारा प्रशासन प्रशिक्षण
(Administration) हेतु दिल्ली में प्रशिक्षण को दोरान प्राप्त ज्ञान के
 अनुसार यह लेख लिखा गया है। )
चौथा रहस्य जिसे कोई नहीं जानता  उसकी खोज के लिए ही ऋषि मुनि वन में तपस्या किया करते थे, सामान्य जीवन जीने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के लिए इस रहस्य की खोज कर पाना आसान नहीं।

पर उसके जिस तीसरे रहस्य को और सब जानते हें, वह स्वयं नहीं जानता, यदि वह उसको जान पाये तो व्यक्तित्व में परिवर्तन ला सकता है, (जैसे हनुमान अपने रहस्य को जान कर लंका पार कर सके थे।) प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए, कि वह निरंतर इस खोज में लगा रहे , कि दूसरे उसके बारे में क्या अधिक जानते हें, जो वह नहीं जानता । इससे उसका सर्वांगीण व्यक्तित्व का विकास होता रहता है। अपनी शक्ति और सामर्थ्य को जान कर ही कोई विशेष बन जाता है।
बाल्यावस्था में उसकी इस रहस्य शक्ति को माता-पिता और गुरु जानते हें, बाद में उसके मित्र साथी, पत्नी, आदि नजदीकी व्यक्ति ।  ये सब आपको समय समय पर जाने अनजाने आपको सतत इनके प्रति आकर्षित कराते रहते हें, यदि हम समझकर लाभ उठाते हें, तो प्रभावशाली बनते चले जाते हें।
पर जो अहंकार वश में स्वयं को जानना ही नहीं चाहता, वह कूप मंडूक की तरह ही अपना जीवन व्यतीत करता है।

 आत्म चिंतन - डॉ मधु सूदन व्यास
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चिर यौवन का रहस्य।

चिर यौवन का रहस्य।  
 बूढ़ा कोन ?  क्या आयू  अधिक हो जाने से कोई बूढ़ा है?
मेरे विचार से जब भी जो व्यक्ति किसी भी नई बात को सीख नहीं सकता या नया काम नहीं कर सकता दूसरे शब्दो में कहें तो स्वयं को बदल नहीं सकता वह व्यक्ति ही बूढ़ा होता है।  
आयु की अधिकता या परिपक्वता के समय तक, प्रत्येक मनुष्य का अधिकतम विकास होता रहता है। इस परिपक्व आयु के समय जब उसे लगाने लगता है, की उसका काम पूरा हो गया, उसने सब कुछ जान लिया, और अब जानने या करने योग्य कुछ शेष नहीं बचा है, बस यही वह क्षण है, जहां से व्यक्ति बूढ़ा होना शुरू हो जाता है। उसकी तमाम इंद्रियाँ साथ छोड़ने लगतीं हें।
इसके विपरीत जो व्यक्ति हर समय (आयु की परिपक्वता के बाद भी,) कुछ न कुछ सीखने या जानने का प्रयत्न करता रहता है, वह उत्साही चिर युवा बना रहता है।  कहा गया है - मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
यदि हम यह कामना करते रहें, की हम शतायु होंगे, हमारे सुनने देखें की क्षमता बनी रहेगी, हम दीन हीन, पराधीन नहीं, अपना सब काम स्वयं कर सकते हें, मनुष्य की आयु परमात्मा ने सौ वर्ष दी है तो फिर में निश्चय ही सौ वर्ष तक जीवित रहूँगा। तो कोई कारण नहीं की वह बूढ़ा हो जाए।
शरीर विज्ञानियों ने यह सिद्ध किया है, की शरीर की करोड़ों पुरानी कोशिकाएं प्रति क्षण नष्ट होती हें, और उतनी से अधिक पुन: बन जातीं हें। मस्तिष्क के कोषों पर भी भी जितना अधिक दवाव या जौर डाला जाए, उतने ही अधिक संख्या में, अधिक सक्षम और नवीन बनते रहते हें, और इसके विपरीत जितना अधिक आराम उन्हे दिया जाए, काम न होने से वे उतने ही अधिक तेजी से कम, और निर्बल होने लगते हें।
आयु की परिपक्वता के समय भी यही होता है, अधिकतर व्यक्ति कुछ भी नया सीखने जानने या करने के बजाय यह विचार करते हें, की अब बहुत कर लिया अब तो आराम करना  चाहिए, - बस यहीं से उनका बुढ़ापा शुरू हो जाता है, और वे धीरे धीरे निर्बल, पराधीन बुड्ढे होने लगते हें। कई कम आयु के जवान व्यक्ति भी इसी सौच के चलते असमय बूढ़े हो जाते हें।
बुढ़ापे को दूर रखने का सबसे अच्छा उपाय है, की हम हमेशा अपने मन में अपनी युवावस्था की गतिविधियों को सामने रखें, अपने मन को वैसा ही तरोताजा, प्रफुल्लित लचीला अनुभव करें। शरीर की फिजिकल सक्रियता,और मानसिक सक्रियता वनाए रखने के लिए यही सौचें, कि में सब कुछ कर सकता हूँ, और सतत नया करते रहें, सीखते रहें,  तो बुढ़ापा समय अर्थात सौ वर्ष से पहिले आ ही नहीं सकता।      
डॉ मधु सुदन व्यास

