बड़े काम की छोटी बातें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बड़े काम की छोटी बातें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

If you have someone, who understands you

यदि आपके पास कोई है, जो आपको सुनता  है, जो आपको धेर्य पूर्वक समझता है, और जो आपसे सचमुच प्यार करता है, आपकी फ़िक्र करता है| 
जो हमेशा आपको अपनी याद में रखता है| 
जिसे आप पर गर्व है| 
जो आपसे चर्चा के बिना या किसी कॉल किए या संदेश के बिना एक दिन भी नहीं रह पाता|
उसे आपको खोने का डर हमेशा सताता है| 
कृपया उनकी देखभाल न करें, उन्हें प्यार करें, वे अपनी देखभाल में तो स्वयं सक्षम होते हें|
उन्हें आपसे वास्तविक आदर चाहिए,

ऐसे लोगों को छोटी छोटी बातों से असहमत होने पर भी दूर न जाने दें|
उनके साथ हमेशा विनम्रता के साथ पेश आयें.
हमेशा उनका साथ दें,  
ऐसे लोग हमेशा विश्वास योग्य, निश्छल, सरल, और सकारात्मक होते हें| 
मधु सूदन व्यास उज्जैन 

If you have someone, who understands you, who thinks you patiently, and who really loves you, worries you.
Who always keeps you in his memory.
Who has proud of you.
Which is not live a day, without a discussion or without a call or without a message.
He always fears about losing you.
Please do not take care of them, love them, they are capable of taking care of themselves.
They want real respect from you,
Do not let such people disagree with the small things.
Always be courteous with them.
Always cooperate with them.
Such people are always trustworthy, innocent, simple, and positive.
Madhu Sudan Vyas Ujjain

नवरात्रि व्रत का महत्व और वास्तविकता।




यदि आप हमारे इस भाव से सहमत है, तो अन्य को भी प्रेरणा के लिए पड़ने हेतु प्रचारित करें । 

समाज हित में प्रकाशित।आपको कोई जानकारी पसंद आती है, ऑर आप उसे अपने मित्रो को शेयर करना/ बताना चाहते है, तो आप फेस-बुक/ ट्विटर/ई मेल आदि, जिनके आइकान नीचे बने हें को क्लिक कर शेयर कर दें।

स्वगत-

स्वगत      
स्वगत
डॉ.मधु सूदन व्यास
<http://audichyabandhu.blogspot.com>

हम कोन हें - देव या दानव 
सुर (देवता) और असुर दोनों ही प्रत्येक व्यक्ति में होते हें। इसे ही सात्विक या तामस प्रकृति भी कहा जा सकता है।
आदि काल से अब तक भी सुर और असुरों का संग्राम चल रहा है।

जब कभी भी पूरे समाज में जब अराजकता और अवांछनीय गतिविधियों का प्रभुत्व स्थापित कर लेतीं है तो असुर विजयी होते हें।
प्रत्येक मनुष्य स्वयं यदि चाहे तो अपनी आसुरी प्रव्रत्तियों से स्वार्थ छोड़ कर छुटकारा पा सकता है।

जब तक हम केवल स्वयं हित के लिए प्रव्रत्त रहेंगे या चिंतन करते रहेंगे तब तक असुर साम्राज्य  समाप्त नहीं हो सकता।

जो अपने साथ अन्य के लाभ की भी सोचे वह इंसान मनुष्य कहला सकता है और जो अन्य  के लिए ही सोचे और करें वह सुर या देवता बन जाता है। केवल स्वयं की ही सोचने वाला राक्षस या असुर ही होगा।

हम क्या बनाना चाहते हें इसका निर्णय स्वयं ही करना होगा। 27/9/14
--------------------------------------------------------------------------
मंत्र सिद्धि 
मन्त्रों की सिद्धि के लिए नव रात्रि में साधना की जाती है, पर मन्त्र क्या हें, कितने जानते हें?
संस्कृत या किसी भाषा में समझ न आने वाला कोई शब्द के जाप अदि से सिद्धि नहीं मिल सकती। 
हर छोटी से छोटी बात या शब्द मन्त्र हो सकता हे, केवल उसके अर्थ को समझना और मन और आत्मा में स्थापित करना और अमल में लाने से सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
---------------------------------------------------------------------
 दैवी की सिद्धि 

नवरात्रि का आरंभ हो गया है। कुछ ने दैवी को प्रसन्न करने हेतु व्रत/ उपवास और साधना का भी प्रारम्भ कर दिया है। 

यदि आप वास्तव में पाखंडी नहीं है, और वास्तव में दैवी को सिद्ध करना (प्रसन्न करना) तो यदि केवल एक संकल्प लें, की आज से दैवी स्वरूप स्त्रियॉं को प्रताड़ित करना, उन्हे बुराभला कहना, मार पीट करना, बात बे बात पर अपमानित करना) की आदत, कुत्सित और गंदी भावना से देखना, छोड़ते नहीं हें, तो आपसे दैवी प्रसन्न कदापि नहीं हो सकतीं, चाहे आप व्रत उपवास कुछ भी न करें। 
याद रखें की हर अपराध की एक सीमा होती है, फिर महिषासुर आदि की तरह वह नष्ट हो जाता है। 
25/09/14
------------------------------------------------------------

सच्चा मंत्र 
सकल पदारथ हें जग माहीं, कर्म हीन नर पावत नाहीं।

यह एक एसा मन्त्र हे जिसे सभी को हमेशा याद रखना ऒर अमल में लाना चाहिए।
भाग्य के भरोसे कुछ भी प्राप्ती की आशा व्यर्थ है।
--------------------------------------------------------------------------------------
हिन्दू (सनातन ) धर्म की विशेषता। 
सनातन हिन्दू धर्म को छोड़कर लगभग हर धर्म में उसके अनुयाई प्रतिदिन, प्रति सप्ताह, या उस धर्म के नियमानुसार, उनके धर्म स्थल पर नहीं जाते, या निर्देशानुसार पुजा अर्चना, ईबादत आदि नहीं करते तो उन्हे उस धर्म का अनुयाई नहीं माना जाता। उन्हे दंडित किया जाता है। 
पर कोई हिन्दू कभी भी मंदिर न जाए तब भी वह हिन्दू ही कहलाता है। 
एसा इसलिए है की हिन्दू धर्म प्रत्येक को अपनी आत्मा की आवाज पर स्वतंत्रता से निर्णय करने की छूट देता है।
-------------------------------------------------------------------
आस्तिकता 
हम भोतिक वादी हें,और ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते।
पूर्व में जो घट चुका उसे बदल नहीं सकते और भविष्य में क्या होने वाला हे इस पर हमारा अधिकार नहीं, तो फिर क्यों न परिस्थिति पर छोड़ दिया जाये और सोचा जाये की सब अच्छा होगा, तो फिर यह क्यों न माना जाये की सब अच्छा ही होगा तो क्या इसे किसी शक्ति की मर्जी माना नहीं जा सकता? 
क्या?यहीं ईश्वर का होना सिद्ध हो जाता है।
------------------------------------------------------------
मन की आवाज 
अकसर हम मन की आवाज को अनसुना कर देते हैं। हमारी कथित तर्कबुद्धि दिल की हल्‍की सी आवाज को कहीं दबा देती है। हम देख और सुन ही नहीं पाते उस इशारे को, हमें वह आवाज जरूर सुननी चाहिये। इस आवाज को अनसुना करना हमें मुश्किल में फंसा देता है। बेशक भौतिक सुविधायें हमारे लिए जरूरी हैं, लेकिन इससे सच्‍चा सुख नहीं मिलता। अपने दिल की सुनिये, भोतिक सुविधाओं से हटकर विश्वास/ समर्पण/प्रेम ही सच्‍चा सुख दिला सकता है।
-----------------------------------------------------------------------------------------
बड़ा शत्रु 
हमारे अपने ही हमारे सबसे बड़े शत्रु होते हें, क्योंकि ज्ञात शत्रु यदि कष्ट पहूंचाते हें तो हम इसके लिए तैयार रहते हें और सामना कर पाते हें, अपने का आक्रमण सब कुछ समाप्त कर देता है और निराशा को जन्म देता है। अपनों को जानना चाहिए कि वह केवल स्वयं कि खुशी के लिए जीवित नहीं कोई अन्य भी हें जो उससे अपेक्षा रखते हें। 
जीवन कि इस सच्चाई को जीवन में उतारने वाला ही अंत में सब सुख पाता है।
----------------------------------------------------------
मित्रता और विश्वास
मित्रता और विश्वास स्थापित करने के लिए शीघ्रता अच्छी नहीं होती। जिस तरह परिपक्व व्रक्ष और पोधे पर ही फूल और फल लगता है, उसी प्रकार मित्रता और विश्वास का फल, सम्बन्धों की परिपक्वता पर ही फूलता है। 
पहिले समय के साथ इन्हे बढ्ने दिया जाए, स्नेह और मधुरता से सींचा जाएँ, सहयोग की खाद से फलित किया जाए, समर्पण से स्थिर और द्रड किया जाए, मित्रता और विश्वास स्वयं ही उत्पन्न जाएगा, किसी को इस बात को कहने की जरूरत भी नहीं होगी, जब यह मित्रता, विश्वास फूलेगा फलेगा तो सारा संसार स्वत: जान जाएगा।
क्षमा 
क्षमा मांगने का यह अर्थ कदापि नहीं होता की क्षमायाचना करने वाले ने कोई अपराध किया ही हो! यह विनम्रता का प्रतीक है। जो जितना अधिक विनम्र होगा उतना ही अधिक झुकता रहेगा। हरे भरे फलों से लदे ब्रक्ष ही झुकते हें। जो घमंड में चूर होते हें वे शीघ्र ही सूखे पेड़ की तरह गिर कर नष्ट हो जाया करते हें। 

