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औदीच्य बाणी [वर्ष-2 अंक आठ



औदीच्य ब्राह्मण समाज एक बड़े क्षेत्र में फेला हुआ हे।समाज जन क्षेत्र के अनुसार भाषाएँ बोलने लगें हें। निमाडी भाषा भी पड़ने में तो हिन्दी ही हे,पर बोलने में थोड़ी अलग प्रतीत होती हे। निमाड क्षेत्र की यह पत्रिका इस क्षेत्र के समाज का प्रतिनिधित्व करती हे। 

पत्रिका में समाज के समाचार गतिविधियां, वेवाहिक विज्ञापन, ओर समाज के लिए लेखो का प्रकाशन इसमें देखने मिलता हे। 

औदीच्य बाणी 
औदीच्य बाणी [ वर्ष -2 अंक आठ }

संपादक जी के विशेष आग्रह पर यह डिजिटल पत्रिका प्रस्तुत हे। 
संपादक 
औदीच्य बंधु वेव। 









इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

औदीच्य वाणी [वृहद निमाड औदीच्य ब्रह्म समाज का मुख पत्र ]

 औदीच्य वाणी             20/02/2013 
[वृहद निमाड औदीच्य ब्रह्म समाज का मुख पत्र ]
[ सदस्यता शुल्क वार्षिक-250/ आजीवन 5000/ ]
   बड़ा ही सुखद आश्चर्य हुआ जब आज मुझे कोरियर से इस औदीच्य समाज की एक क्षेत्रीय पत्रिका जो हिन्दी में हे, प्राप्त हुई। सुखद आश्चर्य इसलिए की पिछले दो वर्ष से त्रेमासिक रूप से उज्जैन के इतने पास से प्रकाशित इस पत्रिका हमारी द्रष्टि में नहीं आई। 
   विज्ञापन से रहित प्राप्त 9"बाय11" का 32 प्रष्टों का दीपावली अंक मनोहारी हे। योग संजोग के नाम से वैवाहिक कई युवक-युवतियों की जानकारी से भरपूर स्थाई स्तम्भ तीन प्रष्टों का हे। यह समाज के लिए बहु उपयोगी हे। क्षेत्रीय समाचार, गतिविधियों ओर प्रेरणास्पद लेखों / ओर सूक्तियों से सजा यह अंक प्रकाशको के परिश्रम ओर समाज के प्रति उनके उत्तरदायित्वों के प्रदर्शन का प्रतीक हे। इसकी प्रशंसा की जाना चाहिए। 
  महगाई के इस युग में समाज की पत्रिका प्रकाशित करना जिसमें किसी प्रकार के कोई भी लाभ की आशा नहीं की जा सकती  बड़े साहस का काम हे। यह साहस यह भी दिखाता हे की वे भी समाज के लिए अपनी तरह से 'नया कुछ करने' का माद्दा रखते हें। एसे साहसी ओर परिश्रमी व्यक्तित्वों को केवल प्रशंसा सराहना ही नहीं अपितु सभी प्रकार की वांछित सहयोग भी किया जाना चाहिए। 
जय गोविंद माधव ।




कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

औदीच्‍य समाज के विविध पत्र एवं पत्रिकाएं ।

  गुजरात से आगमन के पश्‍चात औदीच्‍य समाज उत्‍तर भारत, पंजाब, दिल्‍ली, करांची लाहौर, से लेकर राजस्‍थान मालवा, निमाड, मध्‍यप्रदेश, बिहार आदि अनेक स्‍थानों पर फैल गया। समाज को संगठित करने के लिए देश के विभिन्‍न भागों में औदीच्‍य

औदिच्य बंधू





सदस्य बनने के लिए  राशी मनीआडर/ड्राफ्ट से निम्न पते पर भेजे -
 श्री मनमोहन ठाकर 593, स्नेह नगर इंदौर ४५२००४
 0731-2526027  / E Mail <omsindore@gmail.com>