26 जुलाई 2014        

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परमात्मा,प्रकृति और पर्यावरण

परमात्मा,प्रकृति और पर्यावरण
    परमात्मा ने अपनी प्रतिकृति के रूप में प्रकृति का निर्माण किया । प्रकृति ने पेड,पौधो,वनस्पतियों के व्दारा धरा को श्रृगारित कर  मानव समाज को पर्यावरण की शुध्दता समर्पित की । वैदिक युग में पर्यावरण के महत्व को जानते हुए पर्यावरण की रक्षा के लिए पूरा मानव समाज समर्पित रहा ,क्योंकि मानव जीवन का अस्तित्व प्रदूषण रहित प्राकृतिक वातावरण से ही था।

‘ नो उल्लू बनाविंग ‘‘

‘ नो उल्लू बनाविंग ‘‘

   आज कल बडे जोर शोर से धूम मचा रहा है एक स्लोगन ‘‘ नो उल्लू बनाविंग‘‘ क्यों कि हम सब एक दूसरे को कहीं न कहीं उल्लू बनने/बनाने में लगे है। इस विज्ञानमय जगत में हर आदमी तत्काल हाजिर जवाब देकर कह देता है कि ‘‘नो उल्लू बनाविंग‘‘।

दूल्‍हा दूल्‍हन मिली गये फिकी पडी बरात !

दुल्हा दुल्हिन मिली गये-फीकी पडी बरात। 
उद्धव जोशी उज्जैन
        पुराने जमाने के बुजुर्ग चर्चा के दौरान नई पीढी को बडे गर्व से बताते हैं कि हमारे जमाने में बारात को वधु पक्ष के साथ गांव वाले भी दो तीन दिन तक रोक कर बडी आव भगत करने के साथ बारात का पूरा पूरा आनन्द उठाते थे ।

      ‘‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले‘‘ के अनुसार आज भी कई लोग धूम धाम के साथ बारात ले जाने की परम्परा को निभा रहे हैं । अब बारात के लिए बस और बस में बैठने के लिए बारातियों की व्यवस्था करना काफी कष्ट प्रद होता है। उसी तरह वधु पक्ष को भी बारात को ठहराने के लिए कमरे,कमरों में बिना सिलवट के बिस्तर,महिलाओं , दूल्हे तथा उसके दोस्तों के लिए अलग से व्यवस्था करने में काफी चिन्तन,मेहनत और मशक्कत करना पडती है । अच्छी व्यवस्था बाराती को तो ‘‘बिना मांगे मोती मिलेे‘‘ जैसी दिखाई देती है । वैवाहिक नाटक का पर्दा उठते ही प्रथम द्रश्य में सबसे पहले ठण्डा पानी पिलाया जाकर गोपनीय चेतावनी दे दी जाती है कि हमने अच्छे अच्छों को पानी पिला दिया आप कौन से खेत की मूली हो । इसके तत्काल बाद मौसम के अनुसार नाश्ता एवं ठण्डा या गरम पेय पदार्थ दिया जाकर बडी आव भगत की जाती है । नाई,धोबी,गुसलखाने आदि की इतनी अच्छी व्यवस्था की जाती है कि बाराती कह उठते हैं वाह वाह क्या बात है। दूल्हे से कहते हैं बच्चू तेरी बारात में आना सदैव याद रहेगा । नाश्ते के बाद भोजन,और फिर प्रोसेशन याने चल समारोह की तैयारी । बाराती भी आव भगत से तरोताजा होकर सजने संवरने की तैयारी करने लगते है। महिलायें साडीयों का सिलेक्शन और पुरूष पहने हुए कपडे में ही अपना सेटिसफेक्शन समझते हैं ।

    बारात के प्रोसेशन में बैण्ड और ढोल की धुन पर महिला,युवा,युवति सभी जम कर डांस करते हैं । लग्न के समय पर बारात वधु के व्दार पर पहुंचे इसमे इनका कोई इन्टरेस्ट नहीं होता है। वधु पक्ष की भी देरी के कारण त्यौंरियां चढने लगती है और यहीं से बारातियों की फजिहत बढने लगती है । जैसे तैसे बारात पहुंचती भी है तो व्दार पर फटाके और डांस की कानफोडू आवाज सबको भयावह कर देती है परन्तु बैण्ड वाले ‘‘ बहारों फूल बरसाओ,मेरा मेहबूब आया है ‘‘ या ‘‘ ले जायगे ले जायगे दिल वाले दुल्हनियां ले जायगें ‘‘ जैसे कर्ण प्रिय गानों के व्दारा वातावरण को बोझिल होने से बचाते हैं । 

