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उज्जैन में सहस्र औदीच्य समाज की "वरिष्ठजन समिति" एक प्रेरणा|

उज्जैन में सहस्र औदीच्य समाज की "वरिष्ठजन समिति" एक प्रेरणा| 
    यह बात कही है 1 नवम्बर 2015 को भोपाल में आयोजित प्रथम परिचय सम्मेलन के अवसर पर श्री हीरालाल जी त्रिवेदी, आयुक्त सूचना विभाग भोपाल ने अपने उद्बोधन में|
  अपने कहा ‘‘सहस्त्र औदीच्य समाज वरिष्ठजन समिति उज्जैन समाजहित के आयोजन संपादित कर रही है जो प्रेरणास्पद और अनुकरणीय है।
   सहस्त्र औदीच्य समाज वरिष्ठजन समिति उज्जैन व्दारा की जा रही कल्याणकारी गतिविधियों की जानकारी अ.भा. औदीच्य महासभा के मुख पत्र ‘‘औदीच्य बन्धु‘‘ के माध्यम से प्रस्तुत की जा रही है । 
      सम्पूर्ण भारत वर्ष में पंजीकृत एवं शासन से मान्यता प्राप्त एक अशासकीय संगठन ‘‘सहस्त्र

Speech is an art,भाषण देना या सार्वजनिक रूप से बोलना एक कला है|

भाषण देना या सार्वजनिक रूप से बोलना एक कला है|
डॉ मधुसूदन व्यास
   हम किसी को भाषण देते हुए या सार्वजनिक बोलते देखते हें, तब आप एक श्रोता, और समीक्षक होते हें, और वक्ता की कमियों अथवा उससे असहमत होने पर उसका मजाक बनाते हें, आपको लगता है की आप वक्ता से, अधिक और अच्छा जानते हें, तर्क-वितर्क और बहस के दोरान तो आप अपनी बात सिद्ध करने पर तुले रहते हें|  जब

एक सन्देश- आपके अपने माता-पिता और बुजुर्ग जो आपसे कहीं दूर रहते हें तो भी आप उनकी मदद कर सकते हें?

एक सन्देश-

आपके अपने माता-पिता और बुजुर्ग जो आपसे कहीं दूर रहते हें तो भी आप उनकी मदद कर सकते हें?

सहायता सहानुभूति की चेन चलाये,!

आपके अपने आपसे दूर रहते हें, और आप उनके काम नही आ पा रहे हें, 
आप उनके सुख दुःख में शामिल होना चाहते हें,, 
उनका अकेलापन दूर करना चाहते हें!

तो ----

आपके आस-पास जो भी अकेले रह रहे, वयोवृद्द हों उनके अकेलापन दूर करने का प्रयत्न करें| विश्वास रखें की आपके अपने जिन तक आप पहुँच न पा रहे हों उन्हें भी इसका लाभ मिलेगा|

वर्तमान में छोटे होते परिवार, एक या दो संतान और वे भी नोकरी आदि कारणों से दूर, जैसे कारणों से वयोवृद्ध पुरुष स्त्रियों और वरिष्‍ठ नागरिकों को अकेले रहना पड़ रहा है इसे में यह एकान्तता उनमें उदासी या अवसाद उत्पन्न कर रही है||

उनमें कुछ भी करने की इच्छा का न होना, बिना वजह रोने लगना, अशांति या खीझ और बिना किसी बात के नाराज होना, नोजवानो और सामने पड़ने वालों को बुरा-भला बोलना, यदि हमको दिखाई दे रहा है तो समझलें की अव उन्हें किसी अपने की जरुरत है|

आप उनके कोई न भी हों तो भी उनसे बात करें, उनको सुने, अपने छोटे बच्चों को उनके साथ खेलने दें| 
इससे उनमें उत्साह उत्पन्न होगा, उनके जीवन के अनुभवों का लाभ आपको और बच्चो को मिलेगा| उनकी स्मरण शक्ति में सुधार होगा, और स्‍मरण शक्ति ठीक होगी, उलझने दूर होंगी, और यदि उनमें मृत्‍यु अथवा आत्‍महत्‍या का विचार और निराशा आ रही है तो दूर हो जाएगा |

सब लोग एसा करने लगें, और समाज में यह चेन या चेतना फेल जाये तो, इसका लाभ आपके अपने उनको भी मिलेगा जो आपसे दूर हें|

सन्देश को शेयर करें, सभी को इस पुण्य के लिए प्रोत्साहित करें, जय हिन्द|

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डॉ मधु सूदन व्यास|

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जीवन साथी का चयन - जीवन की एक बड़ी उपलब्धि।

प्रविष्टि ऑन लाइन भेजने के लिए लिंक 

जीवन साथी
  परम पिता परमात्मा ने सृष्टि को प्रकृति, प्रेम, और परिचय से संवार कर मानव जीवन को उर्जा प्रदान की है। प्रकृति ने मानव को सारी सुख सुविधाओं से नवाजा, प्रेम ने मानवीय भावना और अनुभूति को बढाया तो परिचय ने सृष्टि के कण कण को अपनत्व प्रदान किया। सांसारिक कार्यो के लिए साधनों की पूर्ति का मुख्य आधार परिचय है ! हर व्यक्ति अपने  जीविकोपार्जन के सारे सर्व सुलभ साधन एक दूसरे के सहयोग से उपलब्ध करता है किन्तु  अपने बेटे बेटियों के लिए योग्य जीवन साथी का चयन सामाजिक परिचय के बिना संभव नहीं होता है !