पत्रिका विवरण
औदीच्य बन्धु सार्वजानिक न्यास द्वारा संचालित,
प्रधान  संपादक
-डॉ.ओम ठाकुर
२०५- सुदामा नगर सेक्टर-ऐ इंदौर-९
संपर्क ०७३१-२७९२४५४/मोबा ९९२६०६४६०४
संपादक-               

धर्मेन्द्र रावल
28 चोरासिया सेक्टर सुदामा नगर इंदौर म। प्र।
0731-2795251
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मनमोहन ठाकर 
५९३ स्नेह नगर,इंदौर
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उद्दव जोशी
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 अखिल भारतीय औदीच्य महासभा की मुख पत्र इस पत्रिका को प्रकाशित होते हुए 88 वर्ष हो गए हें | अधिकांश हिंदी भाषी समाज जन इससे अच्छी  तरह से परिचित हे| विचारा जा सकता हे कि इतनी वयोवृद्ध इस पत्रिका ने कई विद्वानों की कलम को अपने में समेटा होगा|  बहुत सारे उतार चड़ाव देखे होगे इसकी मात्र  कल्पना ही  की जा सकती हे| हमारे कई बुजुर्ग महानुभावों का इसको इस स्तर पर ले जाने में अपना योग दान, धन/ समय / अथक प्रयास करके किया होगा और कई रूप बदलते हुए आज भी हमारे सामने सर उठा कर खडी हे | पर आज इसे लोगो की कमी नहीं हे जो की केवल छिद्र देखते हें| बिना देखे ही आलोचना करते हें | समाज की इस सेवा ने आज संपूर्ण भारत के समस्त जाती बंधुओ को एक सूत्र में बांध रखा हे यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा | आज इस पत्रिका के सदस्यों की इतनी सीमित संख्या का होना बड़ा ही खेद जनक विषय हे | नई पीडी समाज के बारे में केसे जानेगी जबकि हम पत्रिका के सदस्य ही नहीं हें | 
वर्तमान पत्रिका का स्वरूप श्री सुशील कुमार की ठक्कर इंदौर के परिश्रम ओर समर्पण का दर्शन हे। पत्रिका का मुख प्रष्ट वर्तमान परिद्रश्य को समेटे हुए, अन्दर का हर प्रष्ठ समाज की गतिविधियों से भरपूर, साहित्य/जन परिचय / निशुल्क प्रकाशित वैवाहिक विज्ञापन और समाज की हर उस बात को सजोये हुए हे जो आज की जरुरत हे | पर भारत भर में मुट्ठी भर के पास इसका पहुच पाना आश्चर्य सा लगता हे | 
इस ब्लाग http://www.audichyabandhu.blogspot.com के माध्यम से हम सभी का ध्यान इसकी और खीचना चाहते हें। क्या हम सबका यह फर्ज नहीं की इसके पाठको की संख्या में वृधि करने का प्रयास करे | मेरा अनुरोध हे की इसके सदस्य बने | आज भी इस पत्रिका का सदस्य अन्य की तुलना में बहुत कम शुक्ल हे। 

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औदीच्‍य ब्राहमण संन्‍दर्भ - इण्डिया आफिस लायब्रेरी लन्‍दन से प्रकाशित सूची ग्रन्‍थो में।



औदीच्‍य ब्राहमण संन्‍दर्भ  - इण्डिया आफिस लायब्रेरी लन्‍दन से प्रकाशित सूची ग्रन्‍थो में। 
उद्धव जोशी।