    वधु पक्ष के घर बाराती बन कर जाने में बडा उत्साह रहता है , किन्तु दुल्हा दुल्हन का हस्त मिलाप होते ही बाराती न घर का रहता है न घांट का । इसके बाद तो खाना खाया या नहीं, सोने की ,पानी की क्या व्यवस्था है कोई नहीं पूछता और बारातियों का रंग फीका पडने लगता है। वर पक्ष वाले भी सारी रात सर पर लेकर वधु को जल्दी से जल्दी अपने घर ले जाने की तैयारी में रहने के कारण बाराती का बिलकुल ध्यान नहीं रखते है । जिस ताजगी से बाराती बारात में जाताहै, वापसी पर उंनीदा, सुस्त और कमजोर होकर लौटता है ! बाराती की हालत देखने लायक भी नहीं रहती।

    इसीलिए कबीर दास ने बाराती को चेतावनी देते हुए कहा कि ‘‘‘‘दुल्हा दुल्हन मिली गए ,फीकी पडी बारात ‘‘। यदि आप बाराती बन कर कभी गये तो आपके अनुभव में सब कुछ है और पहली बार जा रहे हो तो सोंच समझ कर पहले बारात में गये बाराती से जानकारी और ताजगी भरे नुस्खे ले वर्तमान समय में बारात में जाने का अवसर कम ही मिलता है । वर और वधु पक्ष दोनों मिलकर ही एक स्थान पर वैवाहिक आयोजन कर रहे हैं जो मितव्ययता के साथ समय की बचत और स्वजनों की सुविधा का प्रतिक है। दोनों पक्षों के सदस्य मिल कर व्यवस्था कर लेते हैं इस कारण किसी को भी किसी शिकायत का अवसर नहीं मिलता है । यह समय की मांग भी है । दूल्हे को तो बारात चढना ही है किन्तु बाराती भूल कर भी बस में न चढे ! 


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श्रीस्थल प्रकाश - क्या है?

श्रीस्थल प्रकाश
प्राप्ति स्थान- 
41 विध्या नगर उज्जैन 0734-2514343  एवं MIG 4/1 प्रगती नगर उज्जैन 0734-2519707

श्रीस्थल प्रकाश किंवा (अथवा) उदीच्य प्रकाश जैसा की नाम से जाना जा सकता है, श्रीस्थल अर्थात सिद्धपुर में प्रकाशित होने वाले, उत्तर भारत से आए (उदीची) ब्राह्मणो का संस्कृत वर्णित इतिहास गाथा है। पौराणिक शैली में गुरु- शिष्य संबाद के रूप में दो खंडो में लिखा गया एक महत्व पूर्ण प्राचीन ग्रंथ है।
मूल स्वरूप के इस ग्रथ के रचना कार “ ठाकुर पुरुषोत्तम शर्मा” ने ग्रंथ रचना कब की यह शोध का विषय है। इसका प्रथम गुजराती भाषांतर का प्रकाशन अहमदवाद के श्री ठाकुर प्राण गोविंद राजाराम जी ने किया था। 
श्री ठाकुर प्राणगोविंद जी की प्रेरणा से स्व. श्री शास्त्री अमृतराम करुणा शंकर ठाकर जी ने संबत 1929 (सन 1872) में इस ग्रंथ की अशुद्धियाँ सुधार कर गुजराती भाषांतर तैयार करवाकर प्रकाशित किया था। यह हिन्दी भाषांतर संबत 2058 सन 2002 में प्रकाशित इसी ग्रंथ से, जो हमको श्री अजीत भाई मरफतिया (त्रिवेदी) सिद्धपुर से प्राप्त हुआ था, पर आधारित है।    
सहस्र औदीच्य ब्राम्हणौ से संबन्धित अन्य प्रकाशित पुस्तकों में से प्रमुख रूप से ब्राम्हण उत्पत्ति मार्तंड, औदिच्य रहस्य, गोत्र प्रवर भास्कर, औदीच्य गोत्रावली, औदीच्य रत्न माला, आदि लघु पुस्तकें इसी श्रीस्थल प्रकाश पर आधारित है। 
श्रीस्थल प्रकाश के प्रथम खंड में प्राचीन श्रीस्थल(सिद्धपुर) ओर वहाँ के पावन तीर्थ स्थानो की भव्यता का वर्णन है, द्वितीय खंड या उतरार्ध में दसवीं /ग्यारहवीं सदी, के पाटन(गुजरात) सम्राट मूलराज सोलंकी, का परिचय के साथ प्रायश्चित स्वरूप उनके द्वारा आमंत्रित उत्तर भारत क्षेत्र के तेजस्वी विद्वान शाके 1037 संवत से अधिक ब्राह्मणो के द्वारा अनुष्टान/ प्रायश्चित यज्ञ/ ओर उन्हे ग्राम दान/ ब्राह्मणो के गोत्र, अवतंक आदि आदि का वर्णन है।
वर्तमान हिन्दी भाषी क्षेत्रों में संस्कृत या गुजराती भाषा को जानने की योग्यता न होने से हिन्दी भाषान्तर की आवश्यकता पूर्त्ति के निमित्त इसका प्रकाशन महासभा द्वारा किया जा रहा है। 244 मुद्रित प्रष्ट, छह रंगीन फोटो प्रष्ट, ओर 12 अन्य भूमिका आधी के प्रष्टों से युक्त सजिल्द रंगीन ग्लेज्ड आधुनिकतम दोहरे कवर प्रष्ट से सजी यह 7 ½ गुणा 9 ½ इंच की जिसके मध्य में राजा मूलराज का ऋषि ब्राह्मणो के स्वागत का चित्र, ओर आस-पास विंदुसरोवर, भगवान गोविंद माधव, भव्य विखंडित रुद्रमहालय के काल्पनिक चित्र से सजी हें। अंतिम कवर प्रष्ट पर भग्न रुद्र महालय के चार चित्र के साथ उज्जैन की क्षिप्रा नदी तट पर सिंहस्थ परिद्रश्य है।
 यह आकर्षक ग्रंथ यह कोई कविता कहानी या उपन्यास की तरह रोचक साहित्य तो नहीं है, पर यह कुल दो सो चौसठ प्रष्ट ओर रु 150/- का यह ग्रंथ जो इसका लागत मूल्य है, हिन्दी भाषी औदीच्य बंधुओं के घर में रखा जाकर आगामी पीढ़ी को अपनी गौरव पूर्ण संस्कृति ओर इतिहास से परिचित करवाते रहने का श्रेष्ठ साधन है।
डॉ मधु सूदन व्यास
 एम आई जी  4/1 प्रगती नगर उज्जैन 0734-2519707/ e mail-audichyamp@gmail.com
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जन्‍म पत्रिका बनाम वैवाहिक संबंध