शिव के 10 अवतार।

शिव के 10 अवतार।

विष्णु के 24 अवतार हैं इसी प्रकार शिव के 28 अवतार हें। लेकिन उनमें भी जो प्रमुख है उसी की चर्चा की जाती है। जैसे विष्णु के 10 अवतार और शिव के 10 अवतार।

हनुमान, अश्वत्थामा, दुर्वासा, पिप्पलाद, वृषभ (जैन धर्म के पहले तीर्थंकर) आदि सभी भी शिव के अवतार हैं।

श्रीस्थल प्रकाश हिन्दी भाष्यांतर ग्रंथ का उसके संपादक मण्डल द्वारा, सिद्धपुर गुजरात में भगवान गोविंद माधव के चरणों में समर्पण।

उज्जैन 14 फरवरी 2014

    श्रीस्थल प्रकाश हिन्दी भाष्यांतर ग्रंथ संपादक मण्डल का सिध्दपुर भ्रमण।
सिद्धपुर यात्रा के अन्य  ओर फोटो लिंक 
      इतिहास सदैव भूतकाल की स्मृतियों/ घटनाओं का लेखा जोखा सुरक्षित रखता है, और जिज्ञासु भूतकाल से वर्तमान एवं भविष्य के हितार्थ कुछ संदर्भ खोजने का प्रयास करता है। इसी जिज्ञासा और श्रीस्थल प्रकाश हिन्दी भाष्यांतर ग्रंथ का सिद्धपुर गुजरात में भगवान गोविंद माधव के चरणों में समर्पण हेतु ‘‘ श्री स्थल प्रकाश’’ हिन्दी भाषान्तर ग्रन्थ के सम्पादक गण, श्री प्रकाश दुबे, डॉ मधुसूदन व्यास, उद्धव जोशी, एवं सोहन पण्ड्या व्दारा औदीच्य ब्राह्मणों के पवित्र तीर्थस्थल सिध्दपुर की यात्रा 4 फरवरी से 8 फरवरी तक की गई।

ऐतिहासिक कार्यों के साक्षी बने।

ऐतिहासिक कार्यों के साक्षी बने। अमृत वर्षा का आनंद प्राप्त करें। 
 भारतीय संस्कृति को अक्षुण बनाए रखने वाली, जन-जन को एक सूत्र में बाधे रखने वाले सनातन धर्म  में नैतिक शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित किए जाने वाले "मंदिर" का निर्माण अपने आप में एक बहुत ही महत्व पूर्ण घटना होती है। पर इसके साथ ही यदि  वैदिक संस्कार "यज्ञोपवीत-संस्कार" "संत समागम" ओर जनमानस को झकझोरने वाले कथा-सूत्रों में सजी "श्रीमद-भागवद कथा" का आयोजन भी हो तो स्वार्गिक अनुभूत का अवसर अनायास ही मिल जाता है। 
ग्रामीण क्षेत्र में इस प्रकार के केन्द्रो की आवश्यकता की पूर्ति के लिए, मानस माधुरी पूज्यनिया दीदी माँ श्री हेमलता जी द्वरा यह संकल्प किया जाकर क्रियान्वयन हेतु उठाया यह कदम सारे हिन्दू समाज के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
 तन-मन-धन से इस पुनीत कार्य में सहयोगी बनेगे इस आशा के साथ सभी आमंत्रित हें।  
आइये हम सब मिलकर पावन कार्य में सहयोगी बने। 
डॉ मधु सुदन व्यास ॰



श्रीस्‍थल प्रकाश” हिन्‍दी भाषान्‍तरित ग्रंथ का विमोचन एवं सम्‍मान समारोह सम्‍पन्‍न ।

श्रीस्‍थल प्रकाश” हिन्‍दी भाषान्‍तरित ग्रंथ का विमोचन  एवं सम्‍मान समारोह सम्‍पन्‍न 
उज्जैन, 05/01/214   
 अ॰ भा॰ औदीच्य महासभा म. प्र. इकाई द्वारा एक भव्य ओर दिव्य आयोजन में सहस्र औदीच्यों के शताब्दियों पूर्व रचित ग्रंथ के संस्कृत [बाद में गुजराती] से हिन्दी में भाषांतरित पावन ग्रंथ का लोकार्पण किया गया। महामालव औदीच्य समाज मांगलिक परिसर के विशाल प्रांगण में, सैकड़ों औदीच्य बंधुओं के समक्ष, भानपुरा पीठ के शंकरचार्य श्री दिव्यानन्द जी के आशीर्वाद के मध्य, महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री रघुनन्दन जी शर्मा उपाध्यक्ष श्री उदय सिंग जी पण्ड्या संगठन सचिव

श्रीस्थल प्रकाश - क्या है?