सभी हरे भरे पेड़ों को चाहते हें, वहीं सूखे पेड़ों को शीघ्र हटा देना आवश्यक समझते हें।  
मधु सूदन 
******
क्षणिक जोश,अधेर्य,निराशा,और आत्म विश्वास की कमी -ये "नास्तिकता" के चिन्ह हें।
****
अपने को बड़ा मान लेने से केवल अपनी ही हानी नहीं होती, उन्नति भी रूक जाती हे क्योंकि ओरों को तुच्छ समझ उनसे कुछ सीख नहीं पाते। 
***

बड़े काम की छोटी बातें

-------------------------------------------------------
कर्म सरल है ,विचार करना कठिन है !
धर्म सरल है ,सैट धर्म करना कठिन है !
दान करना सरल है ,गुप्त रखना कठिन है !
जग की असलियत जानना सरल है ,इस पर अमल करना कठिन है !
======================================
दूसरो के साथ वह व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसंद नही|


जिन्हें लम्बी जिंदगी जीनी हो, वे बिना कड़ी भुख लगे कुछ भी न खाने की आदत डालें । 


जिसनें जीवन में स्नेह, सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया सचमुच वह सबसे बड़ा कलाकार है । 


 विपरीत परिस्थितियो में भी जो ईमान, साहस और धैर्य को कायम रख सके,वस्तुतः वही सच्चा शूरवीर है 


 कायर मृत्यु से पूर्व अनेको बार मर चुकता है, जबकि बहादुर को मरने के दिन ही मरना पड़ता है



 ईष्या आदमी को उसी तरह खा जाती है, जैसे कपड़ो को कीड़ा । 


 ईमानदार होने का अर्थ है हजार मनकों में से अलग चमकने वाला हीरा । 


 अपनी रोटी-मिल-बाँटकर खाओ ताकि तुम्हारे सभी भाई सुखी रह सके। 


 जीवन का अर्थ है 'समय' जो जीवन से प्यार करते हों, वे आलस्य में समय न गवायें ।


गृहस्थ एक तपोवन है, जिसमें संयम,सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है । 


पाप अपने साथ रोग,शोक पतन ओर संकट भी लेकर आता है 


सार्थक और प्रभावी उपदेश वह है, जो वाणी से नहीं,अपने आचरण से प्रस्तुत किया जाता है । 

अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हो । 


मनुष्य का जन्म तो सहज होता है, पर मनुष्यता उसे कठिन प्रयत्न से प्राप्त करनी पड़ती है । 


अनजान होना उतनी  लज्जा की  बात नहीं, जितनी सीखने के लिए तैयार न होना । 


असफलता केवल यह सिद्व करती है कि सफलता  का प्रयास पूरे मन से नहीं हुआ । 


 देवता आशीर्वाद देने में तब गुँगे रहते हैं, जब हमारा ह्दय उनकी वाणी सुनने में बहरा रहता है ।


सभ्यता का स्वरूप है-सादगी, अपने लिए कठोरता और दूसरों के लिए उदारता । 


योग्यता और परिस्थिति को ध्यान में रखकर महात्वाकांक्षाएँ न गढने वाला दुखी रहता और उपहास सहता है ।


पढ़ने योग्य लिखा जाय,इससे लाख गुणा बेहतर यह है कि लिखनें योग्य किया जाय । 


दूसरो के साथ वैसी ही उदारता बरतो जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती है । 


बुद्विमान वे हैं जो बोलने से पहले सोचते हैं, मूर्ख वे हैं जो बोलते पहले और सोचते बाद में हैं । 


परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी और कर्तव्य परायणों के लिए सुरक्षित है । 


जो बच्चों को सिखाते हैं उन पर बड़े खुद अमल करे, तो यह संसार स्वर्ग बन जाए । 


सबसे बड़ा दीन दुर्बल वह है, जिसका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं । 


अच्छी पुस्तकें जीवन्त देव प्रतिमाएँ हैं । उनकी आराधना से तत्काल प्रकाश और उल्लास मिलता है । 


मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं,वह उनका निर्माता,नियंत्रणकर्ता और स्वामी है । 


आलस्य से बढ़कर अधिक घातक और अधिक समीपवर्ती शत्रु नहीं । 


आय से अधिक खर्च करने वाले तिरस्कार सहते और कष्ट भोगते हैं । 


किसी का सुधार उपहास से नहीं, उसे नये सिरे से सोचने और अदलने का अवसर देने से होता है । 


जो जैसा सोचता और करता है,वह वैसा ही बन जाता है । 


 सज्जन् आमीरी मे गरीब जैसे नम्रऔर गरीबी में अमीर जैसे उदार होते हैं । 


कुकर्मी से बढ़कर अभागा कोई नहीं, क्योकि विपत्ति में उसका कोई साथी नहीं रहता । 


बडप्पन अमीरी में नहीं, ईमानदारी और सज्जनता में सन्निहित है । 


उन्हे मत सराहो, जिनने अनीतिपूर्वक सफलता पाई और सम्पति कमाई । 


प्यार और सहकार से भरा पूरा परिवार ही धरती का स्वर्ग होता है । 


प्रसन्न रहनें के दो ही उपाय है-आवश्यकताएँ कम करें और परिस्थितियों से तालमेल बिठायें । 


काम की अधिकता से नहीं ,आदमी उसे भार समझकर अनियमित रूप से करने पर थकता है ।


जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर है,ईश्वर केवल उन्हीं की सहायता करता है । 


अपनें को मनुष्य बनाने का प्रयत्न करो, यदि इसमें सफल हो गए, तो हर काम में सफलता मिलेगी । 

वेदमूर्ति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा रचित युग निर्माण योजना के अधिकृत 
सद् वाक्य 