           मानव मस्तिष्‍क सदैव कुछ नया करने की और अग्रसर होता रहता है। इसी कडी में उसके दिमाग ने इस विचार को जन्‍म दिया की भूतकाल की जानकारी हमारे पास मौजूद है, वर्तमान को जीते हुए हम निकट से उसे देख रहे हें, तो भविष्‍य को भी जानना आवश्‍यक है, और जन्‍म समय को  आधार मान कर ग्रह नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार जन्‍म कुण्‍डली बनाई जाने लगी।

नव दम्‍पत्तियों के चूर चूर होते सपने।

तलाक पर लगाओ लाक, दाम्‍पत्‍य जीवन न करो खाक
भावों के स्‍पन्‍दन से गणनायक,प्रथम आपका वन्‍दन है। 
मंगल कार्य विवाह का रिध्दिसिध्‍दी संग आमन्‍त्रण है॥
    16 संस्‍कारों के कल्‍पतरू से विवाह संस्‍कार की उडान भरने वाले नव दम्‍पत्तियों के भावी जीवन को सुखी देखने एवं विवाह कार्य निर्विध्‍न रूप से सम्‍पन्‍न हो इसके लिए माता पिता, सगे संबंधी, गणनायक गजानन को रिध्‍दी सिध्‍दी सहित आने का प्रथम निमन्‍त्रण पत्रिका के माध्‍यम से देते हैं।

शुभ विवाह - कुर्यात सदा मंगलम- लेखकः हेमंतकुमार गजानन पाध्या।

शुभ विवाह
कुर्यात सदा मंगलम।
लेखकः हेमंतकुमार गजानन पाध्या
      विवाह या लग्न मानव जीवनकी एक धार्मिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और वंशीय परंपरा और व्यवस्था हैं । भारतीय तत्वज्ञान और शास्त्रोंके अनुसार विवाह या लग्नको पुरुष या नर और स्त्री या नारीके दो आत्माओंका आध्यात्मिक मिलन या संयोजन माना गया हैं । इसलिये उसे नर और नारी याने शिव और शक्तिके शुभ मंगल, पावन और पवित्र बंधन एवं मिलनकी परिभाषा दी जाती हैं । लग्न या विवाह पुरुष या नर और स्त्री या नारी के सामाजिक और आध्यात्मिक मिलन की प्रक्रिया हैं, जिसमें पुष्ट वय के स्त्री और पुरुष अग्नि-देवता की उपस्थिति में मृत्यु पर्यंत एक साथ सहयोगी बनने की और अपने सामाजिक और धार्मिक कर्तव्यो का पालन करके धर्म, कुल और समाजके प्रति अपना दायित्व निभानेकी प्रतिज्ञा लेते हैं। हमारे आर्य, सनातन या वैदिक धर्म के अनुसार विवाह और उसके पर्यंत प्रजोत्पत्ति को हर पूरूष और स्त्री का धर्म-ऋण और पितृ-ऋण माना जाता हैं। 
जो हर व्यक्ति अपने वंशकी वृद्धि

पर्व-होली-उच्च नीच छुआ छात का भेद भाव भुला कर "सब एक रंग' में दिखना ही होली का असली आनंद हे।


पर्व-होली-अर्थात "सामूहिक श्रमदान से सफाई में जुटना"                                                                 आप सभी को होली की शुभ कामनाये                                                                                                                               मधुसूदन व्यास 
 लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है