श्रीस्थल प्रकाश
प्राप्ति स्थान- 
41 विध्या नगर उज्जैन 0734-2514343  एवं MIG 4/1 प्रगती नगर उज्जैन 0734-2519707

श्रीस्थल प्रकाश किंवा (अथवा) उदीच्य प्रकाश जैसा की नाम से जाना जा सकता है, श्रीस्थल अर्थात सिद्धपुर में प्रकाशित होने वाले, उत्तर भारत से आए (उदीची) ब्राह्मणो का संस्कृत वर्णित इतिहास गाथा है। पौराणिक शैली में गुरु- शिष्य संबाद के रूप में दो खंडो में लिखा गया एक महत्व पूर्ण प्राचीन ग्रंथ है।
मूल स्वरूप के इस ग्रथ के रचना कार “ ठाकुर पुरुषोत्तम शर्मा” ने ग्रंथ रचना कब की यह शोध का विषय है। इसका प्रथम गुजराती भाषांतर का प्रकाशन अहमदवाद के श्री ठाकुर प्राण गोविंद राजाराम जी ने किया था। 
श्री ठाकुर प्राणगोविंद जी की प्रेरणा से स्व. श्री शास्त्री अमृतराम करुणा शंकर ठाकर जी ने संबत 1929 (सन 1872) में इस ग्रंथ की अशुद्धियाँ सुधार कर गुजराती भाषांतर तैयार करवाकर प्रकाशित किया था। यह हिन्दी भाषांतर संबत 2058 सन 2002 में प्रकाशित इसी ग्रंथ से, जो हमको श्री अजीत भाई मरफतिया (त्रिवेदी) सिद्धपुर से प्राप्त हुआ था, पर आधारित है।    
सहस्र औदीच्य ब्राम्हणौ से संबन्धित अन्य प्रकाशित पुस्तकों में से प्रमुख रूप से ब्राम्हण उत्पत्ति मार्तंड, औदिच्य रहस्य, गोत्र प्रवर भास्कर, औदीच्य गोत्रावली, औदीच्य रत्न माला, आदि लघु पुस्तकें इसी श्रीस्थल प्रकाश पर आधारित है। 
श्रीस्थल प्रकाश के प्रथम खंड में प्राचीन श्रीस्थल(सिद्धपुर) ओर वहाँ के पावन तीर्थ स्थानो की भव्यता का वर्णन है, द्वितीय खंड या उतरार्ध में दसवीं /ग्यारहवीं सदी, के पाटन(गुजरात) सम्राट मूलराज सोलंकी, का परिचय के साथ प्रायश्चित स्वरूप उनके द्वारा आमंत्रित उत्तर भारत क्षेत्र के तेजस्वी विद्वान शाके 1037 संवत से अधिक ब्राह्मणो के द्वारा अनुष्टान/ प्रायश्चित यज्ञ/ ओर उन्हे ग्राम दान/ ब्राह्मणो के गोत्र, अवतंक आदि आदि का वर्णन है।
वर्तमान हिन्दी भाषी क्षेत्रों में संस्कृत या गुजराती भाषा को जानने की योग्यता न होने से हिन्दी भाषान्तर की आवश्यकता पूर्त्ति के निमित्त इसका प्रकाशन महासभा द्वारा किया जा रहा है। 244 मुद्रित प्रष्ट, छह रंगीन फोटो प्रष्ट, ओर 12 अन्य भूमिका आधी के प्रष्टों से युक्त सजिल्द रंगीन ग्लेज्ड आधुनिकतम दोहरे कवर प्रष्ट से सजी यह 7 ½ गुणा 9 ½ इंच की जिसके मध्य में राजा मूलराज का ऋषि ब्राह्मणो के स्वागत का चित्र, ओर आस-पास विंदुसरोवर, भगवान गोविंद माधव, भव्य विखंडित रुद्रमहालय के काल्पनिक चित्र से सजी हें। अंतिम कवर प्रष्ट पर भग्न रुद्र महालय के चार चित्र के साथ उज्जैन की क्षिप्रा नदी तट पर सिंहस्थ परिद्रश्य है।
 यह आकर्षक ग्रंथ यह कोई कविता कहानी या उपन्यास की तरह रोचक साहित्य तो नहीं है, पर यह कुल दो सो चौसठ प्रष्ट ओर रु 150/- का यह ग्रंथ जो इसका लागत मूल्य है, हिन्दी भाषी औदीच्य बंधुओं के घर में रखा जाकर आगामी पीढ़ी को अपनी गौरव पूर्ण संस्कृति ओर इतिहास से परिचित करवाते रहने का श्रेष्ठ साधन है।
डॉ मधु सूदन व्यास
 एम आई जी  4/1 प्रगती नगर उज्जैन 0734-2519707/ e mail-audichyamp@gmail.com
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"श्रीस्थल प्रकाश" का हिन्दी अनुवाद (भाषांतर)।

    सहस्र औदीच्य ब्राह्मण के सिद्धपुर पहुचने की गाथा जो की सदियों पूर्व
संस्कृत लिखित ग्रंथ "श्रीस्थल प्रकाश" का हिन्दी अनुवाद (भाषांतर) है। सभी एक सहस्र से अधिक उदीच्य ब्राह्मणो के गोत्र/प्रवर/कुलदेवी/आदि की जानकारी के साथ उनको मूलराज द्वारा प्रदत्त ग्राम भूमि आदि की जानकारी।
  साथ ही इसमें सम्मलित है, हिन्दी में वर्तमान तक की औदीच्य ब्राह्मण समाज के दुरस्थ स्थानो तक प्रवास/निवास की संक्षिप्त कहानी । 
   यह पुस्तक अखिल भारतीय औदीच्य महासभा के सदस्यों को लगभग आधे मूल्य पर (वास्तविक खर्च मूल्य) पर उपलब्ध होगी। 
    विमोचन स्थल- महामालव औदीच्य समाज मांगलिक परिसर चिंतामण गणेश रोड उज्जैन। 
विमोचन दिनांक-05/जनवरी 2014 
विमोचन पश्चात 
प्राप्त करने हेतु संपर्क फोन- 0734-2519707 / 0734- 2514343    
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सहस्र औदीच्य ब्राह्मण समाज के मप्र विधान सभा के उम्मीदवार (वर्ष 2013)