चिर यौवन का रहस्य।

चिर यौवन का रहस्य।  
 बूढ़ा कोन ?  क्या आयू  अधिक हो जाने से कोई बूढ़ा है?
मेरे विचार से जब भी जो व्यक्ति किसी भी नई बात को सीख नहीं सकता या नया काम नहीं कर सकता दूसरे शब्दो में कहें तो स्वयं को बदल नहीं सकता वह व्यक्ति ही बूढ़ा होता है।  
आयु की अधिकता या परिपक्वता के समय तक, प्रत्येक मनुष्य का अधिकतम विकास होता रहता है। इस परिपक्व आयु के समय जब उसे लगाने लगता है, की उसका काम पूरा हो गया, उसने सब कुछ जान लिया, और अब जानने या करने योग्य कुछ शेष नहीं बचा है, बस यही वह क्षण है, जहां से व्यक्ति बूढ़ा होना शुरू हो जाता है। उसकी तमाम इंद्रियाँ साथ छोड़ने लगतीं हें।
इसके विपरीत जो व्यक्ति हर समय (आयु की परिपक्वता के बाद भी,) कुछ न कुछ सीखने या जानने का प्रयत्न करता रहता है, वह उत्साही चिर युवा बना रहता है।  कहा गया है - मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
यदि हम यह कामना करते रहें, की हम शतायु होंगे, हमारे सुनने देखें की क्षमता बनी रहेगी, हम दीन हीन, पराधीन नहीं, अपना सब काम स्वयं कर सकते हें, मनुष्य की आयु परमात्मा ने सौ वर्ष दी है तो फिर में निश्चय ही सौ वर्ष तक जीवित रहूँगा। तो कोई कारण नहीं की वह बूढ़ा हो जाए।
शरीर विज्ञानियों ने यह सिद्ध किया है, की शरीर की करोड़ों पुरानी कोशिकाएं प्रति क्षण नष्ट होती हें, और उतनी से अधिक पुन: बन जातीं हें। मस्तिष्क के कोषों पर भी भी जितना अधिक दवाव या जौर डाला जाए, उतने ही अधिक संख्या में, अधिक सक्षम और नवीन बनते रहते हें, और इसके विपरीत जितना अधिक आराम उन्हे दिया जाए, काम न होने से वे उतने ही अधिक तेजी से कम, और निर्बल होने लगते हें।
आयु की परिपक्वता के समय भी यही होता है, अधिकतर व्यक्ति कुछ भी नया सीखने जानने या करने के बजाय यह विचार करते हें, की अब बहुत कर लिया अब तो आराम करना  चाहिए, - बस यहीं से उनका बुढ़ापा शुरू हो जाता है, और वे धीरे धीरे निर्बल, पराधीन बुड्ढे होने लगते हें। कई कम आयु के जवान व्यक्ति भी इसी सौच के चलते असमय बूढ़े हो जाते हें।
बुढ़ापे को दूर रखने का सबसे अच्छा उपाय है, की हम हमेशा अपने मन में अपनी युवावस्था की गतिविधियों को सामने रखें, अपने मन को वैसा ही तरोताजा, प्रफुल्लित लचीला अनुभव करें। शरीर की फिजिकल सक्रियता,और मानसिक सक्रियता वनाए रखने के लिए यही सौचें, कि में सब कुछ कर सकता हूँ, और सतत नया करते रहें, सीखते रहें,  तो बुढ़ापा समय अर्थात सौ वर्ष से पहिले आ ही नहीं सकता।      
डॉ मधु सुदन व्यास

26 जुलाई 2014        

समाज हित में प्रकाशित।आपको कोई जानकारी पसंद आती है, ऑर आप उसे अपने मित्रो को शेयर करना/ बताना चाहते है, तो आप फेस-बुक/ ट्विटर/ई मेल आदि, जिनके आइकान नीचे बने हें को क्लिक कर शेयर कर दें।

सुख और शान्ति के 7 मूल मंत्र

  1. सफलता का सूत्र ; आस्‍था और अनुशासन ।
  2.  सामाजिक जीवन याने संबंधों का जीवन ।
  3. चार बातों का विकास करिए  शरीर बल, चरित्र बल,मनोबल और बुध्दि बल ।
  4. चेतना के सूत्र   प्रामाणिक व्‍यवहार, म्रदु व्‍यवहार,निश्‍चल व्‍यवहार,निष्‍पक्ष व्‍यवहार,विनम्र व्‍यवहार। 
  5. धर्म का अर्थ  राग व्‍देष मुक्‍त जीवन जीना।
  6. स्‍थान परिवर्तन से कुछ नहीं होता। स्‍वभाव और वाणी को बदलने से ही सम्‍मान मिल सकता है।
  7. विधायक भावों का जितना अधिक विकास होगा,उतना ही संवेदनशीलता का सूत्र आगे बढेगा।
------------------------------------------------------------------------------------------------------
आपको कोई जानकारी पसंद आती है, ऑर आप उसे अपने मित्रो को शेयर करना/ बताना चाहते है, तो आप फेस-बुक/ ट्विटर/ई मेल आदि, जिनके आइकान नीचे बने हें को क्लिक कर शेयर कर दें। समाज हित में प्रकाशित।

विचार शक्ति

            मुख मन का दर्पण है, चेहरा मन का सांचा है, नेत्र आत्‍मा के वातायन माने जाते है।
विश्‍व का विधाता विचार है। चित्‍त को सदा तरूण बनाये रखना चाहिए। 
वि‍वेकी मनुष्‍य सदा सतर्क, सजग और सावधान रहता है।
भगवान बुध्‍द ने कहा है कि हम अपने विचारों से ही बने हैं, सुझाव में ही उपचार है।
भाग्‍य पर निर्भर रहने से अकर्मण्‍यता और आलस्‍य की वृध्दि होती है।
सभी क्षमतायें, सारी शक्तियां और सारे सामर्थ्‍य हमारे अन्‍दर ही हैं।
            मनुष्‍य विचार का बीज बोता है, और क्रति रूपी फल पाता है।
मनोबल प्राप्‍त करने का सर्वोत्‍क्रष्‍ट उपाय उन्‍नत, उदार और सद विचारों का चिन्‍तन है।

विचार चरित्र निर्माण की ईंटे है। 
पवित्र विचार एक वाणी है।
द्रढ निश्‍चय की शक्ति का विकास कीजिए।
सभी असत्‍य विचार  रोग के संदेश वाहक है, मृत्‍यु के अग्रदूत हैं।  
हमें सदा प्रसन्‍न और सन्‍तुष्‍ट रहना चाहिए।
    एक मनुष्‍य को आदर्श दूसरे के अनुरूप नहीं होता है।
------------------------------------------------------------------------------------------
आपको कोई जानकारी पसंद आती है, ऑर आप उसे अपने मित्रो को शेयर करना/ बताना चाहते है, तो आप फेस-बुक/ ट्विटर/ई मेल आदि, जिनके आइकान नीचे बने हें को क्लिक कर शेयर कर दें। समाज हित में प्रकाशित।

नदी और समुद्र में श्रेष्ठ कोन?

नदी और समुद्र 
एक दिन नदी से समुद्र ने पूछा - मेरे पास कोई नहीं आता और न कोई आदर करता है ,पर तुम्हें तो लोग प्यार करते है , इसका क्या कारण है ?
नदी ने कहा -- आप केवल लेना ही जानते है, जो मिलता है, उसे जमा करते हैं, पर में जो इस हाथ पाती हूँ, उसे उस हाथ आगे बढ़ा
देती हूँ, लोग मुझसे जो पाते है, उसी के बदले में तो प्यार देते है। 

जो केवल लेना ही लेना जानते हैं, वे उपेक्षित ही रह जाते है, जिन्हें देना भी आता है वे सबके प्रिय बन जाते हैं।

==========================================================================

तात्कालिक लाभ के लिए कुछ बाँट देने से तात्कालिक प्रसिद्धि ही पाई जा सकती है यह प्रसिद्धि कागज की नाव की तरह जल्दी ही डूब जाती है ।

"नदी कह रही थी की में समुद्र से अधिक श्रेष्ठ हूँ क्योकि में जो प्राप्त करती हूँ वह देकर आगे बढ़ जाती हूँ। समुद्र सब कुछ समा लेता है। एक ऋषि ने जो नदी ओर समुद्र की यह बात सुन रहे थे, बोले 

समुद्र तुम नहीं जानते की सबसे अधिक श्रेष्ठ तुम हो, क्योकि तुम्हारे द्वारा दिया भाप बन कर उढ़ा जल ही नदियों में गिरता है। सभी खराबियों/ खारेपन को तुम रोक लेते हो, ओर कभी कुछ कहते भी नहीं। जो अपनी केवल अच्छाइयाँ देकर भी शांत रहता है, कोई घमंड नहीं करता उससे श्रेष्ठ कोई हो नहीं सकता।

तत्काल देकर कुछ समय के लिए कोई श्रेष्ठ ओर प्रिय बन सकता है, पर देर सबेर सभी इस बात को समझ ही जाते हें।
इसी लिए नदियां सूख जातीं हें समुद्र हमेशा भरा रहता है।
========================================================================
इसका प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा है।

Audichya Bandhu: क्या हम जानते हें?