अग्निहोत्र चिकित्‍सा

     रोगाणु तो हर जगह है। हर सांस के साथ अरबों खरबों जीवाणु हमारी देह में पहुंच रहे हैं। जब तक हमारी देह के रूधिर में मौजूद प्रतिरोधी कोशिकाऐं इन रोगाणुओं से लडने में समर्थ हें, तब तक हमारा बाल भी बांका नहीं होता। जहां यह रक्षा कवच टूटा की फिर कभी खांसी, काम, म‍लेरिया, पीलिया आदि सैकडों रोग आने लगते है। मनुष्‍य के लिये यह महत्‍वपूर्ण नहीं की वह कितने लम्‍बे समय तक जीवित रहे ।

नित्‍य अग्निहोत्र


       यज्ञ ,दान,तप,कर्म और स्‍वाध्‍याय । यही वेदोक्‍त  सत्‍य धर्म है। आत्‍मविकास के इस साम्राज्‍य के व्‍दार आपके लिए खुले हैं । जिस सर्वोच्‍च नियन्‍ता ने आपका निर्माण किया है उसका स्‍मरण रखें । आयु सीमित है इसलिए अपनी क्षमताओं का सदुपयोग अधिक से अधिक कर लेना श्रेयस्‍कर है। वर्तमान हमारे हाथ में है ,भूतकाल बीत गया,भविष्‍य अज्ञात है । अत वर्तमान के मूल्‍यवान क्षणों को खोना ठीक नहीं ।

अश्लीलता की प्रदर्शन वर्तमान योंन अपराधो की जननी हे।


   पिछले लगभग चार दशक में आई अश्लीलता की बाड ही हमको पतित बना रही हे।  इस मंद पर दीर्घ जीवी इस विष का असर अब तांडव मचा रहा हे, ओर इसका प्रमुख कारण कोई समझ भी नहीं पा रहा हे। कानूनों को कडा करने के साथ कोई इस विष के बारे में भी सोचेगा?
      वर्तमान में चारो ओर से अश्लील ओर वीभत्स घटनाओं के समाचार प्रमुख रूप से देखने मिलते हें। सभी संचार साधन भी इनको चटकारे दार रूप में प्रस्तुत कर रहे हें, ओर प्रमुख रूप से पड़े/देखे जा रहे हें।

ज्ञान पिपासु बनिए।

  आज का मनुष्‍य धनबल और बाहुबल को सर्वश्रेष्‍ठ  मानकर इनकी व्रध्दि करने में दिन रात एक कर रहा है। इस कारण उसका संपर्क अन्‍य विधाओं से कटता जा रहा है और वह अहंकार, ईर्षा, स्‍वार्थ और कपट के कपाट में बंद होकर श्रीहीन  हो रहा है । यदि मानव इन बलों को छोडकर  विध्‍या बल को बढाने में अपने को लगाए तो वह पंच तत्‍वों को अपनी आज्ञा  में करते हुए प्रभावी बन सकता है क्‍योंकि संसार का व्‍यवहार विध्‍या के बल पर ही चल रहा है जिसके पास ज्ञान का बल है वहीं मनुष्‍य है । कहा गया है  विध्‍या रहित मनुष्‍य पशु है ।
   मनुष्‍य के पास बुध्दि है ,जिसका जितना अधिक उपयोग किया जाता है वह उतनी ही अधिक धारदार होती रहती है। संसार में बडे बडे साम्राज्‍यों  की स्‍थापना और विनाश बुध्दि बल के आधार पर ही होता रहा है। ज्ञान प्राप्‍त करने के लिए बुध्दि की आवश्‍यकता होती है ।  भगवान श्रीक्रष्‍ण ने गीता में कहा है कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र वस्‍तु नहीं है। ज्ञान आत्‍मा का सच्‍चा गुण है। 
गरूड पुराण में लिखा है कि‍ -
माता शत्रु पिता बैरी  येन बालो न पठित, न शोभते सभा मध्‍ये ,हंस मध्‍ये वको यथा ।
 हितोपदेश में लिख है कि -
विध्‍या से विनय ,विनय से पात्रता,पात्रता से धन ,धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्‍त होता है। 
विध्‍या प्राप्ति के लिए और भी सुन्‍दर उदाहरण दिया गया है . 
उत्‍तम विध्‍या लीजिए तदपि नीच पे होय ,पडो अपावन ठौर के कंचन तजत न कोय । 
ज्ञान एक महाशक्ति है । यदि आत्‍मा से ज्ञान को निकाल दिया जाय तो आत्‍मा जड बन जायगी । ज्ञान ही सभी शक्तियों का मूल है। संसार में ज्ञान का भण्‍डार भरा हुआ है और जीवन बहुत छोटा है । सारा ज्ञान अपने जीवन काल में प्राप्‍त करना कठिन है । ऐसी स्थिति में हंस के समान सार वाले ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए  अर्थात प्रत्‍येक व्‍यक्ति को ऐसा ज्ञान प्राप्‍त करना चाहिए जिसके व्‍दारा वह शारीरिक,मानसिक और आध्‍यात्मिक उन्‍नति करते हुए अपना जीवन सुख पूर्वक बीता सके।  अज्ञान के तिमिर को ज्ञान के सूर्य से मिटाकर अपने व्‍यक्तित्‍व को संवारिये । आचार,व्‍यवहार,सदाचार सब ज्ञान के प्रभाव और बुध्दि के विकास  से ही प्राप्‍त होता है । अत ज्ञाप पिपासु बन कर जहां  और जैसे भी लोक व्‍यवहार ,कला कौशल विज्ञान आदि का ज्ञान मिले उसको प्राप्‍त करने में अपने अमूल्‍य समय को लगाना चाहिए ।
                                                                                                                    उद्धव जोशी