सहस्र औदीच्य ब्राह्मण समाज के मप्र विधान सभा के उम्मीदवार
1- श्री गोवर्धन उपाध्याय सिरोंज जिला विदिशा मप्र, कांग्रेस से विधान सभा उम्मीदवार हें। .DrJitendra Sharma


2- श्री राजेंद्र जी पांडे को जावरा जिला रतलाम, बी जे पी से 
3- श्री मुकेश जी पण्ड्या बड़नगर जिला उज्जैन  बी जे पी से 

 विधानसभा चुनाव मे भारतीय जनता पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया है, हम सभी औदीच्य ब्राह्मणो को एक जुट होकर प्रत्यक्ष या परोक्ष से रूप से विजयी बनाना है। 
डॉ मधु सूदन व्यास 
उद्धव जोशी 
औदीच्य बंधु वेब 
 धन्यवाद 
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भवन बनाने के समय नीव के मूहूर्त में सर्प व कलश जमीन में क्‍यों डालते हैं?

  • भवन बनाने के समय नीव के मूहूर्त में सर्प व कलश जमीन में क्‍यों डालते हैं?
     हिन्‍दू पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार शेषनाग के मस्तिष्‍क(फण) पर यह सारी प्रथ्‍वी टिकी हुई है । इसलिए ऐक चांदी का सर्प बना कर उसमें शेषनाग की प्रतिष्‍ठा की जाती है और उसे नींव में डाला जाता है। इसके पीछे यह भावना रहती है कि जिस प्रकार से शेष नाग प्रथ्‍वी के अक्षुण्‍ण्‍ा रूप को धारण किए हुए है उसी प्रकार से मेरे इस भवन की नींव भी सर्प के मस्तिष्‍क पर स्थिर रूप से स्‍थापित रहे । भूमि के नीचे पाताल लोक है । पाताल लोक का स्‍वामी नाग है । अत: अशुभ के निवारण के हेतु भी नाग का पूजन किया जाता है। चुंकि शेष नाग का निवास क्षीरसागर माना जाता है, अत: कलश में दूध, दही, घी डालकर क्षीरसागर की कल्‍पना कर, उसे मन्‍त्रों व्‍दारा आवाहित किया जाता है। इस कारण इस विष्‍णु कलश में लक्ष्‍मी के रूप में एक सिक्‍का भी डाला जाता है ।जिसे भी कलश के साथ जमीन में डालते हैं । नींव पूजन का सारा कर्मकाण्‍ड इन्‍हीं मनोवैज्ञानिक तथ्‍यों पर आधारित है ।
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धर्म विषयक - क्या आप जानते हें?

Hinduism related धर्म विषयक 
  • हाथ में कलावा-नाड़ा- या आंटी (एक सूत्र जो पुजा के संकल्प के समय आचार्य बांधते हें) क्यों बंधा जाता है? 
  • हिन्दू धर्म से संबन्धित कोई भी व्यक्ति जब किसी भी कार्य का कोई संकल्प लेता है, तो प्रतीक के रूप में एक कलावा आंटी या नाड़ा बांधा जाता है। मान्यता है की संकल्प पूरा होने तक, इसे बंधा हुआ रखना चाहिए, ताकि संकल्प याद रहे।अधिकतर किसी पुजा/ यज्ञ आदि के लिए पुरोहित/ पण्डित प्रारम्भ में कलाई पर बांधते हें, ओर यज्ञ, पुजा आदि की समाप्ती के साथ ही संकल्प पूरा हो जाता है। अर्थात वह शुभ कार्य कर लिया गया है। 
  • क्या एक बार बांधा कलावा कई दिन तक धारण किया जा सकता है?
  • नहीं धर्म ग्रंथ जिस प्रकार साफ कपड़े, पहनकर शुभ पुजा कार्य का निर्देश देते हें, उसी प्रकार का ही कलावा का निर्देश है, पर जब हम पुजा के बाद उसी दिन या अगले दिन पुन: नए कपढ़े पहनते हें इसी तरह से सूत्र या कलावे को भी प्रतिदिन वस्त्रों की तरह बदलना आवश्यक होता है। यह न केवल धार्मिक विश्वास के लिए वरन् आपके स्वस्थ्य के लिए भी फल दाई होगा।
  • वास्तु विचार से कलावा प्रति दिन बदलना क्या जरूरी है?
  • जी हाँ कलावा सूत (कपास से बना धागा) से बनाता है, जिस प्रकार प्रतिदिन नवीन या स्वच्छ वस्त्र धारण करना अति आवश्यक है, उसी प्रकार से प्रति दिन नवीन ओर स्वच्छ धुला हुआ कलावा धारण करना आवश्यक होता है, चूंकि यज्ञोपवीत की तरह कलावे को प्रतिदिन अच्छी तरह से साफ किया जाना संभव नहीं, क्योकि यह अति कच्चे धागे ओर रंगो की सहायता से बनाता है, जो धोने पर टूट जाते हें, रंग निकल जाता है, ओर निगेटिव ऊर्जा सक्रिय होकर हानी पहूँचाती है। जबकि यज्ञोपवीत का धागा अच्छा होता है, उसे हल्दी से रंगा जाता है, इसी कारण कुछ अधिक दिन तक धारण किया जा सकता है। 