क्या हम जानते हें?
            इस प्रष्ठ पर एसे कई उत्तर मिलेंगे जो अक्सर हमारे मन में आते रहते हें। यदि आप के मन में भी कोई प्रश्न या कोई नया एवं प्रामाणिक उत्तर हो तो टिप्पणी में दर्ज करें। विस्तारित जानकारी audichyamp@gmail.com  द्वारा प्रेषित करें।  उन प्रश्नो का उत्तर या आपकी उत्तर युक्त जानकारी आपके नाम सहित इसमें शामिल कर सकेंगे। इसी संक्षिप्त उत्तर को क्लिक कर विस्तारित जानकारी भी सम्मलित की जा सकेगी।   



इसका प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा है।

अकेले न जिओ ;कर्म का अम्रत पीओ ।


    धरा पर सांस ले रहा प्रत्‍येक प्राणी आक्रति एवं प्रक्रति में भिन्‍नता रखते हुए भी आत्‍मा के व्‍दारा एक सूत्र में मोतीयों की माला की तरह सुगठित है। हर प्राणी एक दूसरे के अस्तित्‍व से बंधा हो उसका एक क्षण भी अकेले जीना असंभव है। हमें अपनी विचारधारा को विकसित करते हुवे संकल्‍प करना होगा कि दूसरों की उपलब्धि का उपयोग किये बिना हम एक कदम भी आगे नहीं बढ सकते हैं। कर्म के प्रति निष्‍ठा न हो तो उसे उपलब्धियों के अनमोल खजाने की प्राप्ति नहीं हो सकती है। कर्म में भक्ति; मस्ति और श्रध्‍दा का सामन्‍जस्‍य होना आवश्‍यक है। जैसा कि रैदास को जूते सीलने और गोरा कुम्‍हार को मटके बनाने में आनन्‍द आता था ।
    कर्म के साथ समर्पण जुडा हो तो वह सुखानुभूति देता है । यदि मन में अहंकार का बीज अपनी जगह बना ले तो कर्म का मूल्‍य और स्‍तर दोनों गिर जाते हैं । कर्म बडा हो या छोटा अहंकार रहित होकर समर्पित भाव से करना चाहिए । भक्‍त पुंडलिक को माता पिता की सेवा में इतना सुख मिलता था कि उन्‍होने भगवान विठठल को भी प्रतीक्षा करने के लिए कह दिया । कर्म में ऐसा ही भाव होना चाहिए । कर्म के साथ यदि अपने पराये की भावना का उदय हो जाता है तो उसमें स्‍वार्थी तत्‍व का समावेश होकर सदकर्म का भाव ही समाप्‍त हो जाता है ।
    कर्म के साथ अपनी इच्‍छाओं को भी नियन्त्रित करना होगा क्‍योंकि इच्‍छाऐं अनन्‍त होती है । हमारे व्‍दारा किये जाने वाले समस्‍त कर्मो में सहयोग;सामंजस्‍य और सहकार का भाव मिश्रित होगा तो सफलता हमें हर कदम पर प्राप्‍त होती रहेगी ।
   मानव अपनी जीवन संपदा का उपयोग अच्‍छे कर्मो के लिए करेगा तो वह ईश्‍वर व्‍दारा निर्मित इस विश्‍ववाटिका को सुन्‍दर सुव्‍यवस्थित सरल समुन्‍नत बनाने में पूर्ण सहयोगी होगा। अच्‍छाई और बुराई की दोनों गेंद आपके हाथों में है और इनका उपयोग आपके बुध्दिकौशल से जुडा हुआ है और जीवन की प्रतिष्‍ठा अप्रतिष्‍ठा आपके पास ही सुरक्षित है। इसके लिए अन्‍य कोई जिम्‍मेदार नहीं है । इसलिऐ अपनत्‍व के भाव से सबके साथ जीओ और अच्‍छे कर्मो का अम्रत पीओ । 
उद्धव जोशी , उज्‍जैन




इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

सुविचारों से आत्‍मबल विकसित करें?

    सुविचारों से आत्‍मबल विकसित करें?
महात्‍मा बुध्‍द का कथन है कि लोहे में उत्‍पन्‍न और बसा हुआ जंग लोहे को खा जाता है। उसी प्रकार मनुष्‍य के शरीर में उत्‍पन्‍न और पाली हुई ईर्ष्‍या, व्‍देष मनुष्‍य को मरणासन्‍न बना देता है। वर्तमान समय में हम अपने चारों और देखें तो पायेगें की मनुष्‍य परनिंदा में रूचि लेकर अपना अमूल्‍य समय नष्‍ट कर रहा है। इससे समाज में अशान्ति और विकार पैदा हो रहे हैं। दूसरों की निंदा कर हम स्‍वयं कलुषित वातावरण को पैदा कर रहे हैं। दूसरों के छिद्रान्‍वेषण से अपने व्‍यक्तित्‍व का खोखला प्रदर्शन कर न तो हम निंदा करने वाले व्‍यक्ति का भला और न ही समाज के सुधार में अपना सहयोग कर रहे हैं। कबीर जी ने ठीक ही कहा है कि अपनी और आने वाली गाली या निंदा का जवाब यदि आपने दिया तो वह विकराल स्‍वरूप धारण कर लेती है,  किन्‍तु यदि आप चुप रहे तो वह आवाज मुरझा कर वातावरण कलुषित होने से बच जायेगा। परनिंदा तथा स्‍वस्‍थ्‍य आलोचना में भारी अंतर होता है। निंदा करने से व्‍देष पनपता है, पर स्‍वस्‍थ समालोचना से परहित की भावना का उदय होता है। जीवन के प्रति आस्‍था, उत्‍साह, और विश्‍वास हो तो मनुष्‍य का चरित्र आकर्षक बन जाता है। यह यही है कि जहां भलाई है, वहां बुराई भी अपना डेरा जमाती है। जहां प्रशंसा है वहां निंदा भी बसने का घोर परिश्रम करती है। इसलिए हम स्‍वयं निंदा करने से तो बचे साथ ही अपनी निंदा सूनने की क्षमता भी पैदा करें । कबीर जी ने कहा भी है कि '' निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छबाय, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय'। हमारे अन्‍दर जो अच्‍छे विचार पैदा होते हैं यदि इनके माध्‍यम से हम अपना आत्‍मबल विकसित करने का प्रयास करें तो हममें संयम और सदगुण पैदा होगें। प्रेम, करूणा, दया की जलधारा से मानव जीवन तरूण बना रहेगा।
उद्धव जोशी, एफ 5/20 एलआयजी ऋषिनगर उज्‍जैन 
========================================================================
इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