इस साईट पर उपलब्ध लेखों में विचार के लिए लेखक/प्रस्तुतकर्ता स्वयं जिम्मेदार हे| इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

तिलक का महत्‍व

          तिलक अनेक प्रकार के होते हैं । तिलक रहस्‍य नामक पुस्‍तक में इस पर विस्‍तार से लिखा गया है। 
ब्रम्‍हा को बडपत्र जो कहिये,विष्‍णु के दो फाड। 
शक्ति की दो बिन्‍दु कहिये, महादेव की आड।।
 ब्रम्‍हार्पण हेतु किया गया तिलक तीन अंगुली से पूरे ललाट पर बारम्‍बार किया जाता है , विष्‍णु के उपासक उर्घ्‍व तिलक दो पतली रेखा में करते हैं 1 शक्ति के उपासक दो बिन्‍दी .शिव और शक्ति. लगाते हैं तथा महादेव के भक्‍त त्रिपुण्‍ड करते हैं ।
  
 ब्रहमवैवर्तनुराण में लिखा है,
स्‍नानं दान तपो होमो, देवतापित्रकर्म च। 
तस्‍सर्वं निष्‍फलं याति, ललाटे तिलकं बिना॥ 
 अर्थात तिलक के बिना सभी जातियों के होम, तपस्‍या, स्‍नान, देवता पूजन,पित्रकर्म एवं दान निष्‍फल हो जाते है। हिन्‍दू शास्‍त्रों में तो तिलक प्रभा को इतना महत्‍व दिया गया कि राज्‍याभिषेक समारोह का नाम ही राज्‍य तिलक पड गया ।
                तिलक, टीका, बिंदिया या त्रिपुण्‍ड इन सबका सीधा संबंध मस्तिष्‍क से है। मस्तिष्‍क शरीर रूपी साम्राज्‍य का संचालक है। मस्तिष्क  का उपर वाला भाग  प्रमस्तिष्‍क कहलाता है। यह भाग शरीर में आने वाले संवेगों या सूचनाओं  को ग्रहण करता है और शरीर के अंगों को सूचनाऐं भेजता रहता है।  प्रमस्तिष्‍क, मस्तिष्‍क का वह भाग है जो मनुष्‍य को देवता, राक्षस, प्रकाण्‍ड विव्‍दान अथवा मूर्ख बना देता है। यहां पिटयूटरी ग्रन्थि है, जो अन्‍तस्‍स्रावी तन्‍त्र की अधिनायक है । यह कई हारमोन्‍स उत्‍पन्‍न करती है जिससे स्‍मरण शक्ति, द्रष्टि, श्रवण, घ्राण, संवेदना, तथा अन्‍य बहुत सी कियाओं का संचालन होता है। आज्ञा चक्र एक ऐसा चेतना केन्‍द्र है जहां से समस्‍त ज्ञान चेतना और क्रियात्‍मक चेतना का समग्र रूप से संचालन होता है। आज्ञाचक्र ही दिव्‍य नेत्र है । यहां पर तिलक लगाने से आज्ञा चक्र जाग्रत होगा। आज्ञाचक्र जाग्रत होने से  मनुष्‍य की शक्ति  उर्घ्‍वगामी हो जाती है। उसकी ओज और तेज बढ जाता है। तिलक पर भावनात्‍मक श्रध्‍दा होने के कारण व्‍यक्ति का ध्‍यान शरीर के अन्‍य अंगों को छोड कर मस्तिष्‍क पर विशेषत रहेगा जो व्‍यक्ति को स्‍व बोध की ओर ले जाता है। तिलक लगाते ही मस्तिष्‍क में एक प्रकार की तरावट, ठण्‍डक, शान्ति व शीतलता की अनुभूति होती है। चन्‍दन, केसर, कस्‍तूरी,अष्‍टगन्‍ध आदि की सुगन्‍ध के कारण प्रसन्‍नता रहती है। जिस प्रकार परिवार का मुखिया प्रसन्‍न, शान्‍त, समता वाला हो तो परिवार में शान्ति रहती है, वैसे ही मस्‍तक शरीर का मुखिया है , वह शान्‍त प्रसन्‍न हो तो जीवन में शान्ति  व समत्‍व का भाव बढता है। मस्तिष्‍क मेँ रसायन सेराटोनिन तथा बीटाएण्‍डोरफिर की कमी उदासीनता लाते हैं, मनोभावों को प्रभावित करते हैं। तिलक के उपयोग से उपर्युक्‍त रसायनों का स्‍त्राव संतुलित हो जाता है। सामाजिक कार्यक्रमों में तिलक लगाने की परम्‍परा सामाजिक समता की सूचक है जिसमें उंच नीच की दीवार नहीं रहती।  तिलक लगाना सम्‍मान का सूचक है। भारतीय परम्‍परा में कोई भी सम्‍मान तिलक के बिना अधूरा माना जाता है। यात्रा पर प्रस्‍थान करना हो,युध्‍द में जाना हो, विदा करना हो तो सभी प्रकार की शुभकामनाऐं तिलक के माध्‍यम से प्रगट होती है। तिलक लगाने से मन में शान्ति,प्रसन्‍नता,उल्‍लास तथा सफलता का भाव प्रगट होता है। 
                 हमारे ज्ञान तन्‍तुओं का विचारक केन्‍द्र भ्रकुटि और ललाट का मध्‍य भाग है। जब हम मस्तिष्‍क से अधिक काम लेते हैं तो इसी केन्‍द्र में वेदना अनुभव होने लगती है। अत हमारे महर्षियों ने तिलक धारण का विधान किया। चन्‍दन की महिमा सभी वैध्‍य, हकीम डाक्‍टर जानते हैं। मस्तिष्‍क  के केन्‍द्र बिन्‍दु पर चन्‍दन का तिलक  ज्ञान तन्‍तुओं को संयमित व सक्रिय रखता है। ऐसे जातक को कभी सर दर्द नही रहता तथा उसकी मेधा शक्ति  तेज रहती है।
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यज्ञोपवित- उद्धव जोशी ।