        संस्‍क्रत साहित्‍य का भण्‍डार विश्‍व साहित्‍य की तुलना में अति व्‍यापक है। संस्‍क्रत साहित्‍य की इस विशाल  राशि की रक्षा के लिए समय समय पर मूल ग्रन्‍थों की पाण्‍डुलिपियों की प्रतिलिपियां मूल रचनाकारों , तत विषयों के विव्‍दानों , व्‍यावसायिक लेखकों, सन्‍यासियों, जैन मुनियों आदि ने समय समय पर संपादित की है।
         संस्‍क्रत साहित्‍य की पाण्‍डूलिपियां भी लाखों में है। ऐसी ही पाण्‍डुलिपियां सुरक्षा भण्‍डारों में पूना का भण्‍डारकर प्राच्‍य शोध संस्‍थान, बडोदरा का गायकवाड प्राच्‍य ग्रन्‍थ शोध संस्‍थान, एशियाटिक सोसायटी कलकत्‍ता, मुम्‍बई एवं लन्‍दन , सिंधिया ओरियन्‍टल शोध संस्‍थान विक्रम विश्‍वविध्‍यालय उज्‍जैन, अडयार प्राच्‍य ग्रंथ संग्रहालय चेन्‍नई, सरस्‍वती महल प्राच्‍य ग्रन्‍थ संग्रहायल सम्‍पूर्णानन्‍द विश्‍वविध्‍यालय वाराणस प्राच्‍य ग्रन्‍थ संग्रहालय पाट, जैसलमेर, त्रिवेन्‍द्रम , मॅसूर आदि देश के प्रसिध्‍द संस्‍थान है । विदेशों में जहां पर सस्‍क्रत  पाण्‍डुलिपियों  के संग्रहालय है उनमें दरबार लायब्रेरी काठमाण्‍डू नेपाल, आक्‍सफोर्ड विश्‍वविध्‍यालय लन्‍दन, एवं इंडिया आफिस संस्‍क्रत प्राच्‍य संग्रहालय लन्‍दन आदि विख्‍यात संस्‍थाऐं हैं।
       यहां यह उल्‍लेखनीय है कि ग्रन्‍थों की प्रतिलिपिकर्ताओं के रूप में ब्राहम्‍ण जाति का वर्चस्‍व  द्रष्टिगोचर होता है तथापि अनेक प्रमाण हैं जो अन्‍य जातियों की इस प्रव्रत्ति की और संकेत करते हैं । ब्राहमणो व्‍दारा निर्मित पाण्‍डुलिपियों  में भी कई विशेषताओं के साथ कहीं कहीं यह तथ्‍य भी उदघाटित  होता है कि उन्‍होने अपनी उपजाति की पहचान भी लिखी है जैसे नागर, मोढ, चतुर्वेदी, सारस्‍वत, औदीच्‍य आदि ।
          यहां ब्राहम्‍णों की उपजाति औदीच्‍य ब्राहमणों  व्‍दारा प्रतिलिपिक्रत पाण्‍डुग्रन्‍थों  का परिचय उपस्‍थापित किया गया है जो इण्डिया आफिस लायब्रेरी  लन्‍दन से प्रकाशित सूची ग्रन्‍थों में उपलब्‍ध है। इन संदर्भो का चयन उक्‍त संस्‍था व्‍दारा प्रकाशित  सात खण्‍डों के आधार पर किया गया है। प्रथम खण्‍ड में औदीच्‍य ब्राहमणों से संबंधित तीन संदर्भ प्राप्‍त होते हैं । ये तीनों वेद और वेदांगों से जुडे हूए हैं। प्रथम औदीच्‍य उल्‍लेख जिस ग्रन्‍थ पर हुआ है वह कर्मकाण्‍ड का है। इस ग्रन्‍थ का नाम उपग्रन्‍थ सूत्र है। उक्‍त ग्रन्‍थ में सामवेद से की जाने जानेवाली धर्म विधियों का विवेचन हुआ है। इसमें 32 पत्र है। यह पाण्‍डुलिपि  देवनागरी में लिपिबध्‍द है। प्रत्‍येक पत्र में 9 पक्तियां है। ग्रन्‍थ समाप्ति पर लिपिकर्ता ने अपने स्‍थान, संवत, मास, वार , उपजाति  एवं स्‍वयं का नाम इस प्रकार प्रकाशित किया है।