बड़े काम की छोटी बातें

***********************
बहुत सारे लोग अपनी रेखा बड़ी करने के लिए दूसरों की रेखा मिटाते हें, वे इतने सक्षम या स्वयं पर विश्वास नहीं कर पाते की वे बड़ी रेखा खींच पाएंगे। जीवन में इस प्रकार की प्रतिस्पर्धा के चलते लांछन, दोष, विरोध, बहुत तरह कि मिट्टी फेंकी जायेगी, बहुत तरह कि गंदगी पर गिरेगी। 
जैसे कि, आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आलोचना करेगा, कोई सफलता से ईर्ष्या के कारण तुम्हे बेकार में ही भला बुरा कहेगा। 
कोई तुमसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आदर्शों के विरुद्ध होंगे।
हतोत्साहित होकर बुराई के सामने समर्पण करने के बजाय या अनावश्यक वाद विवाद छोड़कर साहस के साथ डटे रहना है, अनुभवों से सीख लेकर, उसे सीढ़ी बनाकर, बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है। बस चलते जाना हे। चैरवेती-चैरवेती।
*******************
सोच कर बोलें न की बोल कर सोचें-
जो मन में आए वह बोलने से बाद में अक्सर वह सुनने मिलता हे जो उसे स्वयं के लिए पसंद नहीं होता। व्यवहार में चतुर होने का तात्पर्य हे, हम अपने शब्दो का चुनाव समझदारी से करें। हमारे शब्द स्वयं या अन्य की भावनाओं को चोट पहुचा सकते हें।
*****************************
एक किसान एक बेकर को रोज एक किलो घी बेचता था एक दिन बेकर ने यह जानने के लिए की घी एक किलो हे या नहीं, तोल कर देखा, ओर पाया की वह कम हे। इस पर वह किसान को अदालत में ले गया। जज ने किसान से पूछा की उसने घी कम क्यों तोला। किसान कहने लगा की हुजूर में तो अनपढ़ हूँ, मेरे पास तोलने के लिए कुछ भी नहीं केवल एक तराजू हे। 
तो फिर तुम केसे तोलते हो -जज ने पूछा? 
किसान ने जवाव दिया हुजूर इन्होंने तो मुझसे घी कुछ दिन से ही खरीदा हे पर में तो कई वर्षों से इनसे रोज एक किलो ब्रेड खरीद रहा हूँ, रोज सुबह जब ये ब्रेड देने आते हें, तब में उसी ब्रेड से तोंल कर इन्हे घी दे देता हूँ। यदि इस कमी में दोष हे तों इनका ही हे। 
जिंदगी में हमको वही वापिस मिलता हे जो हम दूसरों को देते हें।
*********************
बहुत से प्रतिभाशाली लोग सफलता केवल इसीलिए नहीं पा पाते क्योकि उनमें शिष्टाचार ओर अच्छे व्यवहार की कमी होती हे। 
शिष्टाचार का मतलव हे -दूसरों का ख्याल रखना जेसे बुजुर्गों अपंगों को बेठने स्थान देने से लेकर एक स्माइल या मुस्कान, या धन्यवाद देना ।
**********************************
जब भी हम सम्मान पाने वालों की सूची देखेँ , तो पाएंगे की उस सूची मे
एक भी एसा नाम नहीं हे, जिसने दुनिया से कुछ लिया हे, सभी नाम एसे दिखते हें जिन्होंने दुनिया को कुछ दिया हे।
**********************************
सच्ची दोस्ती में एक दूसरे की मदद करना एहसान नहीं होता। यह दोस्ती की अभिव्यक्ति होती हे, उसका मकसद नहीं। 
यदि दोस्ती मकसद बन जाए तो वह दोस्ती नहीं होती उसे दोस्ती नहीं कहते। जेसे पड़ोसी से दोस्ती प्रभावशाली व्यक्ति डाक्टर,वकील,धन सम्पन्न, आदि प्रकार के व्यक्तियों से दोस्ती। 
दोस्ती त्याग, ओर परीक्षा लेती हे। दोस्ती ओर रिश्तों को बनाए रखने के लिए निष्ठा,,समझदारी, समय, ओर प्रयास ओर अपने आराम की कुर्बानी देना होती हे।
***********************************
कभी कभी असफल हो जाने पर अधिकतर लोग मायूस हो जाते हें, ओर वे स्वयं को असफल या लूजर मनाने लगते हें। असफलता मिल सकती हे इसका अर्थ यह नहीं की वे असफल हें। जेसे की यदि किसी को मूर्ख बनाया जा सकता हे, अर्थ यह नहीं की वह मूर्ख हे। मैदान छोड़ने वाला व्यक्ति ही असफल होता हे।
*********************************
हम जितने अधिक सुविचारों को दूसरों को बताते हें, उससे उतनी ही अधिक प्रेरणा स्वयं को मिलती हे। दूसरों को हर रोज प्रेरणा देने की कोशिश स्वयं को भी सच्ची राह दिखने का ही एक रास्ता हे।
***********************************
हमारी ज़िन्दगी मे भी कई बार कुछ ऐसा ही होता है। हम कोई काम प्रारम्भ करते है। शुरू -शुरू मे तो हम उस काम के लिये बड़े उत्साहित रहते है पर लोगो के कमेंट्स की वजह से उत्साह कम होने लगता है और हम अपना काम बीच मे ही छोड़ देते है और जब बाद मे पता चलता है कि हम अपने सफलता के कितने नजदीक थे तो बाद मे पछतावे के अलावा कुछ नही बचता।
************************************
जीवन मे अच्छे संबंध ओर सहयोग के बिना सफलता प्राप्त करना कठिन हे। ओर संबध अपने आप नहीं बनते उन्हे बनाना पड़ता हे, ईर्षा, द्वेष, स्वार्थ, अहंकार, ओर रूखा व्यवहार त्याग कर, दयालुता, आपसी समझ, ओर आत्म-त्याग (स्वयं की सुविधा न होते हुए भी साथ देना), के खाद -पानी से सींचकर, महत्व देकर, गंभीरता पूर्वक विश्वास की नीव पर रिश्ते की इमारत बनाना चाहिए। कोई रिश्ता या मित्रता अक्सर पूर्ण नहीं होती, सम्पूर्ण पूर्णता की तलाश मे निराशा हाथ लगती हे।
***************************
एक अच्छा मनुष्य वह हे जो हमेशा अपने से छोटों से नरमी, व्रद्धों से करुणा, संघर्ष शील के साथ हमदर्दी से, ओर कमजोर ओर गलती करेने वाले के साथ सहनशोलता से पेश आए, क्योकि कभी न कभी सभी को इस परिस्थिति से गुजरना होता हे।

**************************
जीवन में कुछ बड़ा करना हे,
 तो कुशल ओर समझदार बनाना होगा। पूर्ण कुशल ओर समझदार होने का अर्थ हे, छोटी छोटी बातों में ओर बहस में न उलझना। 
विवाद होने पर बहस नहीं तर्क होना चाहिए। बहस से आग निकलती हे तर्क से प्रकाश। 
बहस अहंकार से पेदा होती हे, तर्क सीखने की इच्छा से। 
बहस मे अज्ञानता की अदला बदली होती हे, तर्क मेन ज्ञान की। 
बहस के द्वारा लोगों के मिजाज का पता चलता हे।
तर्क से समझदारी का। बहस मे यह साबित किया जाता हे की कोन सही हे।जबकि तर्क मे साबित होता हे की क्या सही हे।
************************
जो व्यक्ति दूसरों की बात करता हे वह वह छोटी सोच वाला [बोद्धिक स्तर में कम] , जो किसी चीज की बात करता हे वह मध्यम सोच वाला ओर जो विचारों की बात करता हे वह उत्तम सोच वाला बुद्धिमान होता हे।
========
तपस्या 
मन की आवाज एक आत्म सुझाव होता हे। यह अवचेतन मन को प्रोग्रामिंग करने का एक तरीका हे। जो सकारात्मक या नकारात्मक कुछ भी हो सकते हें। इनको बार बार दोहरने से मन की गहराईयों में पहुचकर वे हमें वेसा ही बनाते हें। इसी प्रकार हम जो भी पाना या बनाना चाहते हें उसकी छवि मन में बनाते हें यह ही कल्पना होती हे, आत्म सुझाव ओर कल्पना एक साथ चलती हें। 
सकारात्मक विचार पाने के लिए एकांत में चिंतन जिसे तपस्या भी कह सकते हें से ही कोई व्यक्ति तपस्वी बन सकता हे। नकारात्मक विचार का सतत चिंतन उसे आसुरी प्रव्रत्ति तक पहुचा कर उसके अनुरूप बन देते हें। देव या दानव इसीतरह से बन जाते हें।
--------------------------------------------------------------------------
       
                                                                                                                                                         
======================
प्रांजल  व्यास  
एक बार महान रूसी लेखक टॉल्सटॉय से उनके एक मित्र ने कहा- मैंने तुम्हारे पास एक योग्य व्यक्ति को भेजा था। उसके पास उसकी प्रतिभा के कई प्रमाणपत्र थे। लेकिन आश्चर्य है कि तुमने अपने सचिव के पद के लिए उसे नहीं चुना। मैंने सुना है कि तुमने उस पद के लिए जिस व्यक्ति को चुना है उसके पास ऐसा कोई प्रमाणपत्र नहीं था। आखिर उसमें ऐसा कौन सा गुण था कि तुमने मेरी बात की उपेक्षा कर दी? टॉल्सटॉय ने मुस्कराते हुए कहा- मैंने जिसे चुना है उसके पास अमूल्य प्रमाणपत्र हैं। मित्र ने आश्चर्य से पूछा-ऐसा क्या है उसके पास, जरा मैं भी सुनूं। टॉल्सटॉय ने कहा- उसने मेरे कमरे में आने से पहले इजाजत मांगी थी। अंदर आने से पहले उसने दरवाजों को इस तरह पकड़ कर धीरे-धीरे सटाया कि आवाज न हो। 
उसके कपड़े साधारण पर साफ-सुथरे थे। उसने बैठने से पहले कुर्सी साफ कर ली थी। उसमें गजब का आत्मविश्वास था। वह मेरे प्रश्नों के ठीक और संतुलित जवाब दे रहा था। मेरे प्रश्न समाप्त होने पर वह मेरी इजाजत लेकर चुपचाप उठा और चला गया। उसने किसी तरह की चापलूसी या चयन के लिए सिफारिश की कोशिश नहीं की। ये ऐसे प्रमाणपत्र थे जो बहुत कम व्यक्तियों के पास होते हैं। मेरा मानना है कि ऐसे गुणसंपन्न लोगों के पास यदि लिखित प्रमाणपत्र न भी हों, तो कोई बात नहीं। असली प्रमाणपत्र तो व्यवहार है। लिखित प्रमाणपत्र तो कोई भी हासिल कर सकता है। तुम ही बताओ, मैंने ठीक किया कि नहीं। यह सुनकर टॉल्सटॉय का मित्र निरुत्तर रह गया।
=======================
Make habits what u want in life, once good habits comes in life bad habits goes out tomatically. Its just like light... its presence means isappearing the darkness
Prakash R C Pandey.
========