ब्राह्मण समाज विषयक - क्या आप जानते हें?-

  • ब्राह्मण समाज विषयक 
  •  क्या सभी ब्राह्मण ऋषियों की संतान हें?
 सभी ब्राह्मण मूल रूप से सात ऋषियों अंगिरा, भृगु, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, अगस्त्य, तथा कुशिक में   से किसी की न किसी की संतान रहें हें। हम किस ऋषि की संतान थे!  इसका ज्ञान  गोत्रादि विषयक जानकारी से मिलता है।

माँ शक्ति के 52 शक्तिपीठ।

52- शक्तिपीठों का विवरण
डॉ मधु सुदन व्यास॰
आप में से अधिकांश लोग माता के बहुत से शक्तिपीठों का दर्शन कर चुके होंगे या पुराणों आदि के माध्यम से परिचित होंगे। कुछ लोगों ने नवरात्र में या इसके बाद वहां दर्शन, अर्चना करके अपनी मनौती मांगी होगी, लेकिन इन शक्तिपीठों का जन्म कैसे हुआ? यह संख्या में कितने हैं? यह शक्तिपीठ कहां-कहां हैं? इनका महत्व क्या है? आदि प्रश्न के उत्तर में, आइए सबसे पहले यह जानते हैं कि ये शक्तिपीठ कैसे अस्तित्व में आए?

"सहस्रोदीच्य ब्राह्मणों के गोत्रादी" -अपना गोत्र ,प्रवर, कुलदेवी आदि के बारे में जानिए ।

गोत्रादि विषयक 
ज्ञान

View               [ग्राम, पद या अवटंक, गोत्र, संख्या प्रवर, वेद, शाखा, शिव, गणपति, कुलदेवी, भेंरव, आदि]
डॉ मधु सुदन व्यास उज्जैन।
गोत्रादी का ज्ञान
गोत्रादी जानने के लिए 

नामक यह डिजिटल पुस्तक क्लिक कर देखें। 
समझने के लिए भूमिका पढ़ें       
भूमिका 

      जिस प्रकार से हर मनुष्य अपने भविष्य के बारे में जानना चाहता है,  उसी प्रकार वह अपने आदि पुरुषों का गोरव मय इतिहास या भूत काल के बारे में जानने में भी रुचि लेता है। अपने वंश की उत्पत्ति या गोत्र वाली जानने की इच्छा प्रत्येक व्यक्ति की रहती है। हमारे औदीच्य ब्राह्मण समाज में वर्तमान समाज के हर आयु वर्ग विशेषकर आधुनिक शिक्षा प्राप्त नवयुवको को इस बारे में ओर अपने गोत्र, शाखा सूत्र, वंश, अवटंक, आदि के बारे में कम जानकारी है। जब भी विवाह, यज्ञ, मृत्यु संस्कार आदि कर्म कांड के समय जब इसके बारे में पूछा जाता है, तो उन्हे अपने बुजुर्गों की ओर देखना पड़ता है। पर सभी बुजुर्गों को भी इसकी पूर्ण जानकारी अक्सर नहीं होती है।

"सृजन से विसर्जन तक" लेखक श्री अनिल माधव दवे [सोलह संस्कारों का वर्णन] -पुस्तक समीक्षा।

"सृजन से विसर्जन तक"  लेखक श्री अनिल माधव दवे [सोलह संस्कारों का वर्णन] -पुस्तक समीक्षा
 डॉ मधु सूदन व्यास उज्जैन । 
ग्लेज पेपर पर 160 पृष्ठों  की  यह मनोहारी चित्रों
 से सज्जित पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटलबिहारी बाजपयी
द्वारा लिखी भूमिका ओर आशीर्वाद से परिपूर्ण,
 घर, समाज, ओर देश में संस्कारों के वृक्ष को पुष्पित,
ओर पल्लवित करने के लिए एसे साहित्य को अपने
जीवन में स्थान देना ओर अनुकरण करना ही होगा।
मेरा पुस्तक अवलोकन लेख  श्री अनिल माधव दवे की पुस्तक "सृजन से विसर्जन तक" जो की जन्म से मृत्यु तक हिन्दू धर्म के अंतर्गत होने वाले संस्कार जिनसे मनुष्य की मनुष्यता का निर्माण होता हे, के बारे में समाज के हर सदस्य को बताने का एक प्रयास है। में कोई लेखक, समीक्षक या विद्वान न होकर साधारण व्यक्ति की हेंसियत से इसके बारे में कुछ लिखकर, पढ़ने और व्यवहार में लाने की प्रेरणा देने की उद्धेश्य से क्षमा याचना सहित लिखने का साहस कर रहा हूँ। 
  श्री दवे जी ने इस पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा हे कि " संस्कारो के संबंध में हमारे देश में उपलब्ध ज्ञान बिखरा हुआ है। --- आज के समय में उपनयन ओर विवाह संस्कार ही प्रमुखता से शेष है। --- अंत्य-कर्म तो मजबूरी है। उत्तर-क्रिया उपेक्षा व आडंबरों का शिकार हो गई दिखाई देती है। --- सभी संस्कार पुन: प्रारम्भ होने लंगे इस हेतु से प्राचीन संदर्भों के साथ वर्तमान स्वरूप को सरल ढंग से यहाँ लिखने का प्रयत्न किया गया है।" आदि लिखकर सबसे आग्रह किया है, कि "हम स्वयं के परिवार में पल्लवित हो रहे बच्चों में शेष बचे संस्कारों को प्रारम्भ करने का संकल्प लें। परिवार के बुजुर्ग सभी संस्कारों का आग्रह करें, ओर उनके विभिन्न पक्षों को गंभीरता से सम्पन्न करवाएँ" 
  पुस्तक में सोलह संस्कारों को पाँच भागों में विभक्त कर सरल भाषा में समझाया गया है। 
बढ़नगर उज्जैन के औदीच्य ब्राह्मण परिवार
में 1956 में जन्मे, शौक़िया पायलट ,कुशल वक्ता
श्री अनिल माधव दवे राष्‍ट्रवादी चिंतक अनिलजी
 भाजपा के वरिष्‍ठ नेता हैं। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ
के प्रचारक रहे हैं। इन दिनों राज्‍यसभा सदस्‍य
और चरैवेति मासिक पत्रिका के संपादक हैं
। 