---- संवत 1486 वर्षे भाद्रपदवादि। गुरावध्‍येह श्री कर्षढिकास्‍थों,उदच्‍ज्ञातीय पंडित लक्ष्‍मीधरेण लिखिमिंद ।। श्रुभंभ्‍वतु।।  
                       व्दितिय पाण्‍डुग्रंथ् कात्‍यायन श्रौत पर भाष्‍य है। यह भाष्‍य  सहस्‍त्र औदीच्‍य जाति के  प; महादेव व्दिवेदी के व्‍दारा लिखा गया है। इसमें अंकित संवत की संख्‍या से ज्ञात होता है कि ये सन 1676 में लिखा गया था । यह उल्‍लेख करना महत्‍वपूर्ण होगा कि यह ग्रन्‍थ मूल लेखक के व्‍दारा लिखी गई पाणुलिपि है। 
                       इति सहस्‍त्रौदीच्‍य ज्ञाती व्दिवेदी महादेव क्रत कात्‍यायन सूत्र भाष्‍ये व्दितीयाध्‍याय.।।/ संवत सप्‍तदशत्रयस्त्रिंशव्‍दर्षे  श्रावण क्रष्‍ण त्रतियां सौ महादेवने लिखितमिदम ।। 
इ;आ;ला;ंसूची ग्रन्‍थ प्रथम प्रष्‍ठ 65 । 
प्रथम खण्‍ड में ही त्रतीय  औदीच्‍य सन्‍दर्भ जहां  प्राप्‍त होता है,  उससे स्‍पष्‍ट  है कि ओदीच्‍य ब्राहमण ग्रन्‍थों के संग्रह करने में भी अग्रणी थे ।  निघण्‍टु निर्वचन जो निघण्‍टु  पर भाष्‍य है कि पाण्‍डुलिपि उदीच्‍य जातिय पीताम्‍बर नामक ब्राहम्‍ण ने की थी। यह ग्रन्‍थ उनकी संपत्ति था ।  
                 उदीच्‍यज्ञातीयपीतांबरस्‍य निघण्‍टुनिर्वचनपुस्‍तकमस्ति ।। 
इ;अ;ल;सं;सूची ग्रन्‍थ प्रथम प्र;152
       इण्डिया आफिस लायब्रेरी  के खण्‍ड व्दितीस के सूची ग्रन्‍थ में लिंगानुशासन की पाण्‍डुलिपियों में एक ऐसा उदाहरण प्रस्‍तुत होता है  कि मथुरानाथ नामक औदीच्‍य उपनामधारी  ब्राहमण लेखक ने पंडित दामोदर जी के वंशजों के उपयोगार्थ इस ग्रन्‍थ की पाण्‍डुलिपि की थी । 
                     ज्‍योतिषराय जी   श्री पांच श्रीजीची पण्डित दामोदरजी तस्‍य पुत्र चीकंवरजी  दुर्लभरायजी ज्‍योग्‍य पठनार्थ  श्रुभमभवतु लिखिं पं; मथनानाथ उदीच्‍यसोपरना ।  
इ;अ;ल;सं;सूची ग्रन्‍थ खण्‍उ व्दितीय प्र;217
     सूची पत्र के खण्‍ड त्रतीय में मात्र एक ही औदीच्‍य ब्राहमण का संकेत प्राप्‍त होता है। यह संकेत धर्मशास्‍त्र  से संबंध्‍द आचार्य श्रीधरक्रत स्‍म्रत्‍यर्थ सार पर विनियोजित है। यह पाण्‍डुलिपि 480 वर्ष प्राचीन है और यहां यह भी विदित होता है कि रेवातीर निवासी ओडाकाल दास के अध्‍ययन हेतु लिखा गया था । पाण्‍डुलिपिकर्ता  शनिवार एवं स्‍थान के रून में शुक्‍लतीर्थ  काक भी उल्‍लेखकरता  है । शुक्‍लतीर्थ कदाचित  गुजरात प्रान्‍त का सूरत या सिध्‍दपुर नगर हो सकता है । यहां लिपिकर्ता अपने उपनाम कका प्रयोग भी करता है। 
                   संवत 1568 वर्षे फाल्‍गुनमासे क्रष्‍णपक्षेचतुर्थ शनै लिखितं श्री शुक्‍लतीर्थे उदीच्‍यजाति ठाकर