=================================
Jitendra Trivedi

प्रेम केवल मानव ही नहीं महसूस करता बल्कि प्रेम की अनुभूति कुदरत की हर रचना में अलग-अलग रूपों में उजागर होती है। इसलिए हर धर्म में प्रेम को ईश्वर से साक्षात्कार के लिए अहम माना गया है। व्यावहारिक नजरिए से भी प्रेम ऐसा जीवन मूल्य है़, जो सच, भलाई, सेवा, त्याग की तरह जिंदगी में वास्तविक सुखों को पाने के लिए बहुत जरूरी है। असल में प्रेम ऐसा अहसास है जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है, क्योंकि यह कोई सोच नहीं है। अलग-अलग व्यक्ति में और उम्र के हर पड़ाव पर प्रेम का अहसास भी अलग-अलग होता है। सरल शब्दों में कहें तो यह कहा जा सकता है कि प्रेम करने वाले या प्रेम पाने वाले दोनों आत्मा में सुकून पाते हैं। यहां जानते हैं धर्मशास्त्रों के नजरिए से जीवन में प्रेम किन-किन रूपों में प्रकट होता है -

लौकिक प्रेम - प्रेम का यह रूप साधारण मानव की जिंदगी में दिखाई देता है। जहां मानव का दौलत, प्रतिष्ठा, सौंदर्य, स्वाद के प्रति आसक्ति या लगाव के रूप में प्रेम दिखाई देता है। यह लौकिक प्रेम कहलाता है। इसमें कई अवसरों पर मानव हित और स्वार्थ के चलते भी संबंध बनाता है। जिसे स्वार्थ पर आधारित प्रेम कहते हैं।

अलौकिक प्रेम - अध्यात्म में डूबकर ईश्वरीय सत्ता पर भरोसा, पूरी प्रकृति को ईश्वर की रचना मान प्रेम, ईश्वर को जेहन में रख आदर्श और मर्यादा पालन अलौकिक प्रेम कहलाता है।

मोहजन्य प्रेम - माता-पिता और संतान, पति-पत्नी या अन्य मानवीय रिश्तें में एक-दूसरे से लिए प्रेम मोहजन्य प्रेम कहलाता है।

नि:स्वार्थ प्रेम - प्रेम का यह रूप सेवा भावना में दिखाई देता है। जिसमें व्यक्ति कुछ देने के बदले लेने का भाव नहीं रखता। बिना किसी हितपूर्ति के वह समर्पण भाव से दूसरों के लिए हरसंभव मदद करता है। ऐसा प्रेम पावन-पवित्र और श्रेष्ठ माना जाता है। क्योंकि यह प्रेम करने और पाने वाले दोनों को आत्मिक सुख देता है।
======================================
Sunil Yajurvedi
भगवान महावीर के अनेक शिष्य थे, जो उनसे कई गंभीर विषयों पर सार्थक चर्चा करते थे। ऐसी चर्चाओं से शिष्यों को ही लाभ प्राप्त नहीं होता था, बल्कि उनके द्वारा जनता के मध्य भी ज्ञान का प्रचार होता था। एक दिन महावीर स्वामी ने अपने शिष्यों से पूछा कि मनुष्य के पतन के क्या कारण हो सकते हैं? शिष्यों ने सोचा-विचारा। फिर किसी ने अहंकार बताया तो किसी ने काम वासना।

किसी शिष्य का विचार था कि लोभ मानव के पतन का मूल कारण है तो कोई यह मानता था कि क्रोध इसकी जड़ है। सभी की बात सुनने के बाद महावीर ने कहा - मान लो कि मेरे पास एक कमंडल है, जिसमें काफी मात्रा में पानी समा सकता है। यदि उसे नदी में यों ही छोड़ दिया जाए तो क्या वह डूबेगा? शिष्यों ने इंकार में सिर हिलाया। महावीर ने पूछा - यदि उसमें छिद्र हो तो? शिष्यों ने कहा - तब वह अवश्य डूबेगा।

महावीर ने पुन: प्रश्न किया - यदि छिद्र दाईं ओर हो तो? तब एक शिष्य बोला - छिद्र दाईं ओर हो या बाईं ओर, वह डूबेगा ही। तब महावीर ने समझाया - मानव जीवन भी उस कमंडल की तरह ही है। उसमें दुगरुण रूपी छिद्र जहां हुआ, समझ लो वह डूबने वाला है। काम, क्रोध, लोभ, अहंकार आदि में कोई भेद नहीं है। कथा का सार यह है कि दुगरुण कोई भी हो, व्यक्ति का जीवन बर्बाद करने हेतु पर्याप्त है क्योंकि उससे व्यक्ति की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है और उसके निकट संबंधी भी उससे दूरी बना लेते हैं।
======================================
राजेन्द्र शर्मा 
Rajendra Sharma
ज़िंदगी तो सभी के पास है पर जीना हर किसी को नही आता जैसे अर्थ सभी के पास है पर उसे कहाँ खर्च करना है ये कम लोग जानते है .....वाणी सभी के पास है पर उसका प्रयोग कब और कैसे करना है ये अल्प लोग ही जानते है|

=====================================

हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई मित्रता नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु है, किन्तु सत्य है। 


जब तक एक नदी में अन्य नदियाँ आकर नहीं मिलती ,तब तक उसमे उफान नहीं आता उसका वेग नहीं बड़ता ,उसी तरह जब तक सुप्त समाज में उन्नत विचार धारा आकर नहीं मिलती तब तक समाज में परिवर्तन नहीं आता और यही विचार धारा समाज की दिशा बदल देती है !===================
अनमोल वचन :

सफलता सबसे पहले आप के मन में घटित होती है| उसके बाद ही वह जीवन में उतरती है|

 स्वेट मार्डेन



जैसे जल के द्वारा अग्नि को शांत किया जाता है, 

वैसे ही ज्ञान के द्वारा मन को शांत करना चाहिए|

 वेदव्यास 



"मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा सच है" |

 "तुम्हारा सत्य वहां है जहां तुम खड़े हो, जहां तुम्हारी जड़ें हैं" |

 "धर्म पर विश्वास करना नहीं, उसे जीना सीखें" |

=
===========================================================
Rajendra Sharma
ध्यान रखिये हम खुद के बारे में जो कुछ कहते है वही औरो को याद रहता है उसी को लोग समय आने पर हमारी बात जाहिर करते है !
===========================================================
जैसा हम सोंचते है वैसा ही हमारी अंतश्रवी ग्रंथियां हारमोंस हमारे शरीर में छोड़ती है जो हमारी सोंच को हकीकत में बदलने के लिए महत्वपूर्ण कारक है. 

जैसे की बीमारी में आप दवा ये सोंचकर ले रहे है कि मै बीमार हूँ तो आप बीमारी और बढ़ाते है और अगर ये सोंचकर लेते है कि मै ठीक हो रहा हूँ तो आप ठीक होने लगते है.
======================================


जो हित कार्य में लगा है,जो पोषक है वह पिता है! जिसमे विश्वाश है? वह मित्र है ! जंहा जीविका है ,वही देश है !

वृहस्पति नीति सार

======================================

जिस दिन हम अपनी गल्ती स्वीकार करने का साहस जुटा लेंगे उस दिन से हमें दूसरों में कमियां नज़र ही नहीं आएँगी|

=====================================
किसी ने सच कहा है ... हर सफल व्यक्ति सुंदर नही होता पर सफलता हर व्यक्तिको "सुंदर" बना देती है ... तो आप तैयार है सुंदर बनने के लिए !
======================================
ध्यान रखिये हम खुद के बारे में जो कुछ कहते है वही औरो को याद रहता है उसी को लोग समय आने पर हमारी बात जाहिर करते है !
=====================================

चिन्‍तकों एवं विव्‍दानों की द्रष्टि में उपवास का महत्‍व।

चिन्‍तकों एवं विव्‍दानों की द्रष्टि में उपवास का महत्‍व -'आत्मिक उत्‍थान के लिए उपवास आवश्‍यक है।

प्‍यूरिंगटन 
यदि आप स्‍वास्‍थ्‍य,यौवन,जीवन का आनंद सौंदर्य,विश्‍वास,शक्ति जैसी अमूल्‍य निधियां चाहते हैं तो उपवास करना होगा । उपवास से मनुष्‍य की नैतिक व आध्‍यात्मिक उन्‍नति होती है। नैसर्गिक बु‍ध्दि जाग्रत होती है और वह प्रेम की विशालता का अनुभव कर पाता है।

यूस्‍टोन माईलस 
कभी कभी एक दिन के लिए उपवास एक उत्‍तम योजना है । इससे संयम और जितेन्द्रियता में सहयोग मिलता है। पाचन क्रिया को विश्राम प्राप्‍त होता है और शरीर में संचित मल को बाहर निकाल देता है।