  यज्ञोपवित शब्‍द 'यज्ञ' और 'उपवीत' इन दो शब्‍दों से बना है जिसका अर्थ है यज्ञ को प्राप्‍त करने वाला अर्थात जिसको धारण करने से व्‍यक्ति को सर्वविध यज्ञ करने का अधिकार प्राप्‍त हो जाता है।यज्ञोपवित  धारण किए बिना किसी को वेदपाठ  या गायत्री जप का अधिकार प्राप्‍त नहीं होता  है। उपनयन उपर्युक्‍त  संस्‍कार का पर्यायवाची शब्‍द है,जिसका अर्थ होता है ऐसा संस्‍कार  जिसके व्‍दारा बालक को गुरू के समीप ले जाया जाता है।  यज्ञोपवित को ही ब्रहमसूत्र कहते है क्‍योंकि इस सूत्र के पहनने से व्‍यक्ति ब्रहम के प्रति समर्पित हो जाता है। यह बल,आयु और तेज को देने वाला सूत्र है। यज्ञोपवित को व्रतबन्‍ध भी कहा जाता है क्‍योंकि इसके पहनने से व्‍यक्ति अनेक प्रकार के व्रत नियमों में बंध जाता है व द्रढप्रतिज्ञ हो जाता है। इसे मौंजीबन्‍धन संस्‍कार भी कहते हैं क्‍योंकि उपनयन संस्‍कार में मूंजमेखला ब्रहमचारी  के कमर पर बांधी जाती है।
                यज्ञोपवित  स्‍वदेशी  सूत्र से शास्‍त्रीय विधि व्‍दारा हाथ से बनाया जाय यदि ऐसा न कर सकें तो ब्राहमण कन्‍या,सौभाग्‍यवती ब्राहमण स्‍त्री व्‍दारा कराते गये सूत्र से ही यज्ञोनवित को बनाया जाय। ब्रहमचारी तीन धागे वाली जनेउ पहने  व विवाहित पुरूष छह धागे वाली जनेउ पहने,यज्ञोनवित  हमेशा दाये कन्‍धे प यज्ञोपवित टूट जाने पर,घर में किसी की जन्‍म या म्रत्‍यू हो जाने वर ,श्रावणी कर्म,सूर्य चन्‍द्र ग्रहण के बाद,क्षौरकर्म के पश्‍चात स्‍नानपूर्वक विधि के साथ यज्ञोपवित अवश्‍य बदलना चाहिए ।
             यज्ञोपवित में तीन धागे क्‍यो .   त्रिगुणात्‍मक शक्ति से युक्‍त यज्ञोपवित वेदत्रयी ऋग,यजु,साम की रक्षा करती है । यह तीनों लोकों प्रत्‍वी,अन्‍तरिक्ष घ्‍यौ की प्रतिक है। सनातन धर्म में तीन प्रधान देवता हैं ,ब्रहमा,विष्‍णु,महेश। यज्ञोपवित  ब्राहमण,क्षत्रिय, वैश्‍य में सत्‍व रज तक  तीनों गुणों की सगुणात्‍मक  व्रध्दि करते है।  इसके तीन तन्‍तु  बल,वीर्य और ओज को बढाने वाले है।  इन धार्मिक व्‍याख्‍याओं  के अतिरिक्‍त लौकिक व्‍यवहार  में यज्ञोपवित  के तीन सूत्र  व्‍यक्ति को तीन प्रकार  के कर्तव्‍य के प्रति बांधते हैं।  पहला तन्‍तु स्‍वयं के प्रति पूर्णरूप से ब्रहमचारी रहना,रोज गायत्री जपना ,गुरू की सेवा करना,संयमित जीवन जीना, खुद भिक्षा मांगना एवं गुरू ग्रह का भी पालन पोषण करना ।  दूसरा तन्‍तु. माता के प्रति समर्पण एवं कर्त्‍तव्‍य पालन का स्‍मरण कराता है।  तीसरा तन्‍तु पिता के प्रति समर्पण  एवं कर्त्‍तव्‍य निष्‍ठा का बोधक है।