राजऋषिशर्मणालिखितं इद्र पुस्‍तकं।। श्रीरेवातीरे रूंढवास्‍तव्‍य श्री नालज्ञातीय ओडाकलदासमध्‍ययनार्थे।।
इ;आ;ला सं; सूची ग्रन्‍थ‍ि खण्‍ड त्रतीय प्र 471 ।
              अग्रिम संदर्भ में भामती का जो ब्रहमसूत्र शंकर भाष्‍य की व्‍याख्‍या है, सह त्रतीय अध्‍याय मा 9 की पाण्‍डुलिपि है। इसके निर्माता औदीच्‍य ब्राहमण श्री नरहरि के पुत्र पुरूषोत्‍तम है। यह सूचीग्रन्‍थ के चतुर्थ खण्‍ड में संकेतित है। इसका एक लेख संवत 1642 में वैशाख मास शुक्‍ल पक्ष की एकादशी तिथि  एवं सोमवार को पूर्ण किया गया था ।
                         संवत 1642 वरषे वैईशाष श्रुदि एकादश तिथोससौमेंअध्‍येह काछैइ्रवास्‍तत्‍यं उदीच्‍यज्ञाती यमहे श्री नरहरिसुतपूरूषोत्‍तमक्‍येन लिखितं । 
इ;बा;ल;सं; सूची ग्रन्‍थ खण्‍ड चतुर्थ प्र 721 ।।
                     चतुर्थ खण्‍ड में ही दर्शनशास्‍त्र के ग्रन्‍थ  सकल वेदोपनिषत्‍ससारोपदेश सहस्‍त्री जो शंकराचार्य  की क्रति है कि पाण्‍डुलिपि औदीच्‍यब्राहमण जात‍ि के जोशी विश्‍वनाथ व्‍दारा की गई थी ऐसा संदर्भ प्राप्‍त है।
इ;आ;ला;सं;सूची ग्रन्‍थ  खण्‍ड चतुर्थ प्र; 731 ।
                     सुची ग्रन्‍थ  के पांचवे खण्‍ड में मात्र एक ही औदीच्‍य ब्राहमण संदर्भ प्राप्‍त होता है । यह संदर्भ वास्‍तुशास्‍त्र  के भोजविरचित राजवल्‍लभ मण्‍डल ग्रन्‍थ की प्रतिलिपि में  सुरक्षि‍त है। प्रतिलिपिकर्ता ने उल्‍लेख किया है कि कवह नवीनापुर निवासी है। उसका उपनाम दवे है। श्री  दवे ने इस प्रतिलिपि को संवत 1866 मास भाद्रपद,पद्वक्ष शुक्‍ल,तिथि पंचमी एवं वार गुरू के दिन परिपूर्ण की । भाद्रपद माह की शुक्‍ल पंचमी भारतीय पंचाग में ऋषि पंचमी के रूप में प्रसिध्‍द है । संभवत लिपिकार ने ऋषियों  की अर्चना तिथि को इसे समाप्‍त कर ऋषि ऋण से उऋण होने का उपक्रम किया हो ।  
 इ;आ;ला;सं; सूची ग्रन्‍थ खण्‍ड पंचम  प्र; 1136
           सूची ग्रन्‍थ का छठे खण्‍ड में औदीच्‍य संदर्भ अप्राप्‍त है।
        सातवे खण्‍ड में चार औदीच्‍य ब्राहमण्‍उ संकेत प्राप्‍त हुए हैं। इनमें से तीन पाण्‍डु ग्रन्‍थ एक ही परिवार व्‍दारा निर्मित है । उक्‍त तीनों पाण्‍डुलिपियां साहित्‍य ग्रन्‍थों की है । इनमें  प्रथम कालिदास क्रत  रघुवंश पर मोलाचल मल्लिनाथ सूरी क्रत संजीवन टीका है। दूसरे ग्रन्‍थ में इसी लेखक व्‍दारा कुमार संभव के एक से सात पर्यन्‍त मूल सर्गो के साथ साथ संजीवनी का लेखन किया है। त्रतीय ग्रन्‍थ महाकवि भारवि प्रणीत किरातर्जुनीयम है। इसमें लेखक ने मूल ग्रन्‍थ के  ससाथ मल्लिनाथ क्रत घण्‍टापथ व्‍याख्‍या  की प्रतिलिपि की है। तीनों ही पुष्पिकाऐं जो लेखक का विस्‍त्रत परिचय प्रस्‍तु त करती है ।