  1. सृजन - के अंतर्गत 1- गर्भाधान, 2- पुंसवन, 3- सीमन्तोन्नयन, 4- जात कर्म है। 
  2. संवर्धन के अंतर्गत, 5-नाम करण, 6- निष्क्रमण, 7-अन्नप्राशन, 8-मुंडन व 9-कर्णवेध, 10-विध्यारम्भ है।  
  3. समुत्कर्ष में- 11-उपनयन, 12-वेदारंभ, 13-केशांत, 14-समावर्तन, 15-विवाह, है।
  4. समायोजन के अन्तर्गत केवल 16-अंत्येष्टि का समावेश है। 
  5. स्वस्ति प्रसंग में संकल्प मंत्र, पूजन विधि, स्वस्ति मंत्रों को समाविष्ट किया गया है।   
     प्रथम गर्भाधान संस्कार के अंतर्गत होने वाली क्रियाओं के माध्यम से सभी के मन में सतत उठते प्रश्नो जिन्हे संकोच वश नहीं पूछा जाता,  का  समाधान मिल जाता है।  आजकल अक्सर इस प्रकार की बातें जानने की आवश्यकता सामान्यतया नहीं समझी जाती परंतु इनको समझकर ही अच्छी, निरोगी, बुद्धिमान, संतान पाई जा सकती है। पुस्तक में इस समय प्रयोग किए जाने वाले मंन्त्रो के भाव को समझाया गया है। यह संस्कार वर्तमान में पूर्णत: विस्मृत हो गया है। इसको पुनर्जीवन देना आवश्यक है। 

       गर्भ धारण के सुनिश्चित हो जाने के बाद दूसरे या तीसरे माह में यह  पुंसवन संस्कार किया जाता है।  पुस्तक में इसके प्रयोजन,स्वरूप, विधि कर्म ओर उद्धेश्य का वर्णन बहुत ही अच्छा किया है। वर्तमान में यह संस्कार 'गोद-भराई' के नाम से कई क्षेत्रों में किया भी जाता है, पर स्वरूप संस्कार का नहीं होकर परंपरा का पालन भर के लिए किया जाता है। इसे पढ़कर जानना आवश्यक है।
     सीमन्तोन्नयन संस्कार को  पुंसवन का ही विस्तार बताया है। चौथे पांचवे माह में या गर्भ में चेतना  आने के बाद होने वाला यह संस्कार, गर्भस्थ शिशु को किस प्रकार से ज्ञानवान बनाता है, इसका विस्तार से वर्णन इस खंड में है। महाभारत के आख्यान जो सबने सुना है, कि किस प्रकार अभिमन्यु ने गर्भ में चक्रव्यूहु रचना इसी गर्भ काल में जान ली थी। इस संस्कार के माध्यम से इसका शब्दार्थ ओर पिता को उसकी ज़िम्मेदारी सिखा कर उसे पत्नी को आश्वस्त कर देने का भाव भी उत्पन्न करता है, ताकि वह निश्चिंत भाव से संतान को जन्म दे सके। इसकी सम्पूर्ण जानकारी व्यवस्था विधिक्रम आदि का वर्णन सटीक ढंग से इस पुस्तक में है।
      जात कर्म का यह संस्कार शिशु के जन्म के लिए पूर्व व्यवस्था सूतिका-गृह आदि निर्माण सहित के विचार से किया जाता था। वर्तमान में यह कार्य अब अस्पतालों में पूर्ण सुरक्षित होने लगा है, फिर भी इस संस्कार के बारे में जानने से अस्पताल ले जाने से पूर्व व्यवस्था ओर गर्भणी की मानसिक स्थिति को सामान्य बनाए रखने के लिए इस संस्कार के कुछ अंशों को विधि पूर्वक किया जाने कि आवश्यकता और अधिक है। पुस्तक में बच्चे के जन्म के पूर्व ओर पश्चात् संस्कार विधि-क्रम, ओर उद्देश्य आदि का वर्णन है।
       नामकरण संस्कार तो वर्तमान में कई रूप में देखने मिलता है, परंतु वैदिक पद्धति से होने वाले नामकरण संस्कार का जीवन भर प्रभाव होता है। इसके उदृदेश्यों ओर व्यवस्था की जानकारी इस पुस्तक में उपलब्ध है।
   