महात्‍मा गांधी 
यदि कब्‍ज,रक्‍त की कमी,ज्‍वर,अपच,सिरदर्द,वायु के दर्द,जोडों के दर्द,भारीपन,उदासीनता और चिन्‍ता जैसी शिकायतें हो तो अवश्‍य उपवास किया जावे।

 सुश्रुत [आयुर्वेद]
जिस व्‍यक्ति की जठराग्नि मंद पड गई हो और पाचन यंत्र ठीक काम न कर रहा हो तो लंघन का सहारा लेना चाहिए जिससे अग्नि उदीप्‍त होती है और दोष जल जाते हैं।

भाव प्रकाश [आयुर्वेद]
उपवास से भुख बढती है ,शरीर हलका होता है ,जठराग्नि तीव्र होकर रोग नष्‍ट होते हैं ।

डा; अपटन सिक्‍लेयर
उपवास को मैं यौवन की स्थिरता के लिए सर्वोत्‍तम उपाय मानता हूं । उपवास एक प्राक्रतिक विधि है जिसके माध्‍यम से रोग निव्रत होते हैं।

धर्म 
उपवास हमारे धर्म का एक अंग है । आज भले ही धार्मिक विधानों की उपेक्षा हो किन्‍तु यह सर्वमान्‍य तथ्‍य है कि शारीरिक,मानसिक,आत्मिक स्‍वास्‍थ्‍य,बल तथा स्थिरता के लिए उपवास एक प्राक्रतिक वैज्ञानिक प्रणाली है।

उपवास शक्ति का भण्‍डार 
उपवास के माध्‍यम से स्‍वाध्‍याय,मनन,चिन्‍तन, ध्‍यान आदि जो भी साधनाऐं की जाती है वे मन को प्रभावित करती है। हमारे आन्‍तरिक शत्रु जो शारीरिक व आत्मिक द्रष्टि से हमें खोखला बना रहे हैं उपवास से उन पर विजय प्राप्‍त होती है।

अधिक खाने से आलस्‍य और निद्रा अपना डेरा जमा लेते हैं । शरीर व मस्तिष्‍क में भारीपन का अनुभव होता है। भरी वस्‍तु का झुकाव सदैव नीचे की ओर होने से शारीरिक ढांचा अस्‍त व्‍यस्‍त हो जाता है। क्षमता से अधिक भोज्‍य पदार्थ लेना असहय और कष्‍टदायक होता है।

विश्राम प्रक्रति का स्‍वाभाविक नियम है । दिन में कार्य करने से हम जितनी शक्ति का व्‍यय करते हैं ,रात्रि में विश्राम कर उतनी शक्ति को उपार्जित कर लेते हैं। इसी प्रकार यदि पेट को विश्राम नहीं दिया तो वह अस्‍वस्‍थ्‍य हो जावेगा ,शरीर को रूग्‍ण बना देगा और हमारे साथ असहयोग करेगा । इसलिए उपवास के माध्‍यम से पेट के अवयवों को विश्राम देना अति आवश्‍यक है। उपवास केवल जल पर निराहार रहकर भी किया जाता है अथवा दूध,फल,छाछ आदि फलाहारी वस्‍तुऐं ग्रहण कर भी किया जाता है । हमेशा याद रखें,उपवास कर स्‍वस्‍थ्‍य रहें ।
संकलन- उद्धव जोशी
=============================================================

व्‍यावहारिक जीवन में धारण करने योग्‍य संकल्‍प

औदीच्‍य ज्ञाति के परमाराध्‍य इष्‍टदेव श्री गोविन्‍द माधव प्रभु का श्री चित्र, विविध परिस्थितियों में बिखरे औदीच्‍य बन्‍धुओं को एकसूत्र में आबध्‍द करने एवं अपनी गौरवमय संस्‍क्रति के संरक्षणार्थ समाज की भावना है कि प्रभुगोविंद माधव का चित्र भारत के समस्‍त औदीच्‍य परिवारों में पूजित हो । इष्‍टदेव के नित्‍य स्‍मरण , अर्चन, वन्‍दन, तथा चित्र प्रकाशन का पुनीत लक्ष्‍य तभी शुभ फलदायी होगा जब शहरों, गांवो कस्‍बों के अन्‍दर उंच नीच के भाव तथा धनी निर्धन के बीच की दूरी समाप्‍त हो साथ ही ज्ञाति सेवा में लगे विभिन्‍न संगठन परस्‍पर सौहार्द को बढाते हुए सर्वागीण समाजोत्‍थान की दिशा में अगसर हों ।

अत हम इष्‍टदेव का स्‍मरण करते हुए निम्‍नलिखिल संकल्‍पों को अपने व्‍यावहारिक जीवन में धारण करने का व्रत लें ।

1 ; स्‍वसंस्‍क्रति अनुसार आचार विचार का पालन ।
2; ज्ञाति सेवा कार्यो में उत्‍साहयुक्‍त सहयोग ।
3; अपनी ब्रहम संस्‍क्रति अनुसार नित्य संध्‍या वंदन ।
4; अपने ज्ञाति बन्‍धुओं के सुख दुख में सदैव सहयोग।
5; परस्‍पर सौहार्द स्‍थापित करना ।
6; विवाहादि कार्यो में आडम्‍बरयुक्‍त धन प्रदर्शन तथा अपव्‍यय न करना।
7; द‍हेज लेने देने जैसी कूरीतियों से दूर रहना ।
8; नारी से सम्‍मानजनक तथा समान व्‍यवहार ।
9; शराब,धूम्रपान,एवं अखाध्‍य वस्‍तु सेवन कर्ताओं से स्‍वयं को पूर्णतया प्रथक रखना ।
जय गोविन्‍द माधव् 

...............................................................................................................
इस साईट पर उपलब्ध लेखों में विचार के लिए लेखक/प्रस्तुतकर्ता स्वयं जिम्मेदार हे| इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

सदा स्‍मरण रखने योग्‍य बातें ।


  1. पांच रात्रि तक कमल का फुल बासी नही होता । दस रात्रि तक बिल्‍वपत्र बासी नहीं होता । ग्‍यारह रात्रि तक तुलसी दल बासी नहीं होता ।
  2.  शंकर जी को बिल्‍वपत्र,विष्‍णु भगवान को तुलसी,गणेश जी को दुर्वा  लक्ष्‍मीजी को कमल और दुर्गा को लाल फूल प्रिय हैं । 
  3.  पत्र,पुष्‍प,फल को नीचे मुख करके नहीं चढावें ,जैसे उत्‍पन्‍न होते हैं वैसे ही चढावें किन्‍तु बिल्‍वपत्र उल्‍टा करके सुधार कर चढावें 1 खाण्डित बिल्‍वपत्र वर्जित है । पान के अग्रभाग की डंडी तोडकर चढावें ।
  4. विष्‍णु को चांवल,गणेश जी को तुलसी,दुर्गा और सूर्य को बिल्‍व पत्र नहीं चढाना चाहिए । 
  5.  आरती भगवान के चरणों की बार बार ,नाभि की दो बार ,मुख की तीन बार  एवं समस्‍त अंगो की सात बार आरती उतारें ।
  6.  मेरूहीन माला या मेरू का लंघन करके माला नहीं जपनी चाहिए ।
  7.  चंदन माथे पर लगाना शोभा तो देता ही है, इससे मस्तिष्‍क हमेशा ताजा रहता है ।
  8.  जप,ध्‍यान,साधना को जितना हो सके गुप्‍त रखो । 
  9.  दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए ।
  10.  देवता का पूजन देवता बनकर करों ।
  11.  स्‍नान करके तिलक अवश्‍य लगाना चाहिए ।
  12. बडों को प्रणाम करते समय उनके दोनों पैरों को अपने बायें हाथ से छूकर प्रणाम करें ।
  13.  परिक्रमा चंडी की एक,सूर्य की सात,श्री गणेश जी की तीन,श्री हरी की चार तथा शिवजी की आधी परिक्रमा करें ।
  14.  मंत्र में भगवान की शक्ति होती है । ऐसी भावना रखने से शीघ्र ईष्‍ट सिध्दि प्राप्‍त होती है । ..............................................................................................................................
इस साईट पर उपलब्ध लेखों में विचार के लिए लेखक/प्रस्तुतकर्ता स्वयं जिम्मेदार हे| इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