 इ;आ;ला;सं;सूची  खण्‍ड सप्‍तम प्र 1416 , प्र; 1419, एवं प्र; 1430 ।
                    उपर्युक्‍त औदीच्‍य ब्राहमण दवे परिवार के एक ही लिपिकर्ता के तीनों पाण्‍डु ग्रन्‍थों से ज्ञात होता है कि कदाचित वे सशुल्‍क लेखन का कार्य करते रहे हों । लेखक ने अपना ग्रहनगर लिखा है वह संभवत राजकोट गुजरात हो सकता है क्‍योकि औदीच्‍य ब्राहमणों का गुजरात से संबंध सर्वविदित है।
        सातवे खण्‍ड में अन्तिम औदीच्‍य उल्‍लेख  रत्‍नकलाचरित है जो कि लोलिम्‍बराज की क्रति है। की प्रतिलिपि पर उपलब्‍ध होता है । यह 9 पत्रों का ग्रन्‍थ है। आकार 9 1/2 4 इंच है। उत्‍तम देवनागरी लिपि में इसे लिपिबध्‍द किया  गया है । प्रत्‍येक पत्र में 9 पक्तियां है। प्रतिलिपिकर्ता ने औदीच्‍य जाति का तो यहां उल्‍लेख किया ही है  साथ ही औदीच्‍य ब्राहमणों की व्रध्‍द शाखा से अपना संबंध दर्शाया है। वह अपना उपनाम रावल लिखता है।  
इ;आ;ला; सं; सूची ग्रन्‍थ खण्‍ड सात प्र 1491 ।
           इस प्रकार उक्‍त सातों खण्‍डो में उपलब्‍ध औदीच्‍य बा्हमणों के संदर्भों  के परिशीलन से यह ज्ञात होता है कि ब्राहमणों में हमारी उपजातति अत्‍यन्‍त मेधावी एवं प्राच्‍यग्रन्‍थों  की पाण्‍डुलिपियां बनाने में अत्‍यन्‍त निष्‍णात  थी । हमारे पूर्वज अपनी जातति को सम्‍मान देते थे तथा उसे प्रकट करने  में गौरव का अनुभव करते थे । हमें यह भी विदित होता है कि उपका अध्‍ययन एवं लेखन क्षेत्र व्‍यापक था । वे वेद वेदांग, दर्शन,कर्मकाण्‍ड, वास्‍तुकला,साहित्‍य आदि विषयों के विव्‍दान रहे है। उन्‍होने प्राचीन ग्रन्‍थों की प्रतियां निर्मित कर भारतीय साहित्‍य के संरक्षण में  अतिशय महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है क्‍योकि  मूल ग्रन्‍थों की  प्रतियां निर्मित करना भी  तत्‍कालिन परिस्थितियों  में विध्‍या विस्‍तार की द्रष्टि से  अति महत्‍वपूर्ण कार्य था। ऐसे ही अनुष्‍ठानों  ने भारतीय विध्‍या के ग्रन्‍थों  के अस्तित्‍व को बनाये रखा है।
                  समाज शास्‍त्रीय द्रष्टि से विचार किया जाय तो यह तत्‍व भी उल्‍लेखनीय होगा कि ब्राहमणों  में हमारी उपजाति औदीच्‍य ऐतिहासिक अस्तित्‍व रखती है। 
 अनेक पाण्‍डुलिपियों  ने 400/500 वर्ष पूर्व के संकेत प्रस्‍तुत किए हैं । इसका तात्‍पर्य यह है कि हमारी औदीच्‍य संज्ञा सहस्‍त्रों वर्षों के इतिहास की साक्षी  है।
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इस साईट पर उपलब्ध लेखों में विचार के लिए लेखक/प्रस्तुतकर्ता स्वयं जिम्मेदार हे| इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