       समुत्कर्ष के अंतर्गत अन्य पाँच संस्कार [11-उपनयन, 12-वेदारंभ, 13-केशांत, 14-समावर्तन, 15-विवाह] की आवश्यकता भी पुस्तक पढ़ने पर आसानी से समझ आ जाती है।
     अंतिम संस्कार अंत्येष्टि पर कुशलता से वर्तमान पाखंडो पर प्रहार करते हुए उनकी आवश्यकता ओर विधि व्यवस्था को भलीभाँति समझाया गया है।
  इसी प्रकार से क्रमश: निष्क्रमण,[सूरज पुजा] अन्नप्राशन [सात माह के बच्चे का प्रथम भोजन], संस्कार का जीवन में विशेष महत्व इस पुस्तक में वर्णित है। मुंडन, कर्णवेधन, ओर विध्यारम्भ संस्कार शिशु में संवर्धन कर मनुष्य बनाने के कार्य को किस प्रकार से करते हें ओर उन संस्कारो का महत्व समझने पर ही हम राष्ट्र निर्माता संतान बनाने में सक्षम होंगे इसका ज्ञान आसानी से इस पुस्तक के माध्यम से समझ आ जाता है।
   पुस्तक में कई प्रसंग जेसे विवाह, जिनकी तो है, पर केसे निर्वहन होना चाहिए, का विस्तार से वर्णन मिलता है। 
 
कुल मिलकर पुस्तक हर घर में रखने ओर पढ़ने योग्य है। इसको देखते हुए ग्लेज पेपर पर 160 पृष्ठों  की  यह मनोहारी चित्रों से सज्जित पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटलबिहारी बाजपयी द्वारा लिखी भूमिका ओर आशीर्वाद से परिपूर्ण,  रु-145/- मूल्य की यह पुस्तक बहुत सस्ती है। घर, समाज, ओर देश में संस्कारों के वृक्ष को पुष्पित, ओर पल्लवित करने के लिए एसे साहित्य को अपने जीवन में स्थान देना ओर अनुकरण करना ही होगा। अस्तु । 
पुस्तक विवरण
"सृजन से विसर्जन तक"
 लेखक- श्री अनिल माधव दवे
Published in India by- NEW ERA Publication,[P] Ltd.
6, Press Complex,-1, M P Nagar Bhopal 462011
Manjul Publising House Pvt.Ltd. 
10,Nishar Colony Bhopal- 462003 India. Ph.+91755.4240340/E Mail- manjul@manjulindia.com
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इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

सिंहस्थ 2016 लक्ष्य - महामालव औदीच्य ब्रह्म समाज गार्डन एवं धर्मशाला उज्जैन के लिए सहयोग निमंत्रण ।

महामालव औदीच्य ब्रह्म समाज धर्मशाला
चिंतामन रोड उज्जैन 

ओर फोटो देखें 
 सिंहस्थ 2016 लक्ष्य- महामालव औदीच्य ब्रह्म समाज गार्डन एवं धर्मशाला उज्जैन के लिए सहयोग निमंत्रण।

प्रस्तुत कर्ता- डॉ मधु सूदन व्यास उज्जैन  
   समाज की जनसख्या शहर ग्राम आदि के विस्तार के साथ ही सभी प्रकार की आवश्यकता भी बढ़ती जाती  हे। उज्जैन सिंहस्थ 2004 में औदीच्य ब्राह्मण समाज ने हर सिंहस्थ की भांति ही समाज के तीर्थ यात्रियों सुरक्षा सुविधा ओर व्यवस्था हेतु मेला क्षेत्र में केंप लगाया था। इस केंप का लाभ प्रतिदिन 1000 से अधिक समाज के सदस्यों को पूरे मेला काल जो  लगभग ढ़ेड़ माह से अधिक की अवधि का था, के लिए निशुल्क भोजन [50 हजार से अधिक व्यक्तियों ने लाभ लिया ]  ओर टेंट में आवास की व्यवस्था की गई थी। यह सम्पूर्ण व्यवस्था स्थानीय उज्जैन जिले भर के समर्पित समाज जन, युवा, ओर महिलाओ के सहयोग द्वारा कुशल पूर्वक सम्पन्न की गई थी।

पञ्च-शुण्‍डी गणपति की अदभुत प्रतिमा।

चोसठ योगनियों एवं पञ्च शुंडी गणपती 
के  हर ओर से लिए गए
 चित्र देखें। क्लिक लिंक  
पञ्च-शुण्‍डी गणपति 
की अदभुत प्रतिमा

    उज्‍जैन स्थित चौसठ योगिनी मार्ग नयापुरा में चौसठ योगिनी माता मन्दिर जिसमें 64 देवीयां विराजित होकर सामने सिंह की विशाल की प्रतिमा है। इसी मन्दिर के पिछले भाग में पञ्च-शुण्‍डी गणपति की अदभूत मूर्ति है।
 लाल पाषाण से निर्मित होकर वामन आकार की खडी प्रतिमा, दो मूषक पर विराजित है। इस सुदर्शन प्रतिमा का एक मुंह, पांच सुण्‍ड, एक दंत तथा दस भुजायें हैं। दसों भुजाओं में क्रमश त्रिशुल, अंकुश, गदा, एक दन्‍त, ध्‍वजा, नाग, शक्ति, माला, पुष्‍प, फर्शा[फरसा] तथा लड़डुओ का थाल है।
 यह प्रतिमा अति प्राचीन काल की होकर पहले मुख्‍य व्‍दार के पिछले भाग में स्‍थापित थी, किन्‍तु बाद में उसके डह जाने से  मन्दिर बनाकर वहां स्‍थापना की गई हे। इस अदभुत गणपति की प्रतिमा और चौंसठ योगीनी माताओं के दर्शन से सभी मनोकामनायें पूर्ण होती है।
 यह मन्दिर श्री मनीष जी व्‍यास के स्‍वामित्‍व में है। पुरातत्व विद स्व॰ डॉ वांकणकर के अनुसार भी लगभग दो हजार वर्ष से पूर्व की हे। संरक्षण ओर इनके अद्भुत दर्शन हेतु इस प्रतिमा पर सिंदूर या कोई पैंट आदि नहीं किया जाता हे।
   श्री व्यास जी ने बताया की पंद्रहवी सदी मे उनके पूर्वजो के सिद्धपुर गुजरात से  उज्जैन आने के बाद, खंडहर पड़े इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया था। तभी से इस चोसठ योगनि मान्दिर सहित समस्त परिसर की सुरक्षा, व्यवस्था ओर पूजन आदि की ज़िम्मेदारी व्यास परिवार निर्वाहित कर रहा हे। 
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चिन्‍तकों एवं विव्‍दानों की द्रष्टि में उपवास का महत्‍व।