          विवाहित व्‍यक्ति को छह धागे वाला यज्ञोपवित क्‍यों .  ब्रहमचारी का विवाह हो जाने पर उसके कर्तव्‍यों की सीमा  त्रिगुणात्‍मक रूप से और बढ जाती है। इससे1. पहला तन्‍तु पत्‍नी का है । विवाह के पश्‍चात पत्‍नी की सम्‍पूर्ण मान मर्यादा  आजीविका  व रक्षा का दायित्‍व ग्रहस्‍थ व्‍यक्ति का हो जाता है।  व्दितीय तन्‍तु. सासू के प्रति कर्तव्‍य पालन है। तथा त्रतीय तन्‍तु  श्‍वसुर के प्रति निष्‍ठा एवं कर्तव्‍य पालन का स्‍मरण कराता है। यह यज्ञोपवित के छह धागों की लौकिक गवेषणा है। विवाह के पश्‍चात अनेक प्रकार के श्रौत स्‍मार्त  धार्मिक क्रत्‍यों का अधिकारी हो जाता है 1 गुहय सूत्रों के अनुसार  ये कर्म सपत्निक किये जाते है अत इन धर्मानुष्‍ठानों में दो यज्ञोपवित चाहिए।
         यज्ञोपवित कन्‍धे के उपर से आता है और नाभि का स्‍पर्श करता हुआ कटि  तक ही पहुंचे न इससे नीचे और न इससे उपर । इसकी मोटाई सरसों की फली की तरह होना चाहिए।
          ब्रहम ग्रन्थि के बारे में कहा गया है कि संसार में प्राय यह परिपाटी  प्रसिध्‍द है कि जब तक हम किसी वस्‍तु को विशेष रूप से स्‍मरण रखना चाहते हैु तो उसके लिए कपडे में एक गांठ लगा लिया करते हैं । गांठ बांध लेना  ऐसे ही  अर्थ में एक प्रसिध्‍द लोकोक्ति बन गई है । फलत ब्रहमप्राप्ति रूप चरम लक्ष की स्‍मारक की ब्रहमसुचक  यह गन्थि ब्रहमग्रन्थि कहलाती है  ब्रहमग्रन्थि के उपर अपने गोत्र प्रवरादि के भेद से 1,3,5, गांठ  लगाने की कुल परम्‍पराएं होती है1
           लघुशंका के समय जनेउ दायें कान पर लगाये जाने का धार्मिक एवं वैज्ञानिक  महत्‍व है।  ब्राहमण के दाहिने कान में देवताओं  का निवास है  अत पवित्रता के महान केन्‍द्र पर जनेउ रखने का विधान  शास्‍त्रीय मर्यादाओं के अनुकूल है ।
          आयुर्वेद के अनुसार  'लोहितिका' विशेष नाडी दाहिने कान से होकर मनुष्‍य के मल मूत्र व्‍दार तक पहुंचती है।  यदि दक्षिण कान की इस नाडी को थोडा सा हाथ से दबा दिया जावे तो व्‍यक्ति का मूत्र व्‍दार स्‍वत ही खुल जाता है । पाठशालाओं में गुरूजी के व्‍दारा बच्‍चों के कान दबाने पर यह हरकत प्राय देखी जाती है। इस नाडी का अंडकोश से भी सीधा संबंध है। हरणिया नामक बीमारी की रोकथाम  के लिए आज भी डाक्‍टर लोग इस कान को ही नाडी की जगह छेद करते हैं । अत वैज्ञानिक रीति से यह प्रमाणित है कि इस कान को जनेउ व्‍दारा वेष्ठित करने से व्‍यक्ति को मूत्र एकदम साफ व सरलता के साथ आखरी बूंद तक उतर जाता है। तथा व्‍यक्ति को मूत्र संबंधी रोग नहीं होते ।
           दोनों कानों पर यज्ञोपवित के वेष्‍ठन से नाडियं जाग्रत होकर संचेष्‍ट हो जाती है । इस कारण से ऋषि लोग सर्वा्ग रूप से वीर्य का संरक्षण करते थे और यज्ञोपवित की पवित्रता भी बनी रहती थी । दोनों कानों पर यज्ञोपवीत के वेष्‍ठन से  व्‍यक्ति मधुमेह ,प्रमेह,डाइबिटीज व मल मूत्र दोषजन्‍य भयंकर रोगों से बच सकता है।
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