औदीच्‍य बन्‍धु को अपने घर का सदस्‍य बनाईये ।


किसी यात्रा या आयोजन में अपरिचित औदीच्‍य बन्‍धु के मिलने पर हम आत्‍मीय भाव से मिलकर चर्चा करते हैं और बिछुडने पर फिर मिलने का वादा । अपनों से मिलना हमें चिंरजीवी सुख देता है। 
आज के साहित्‍य संसार में अनेकों पत्र पत्रिकायें दुर्लभ्‍ा और बहुमूल्‍य विचारों को लेकर बाहर  आ रही है ,वे पढी जाकर उनमें से जिज्ञासु ज्ञान के मोती बटोर रहे हैं। किन्‍तु वे पत्रिकायें जो समाज के व्‍दारा समाज के लिये ही प्रकाशित होती है। उनमें रूचि का अभाव देखा जा रहा है। यह अवश्‍य है कि समाज की पत्रिकाओं में फाईव स्‍टार होटल के भोजन जैसा स्‍वाद तो नहीं मिलता  किन्‍तु सामाजिक गतिविधियों जानकारियों का स्‍थायी पौष्टिक तत्‍व अवश्‍य प्राप्‍त हो जाता है किन्‍तु हमारी सामाजिक सोच में जंग सा लगता जा रहा है।  
आज हमारा औदीच्‍य बन्‍धु  निरन्‍तर प्रगति पथ पर आगे बढता हुआ  40 प़ष्‍ठों के साथ 88 वर्ष का होगया है तथा  उसके कलेवर के साथ ही रचनाओं में भी निखार आ रहा है । समाज के सदस्‍य उसकी राह देखते रहते हैं और रूचि पूर्वक पढते हैं क्‍यों कि उसमें सामा‍जिक जानकारियों के साथ बधाई सन्‍देश,वैवाहिक विज्ञापन शोक समाचार आलेख आदि कई नये विचार समाहित रहते है।
हां एक कमी अवश्‍य द्रष्टिगत होती है कि हमारा समाज विद्वानों और कलमकारों से सुसज्जित है किन्‍तु वे अन्‍य पत्रिकाओं के लिये अपनी कलम अवश्‍य चलाते हैं। पर अपने सशक्‍त विचारों को समाज के साथ बाटने को तैयार नहीं होते जबकि औदीच्‍य बन्‍धु उनके विचारों की राह देखता रहता है। 
 यह भी महसूस हो रहा  है कि समाज की जनसंख्‍या के मान से उसके सदस्‍यों की संख्‍या कम है। समाज के हर घर तक बन्‍धु की पहुच हो इसके  लिये योजना को आकार देकर  सदस्‍य संख्‍या को बढाना होगा और यह कार्य सब मिलकर कर करें साथ जी पाठकों में भी रूचि पैदा करना होगी । 
कुछ सदस्‍य यदा कदा उदगार प्रगट करते हैं कि उसमें कुछ पढने लायक सामग्री नहीं आती है । ऐसे विचार  वे ही प्रगट करते हैं जिनका साहित्‍य और समाज से लगाव न के बराबर रहता है।  औदीच्‍य बन्‍धु अखिल भारतीय औदीच्‍य महासभा का मुख पत्र है, जिसमें महासभा की गति‍विधियों के साथ समाज की हर उपलब्‍ध जानकारी प्रकाशित होती है । 
इसमें संपादक के नाम पत्र का कालम भी है जिसमें बन्‍धु को प्रगति के शिखर तक पहुंचाने से संबंधित अपने अमूल्‍य विचारों का प्रकाशित कराया जा सकता है।