चिन्‍तकों एवं विव्‍दानों की द्रष्टि में उपवास का महत्‍व -'आत्मिक उत्‍थान के लिए उपवास आवश्‍यक है।

प्‍यूरिंगटन 
यदि आप स्‍वास्‍थ्‍य,यौवन,जीवन का आनंद सौंदर्य,विश्‍वास,शक्ति जैसी अमूल्‍य निधियां चाहते हैं तो उपवास करना होगा । उपवास से मनुष्‍य की नैतिक व आध्‍यात्मिक उन्‍नति होती है। नैसर्गिक बु‍ध्दि जाग्रत होती है और वह प्रेम की विशालता का अनुभव कर पाता है।

यूस्‍टोन माईलस 
कभी कभी एक दिन के लिए उपवास एक उत्‍तम योजना है । इससे संयम और जितेन्द्रियता में सहयोग मिलता है। पाचन क्रिया को विश्राम प्राप्‍त होता है और शरीर में संचित मल को बाहर निकाल देता है।

महात्‍मा गांधी 
यदि कब्‍ज,रक्‍त की कमी,ज्‍वर,अपच,सिरदर्द,वायु के दर्द,जोडों के दर्द,भारीपन,उदासीनता और चिन्‍ता जैसी शिकायतें हो तो अवश्‍य उपवास किया जावे।

 सुश्रुत [आयुर्वेद]
जिस व्‍यक्ति की जठराग्नि मंद पड गई हो और पाचन यंत्र ठीक काम न कर रहा हो तो लंघन का सहारा लेना चाहिए जिससे अग्नि उदीप्‍त होती है और दोष जल जाते हैं।

भाव प्रकाश [आयुर्वेद]
उपवास से भुख बढती है ,शरीर हलका होता है ,जठराग्नि तीव्र होकर रोग नष्‍ट होते हैं ।

डा; अपटन सिक्‍लेयर
उपवास को मैं यौवन की स्थिरता के लिए सर्वोत्‍तम उपाय मानता हूं । उपवास एक प्राक्रतिक विधि है जिसके माध्‍यम से रोग निव्रत होते हैं।

धर्म 
उपवास हमारे धर्म का एक अंग है । आज भले ही धार्मिक विधानों की उपेक्षा हो किन्‍तु यह सर्वमान्‍य तथ्‍य है कि शारीरिक,मानसिक,आत्मिक स्‍वास्‍थ्‍य,बल तथा स्थिरता के लिए उपवास एक प्राक्रतिक वैज्ञानिक प्रणाली है।

उपवास शक्ति का भण्‍डार 
उपवास के माध्‍यम से स्‍वाध्‍याय,मनन,चिन्‍तन, ध्‍यान आदि जो भी साधनाऐं की जाती है वे मन को प्रभावित करती है। हमारे आन्‍तरिक शत्रु जो शारीरिक व आत्मिक द्रष्टि से हमें खोखला बना रहे हैं उपवास से उन पर विजय प्राप्‍त होती है।

अधिक खाने से आलस्‍य और निद्रा अपना डेरा जमा लेते हैं । शरीर व मस्तिष्‍क में भारीपन का अनुभव होता है। भरी वस्‍तु का झुकाव सदैव नीचे की ओर होने से शारीरिक ढांचा अस्‍त व्‍यस्‍त हो जाता है। क्षमता से अधिक भोज्‍य पदार्थ लेना असहय और कष्‍टदायक होता है।

विश्राम प्रक्रति का स्‍वाभाविक नियम है । दिन में कार्य करने से हम जितनी शक्ति का व्‍यय करते हैं ,रात्रि में विश्राम कर उतनी शक्ति को उपार्जित कर लेते हैं। इसी प्रकार यदि पेट को विश्राम नहीं दिया तो वह अस्‍वस्‍थ्‍य हो जावेगा ,शरीर को रूग्‍ण बना देगा और हमारे साथ असहयोग करेगा । इसलिए उपवास के माध्‍यम से पेट के अवयवों को विश्राम देना अति आवश्‍यक है। उपवास केवल जल पर निराहार रहकर भी किया जाता है अथवा दूध,फल,छाछ आदि फलाहारी वस्‍तुऐं ग्रहण कर भी किया जाता है । हमेशा याद रखें,उपवास कर स्‍वस्‍थ्‍य रहें ।
संकलन- उद्धव जोशी
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