          औदीच्‍य बन्‍धु की आलोचना के बजाय समालोचना के साथ इसे अपना मान कर अपनायेगें तो निश्चित रूप से बन्‍धु भी आपके लिये सहयोगी साबित होगा।
उद्धव जोशी ।
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इस साईट पर उपलब्ध लेखों में विचार के लिए लेखक/प्रस्तुतकर्ता स्वयं जिम्मेदार हे| इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

"औदिच्य समाज "/ "ब्रम्ह दिशा"


 "औदिच्य समाज "
औदिच्य ब्रह्मिन समाज की अखिल भारतीय औदिच्य महासभा के मुख पत्र के रूप में "औदिच्य बंधू " जो की हिंदी में इंदौर से प्रकाशित होती हे, के अतिरिक्त और भी कई पत्रिका देश के बिभिन्न भागो से प्रकाशित हो रही हें . उनमे से एक और यह "औदिच्य समाज " भी हे जो की देवास म. प्र. से ही समाज को अपनी सेवाए दे रही हे | ८"गुना १६" आकर का१२ पेज का यह पत्र अपने आप में अनूठा हे विज्ञापन रहित समाचार पत्र प्रकाशित करना , आर्थिक रूप से घाटे का सोदा होते ही भी, निरंतर ग्यारह से अधिक वर्ष से प्रकाशित करना ,और इसमें औदिच्य ब्रह्मिन समाज के लिए ही सभी प्रकार के समाचारों से अवगत करते हुए ,दुःख सुख की जानकारिया समाज को देना, निश्चित ही प्रशसनीय और समाज की बड़ी सेवा हे | इस सेवा के लिए समाज आपका अभिनन्दन करता हे | इसके अन्य सहयोगियो का साधुबाद | 
 इस पत्रिका के संपादक श्री जगदीश शर्मा  |
मोब.९४२४५४८४६८/९७१३९६१११३ 253MIG.विजय नगर देवास म.प्र.
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"ब्रम्ह दिशा"
पिछले 5 साल से निरंतर प्रकाशित यह समाचार पत्र " पहली नजर में सर्व ब्रह्मिन समाज का पत्र दीखता हे | पर यह औदिच्य ब्रामिन्स की गतिविधियों से सरोवार हे | "ब्रम्ह दिशा" संपादक राजेश मेहता मोब ९८९३६०५७५४ ग्राम पलवा पोस्ट घोसला तहसील महिदपुर जिला उज्जैन म. प्र. के परिश्रम और समाज सेवा के जूनून का मिला जुला कृतित्व हे | मित्रो के सहयोग और बिना विज्ञापन के प्रकाशित इस पत्र में ब्रामिन्स के लिये एक तड़प दिखाई देती हे | आज वर्तमान काल की परिस्थितियों के हाथो मजबूर से दिख रहे ब्रह्मिंस को एक जुट करने का प्रयास करने वाली यह पत्रिका के प्रकाशक साधुबाद के पात्र हे | उनके इस प्रयास के की प्रशंसा की जाना जरुरी हे | पर साथ ही उनका हाथ सदस्य बनकर मजबूत किया जाना चाहिए |
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हमारे देश के कई स्थानों से औदिच्य ब्राम्हणों  की विभिन्न भाषाओं में पत्र और पत्रिकाए प्रकशित हो रही हे | में इस ग्रुप के सभी मित्रो से अनुरोध करूँगा की ,वे भी उनकी जानकारी पोस्ट करे यदि फोटो हो तो अधिक अच्छा रहेगा | यदि आप नहीं डाल सके तो पत्र की एक नवीन प्रति मुझको भेजने की व्यवस्था करने का कष्ट कर | मेरा प्रयत्न हे की देश की सभी पत्रिकाओ का व्योरा एक जगह सभी को मिले जिससे सारे देश के बंधुओ को एक जुट बनाने और उनके समाज सम्बन्धी सेवा और प्रयत्नों की जानकारी सभी को प्राप्त हो सके |
डॉ मधु सुदन व्यास 
उद्धव जोशी