ज्ञान पिपासु बनिए

ज्ञान पिपासु बनिए
                       आज मनुष्‍य धनबल और बाहुबल को सर्वश्रेष्‍ठ  मानकर इनकी व़ध्दि करने में दिनरात एक कर रहा है। इस कारण उसका संपर्क अन्‍य विधाओं से कट कर वह अहंकार,ईर्ष्‍या,स्‍वार्थ और कपट के कपाट में बन्‍द होकर श्रीहीन होता जा रहा है। यदि मानव इन बलों के साथ ही ज्ञान बल को बढाने में लगाए तो वह पंच तत्‍वों को अपने वश में करते हुए प्रभावी बन सकता है। क्‍योंकि संसार का व्‍यवहार ज्ञान बल पर ही चल रहा है,जिसके पास ज्ञान का बल है वही मनुष्‍य है। कहा गया है . ' विध्‍या विहिन' पशु । पशु और मनुष्‍य में ज्ञानबल का ही अंतर है।
                        मनुष्‍य के पास बुध्दि है । इसका जितना अधिक उपयोग किया जावेगा वह उतनी ही अधिक धारदार होती है।संसार में बडे बडे साम्राज्‍यों की स्‍थापना और विनाश्‍ा के पीछे बुध्दि बल का आधार ही रहा है । ज्ञान के बल पर ही आत्‍मा परमात्‍या का रूप हो जाती है । 
भगवान श्रीक़ष्‍ण ने गीता में कहा है कि नहीं ज्ञानेन सद्रशं पवित्र मिह विध्‍यते अर्थात इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र वस्‍तु नहीं है। ज्ञान आत्‍मा का सच्‍चा गुण है। 
गरूड पुराण में लिखा है ;माता शत्रु पिता बैरी येन बालो न पठित,न शोभते सभा मध्‍ये हंस मध्‍ये वको यथा। हितोपदेश में भी इसको और विस्‍त़त करते हुए लिखा है कि विध्‍या से विनय, विनय से पात्रता,पात्रता से धन और धन से धर्म और सुख प्राप्‍त होता है। विध्‍या प्राप्‍ती के लिये सुन्‍दर लिखा गया है  उत्‍तम विध्‍या लीजिए जदपि नीच पे होय ,पडो अपावन ठौर के कंचन तजत न कोय । 
यदि आत्‍मा को ज्ञान से निकाल दिया जाय तो आत्‍मा जड बन जायगी। संसार में ज्ञान का भण्‍डार भरा हुआ है। सारा ज्ञान अपने जीवन काल में प्राप्‍त करना कठिन है ,ऐसी स्थिति में हंस के समान सार वाले ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए। प्रत्‍येक व्‍यक्ति को ऐसा ज्ञान प्राप्‍त करना चाहिए जिसके व्‍दारा शारीरिक,मानसिक,आध्‍यात्मिक  उन्‍नति करते हुए अपना जीवन सुखपूर्वक बीता सके । अज्ञान के तिमिर को ज्ञान के सूर्य से मिटाकर अपने व्‍यक्तित्‍व को संवारिये। आचार,विचार, व्‍यवहार ज्ञान के प्रभाव और बुध्दि के विकास से ही प्राप्‍त होता है। अत- ज्ञान पिपासु  बनकर जहां और जैसे  भी लोक व्‍यवहार,कला कौशल विज्ञान आदि का ज्ञान मिले उसे प्राप्‍त करने में अपना अमूल्‍य समय लगाना चाहिए|
औदीच्य बंधु: A to Z -लेख /रचनाएँ: 
________________________________________________________________________________
इस साईट पर उपलब्ध लेखों में विचार के लिए लेखक/प्रस्तुतकर्ता स्वयं जिम्मेदार हे| इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

उपवास की महत्‍ता - उध्‍दव जोशी उज्‍जैन|

उपवास करना आवश्‍यक है . 
 चिन्‍तकों एवं विव्‍दानों की द्रष्टि में उपवास की महत्‍ता '
प्‍यूरिंगटन ृ यदि आप स्‍वास्‍थ्‍य यौवन जीवन का आनंद सौंदर्य विश्‍वास शक्ति जैसी अमूल्‍य निधियां चाहते हैं तो उपवास करना होगा । उपवास से मनुष्‍य  की नैतिक व आध्‍यात्मिक उन्‍नति होती हैा नैसर्गिक बुध्दि जाग्रत होती है और वह प्रेम की विशालता का अनुभव कर पाता है।
युस्‍टोन माईलस ' कभी कभी एक दिन के लिये उपवास एक उत्‍तम योजना है। इससे संयम और जितेन्दियता में सहयोग मिलता हैापाचन क्रिया  को विश्राम प्राप्‍त होता और शरीर में संचित मल को बाहर निकाल देता है।
महात्‍मा गांधी'  ने अपने स्‍वकीय अनुभव और अन्‍य लोगों  के आधार पर कहा है कि यदि कब्‍ज रक्‍त की कमी ज्‍वर अपच सिरदर्द  वायु के दर्द  जोडों के दर्द भारीपन उदासीनता और चिन्‍ता जैसी शिकायतें हो तो अवश्‍य उपवास किया जावे ।
आयुर्वेद सुश्रुत ' हलस व्‍यक्ति की जठराग्नि मंद पड गई हो  और पाचन यंत्र ठीक से काम नहीं कर रहा हो तो लंघन का सहारा लेना चाहिए। इससे अग्नि उदीजप्‍त होकर दोष जल जाते हैं ।
भाव प्रकाश ' उपवास से भुख बढती है । शरीर हल्‍का होता है  जठराग्नि तीव्र होकर रोग नष्‍ट होते है।
डॉ अपटन सिक्‍लेयर' उपवास को मैं यौवन की स्थिरता के लिये सर्वोत्‍तम उपाय मानता हूं । उपवास एक प्रा‍कतिक विधि है जिसके माध्‍यम से रोग निव़ति होती है ।
रामचन्‍्द्र वर्मा ' ने उपवास के प्रति जनता की धारणा का वर्णन करते हुए लिख है कि भारत के प्राचीन ऋषियों की तपस्‍या  का उपवास एक प्रधान अंग  था। बडे बडे धर्माचार्य  स्‍वयं उपवास कर अपने अनुयायियों  और भक्‍तों को उसका लाभ बताते थे पर आजकल लो धार्मिक द्रष्टि से उपवास करते हैं  प्राय- सभी देशों  में उन्‍हें धर्मान्‍ध बताया जाता है और हंसी उडाई जाती है ा इसका कारण है आजकल लोग प्रा‍क़तिक नियमों से एकदम अनभिज्ञ हो गए हैं ।
उपवास हमारे धर्म का एक अंग है। आजकल भले ही धार्मिक  विधानों की उपेक्षा हो किन्‍तु यह सर्वमान्‍य तथ्‍य है कि शारीरिक  मानसिक व आत्मिक स्‍वास्‍थ्‍य बलशालीता और स्थिरता के लिऐ उपवास एक प्राक़तिक वैज्ञानिक प्रणाली है
उपवास के साथ स्‍वाध्‍याय मनन चिन्‍तन ध्‍यान आदि जो भी साधनाऐं  की जाती है वे मन को प्रभावित करती है। उपवास शक्ति का भण्‍डार है। अधिक खाने से आलस्‍य और निद्रा अपना डेरा जमा लेती है। शरीर व मस्तिष्‍क में भरीपन का अनुभव होता है।भारी वस्‍तु का झुकाव सदैव नीचे की और होने से शारीरिक ढांचा अस्‍त व्‍यस्‍त हो जाता है ।
विश्राम  प्रक़ति का स्‍वाभाविक नियम है। दिन में कार्य करने से हम जितनी शक्ति  का व्‍यय करते हैं  रात्रि में विश्राम  कर उतनी शक्ति को उपार्जित कर लेते हैं । इसी प्रकार पेट को विश्राम नहीं दिया तो वह अस्‍वस्‍थ हो जावेगा शरीर को रूग्‍ण बना देगा और हमारे साथ असहयोग करेगा । इसलिए उपवास के माध्‍यम से पेट  के अवयवों  को विश्राम देना अति आवश्‍यक है । उपवास केवल जल पर निराहार रहकर भी किया जाता है ।अथवा दूध छाछ फल  आदि फलाहरी वस्‍तुऐं  ग्रहण कर भी किया जाता हैा अत- याद रखिए उपवास करिये और स्‍वस्‍थ रहिये ।                  
                                                                                                             उध्‍दव जोशी उज्‍जैन
&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&

इस साईट पर उपलब्ध लेखों में विचार के लिए लेखक/प्रस्तुतकर्ता स्वयं जिम्मेदार हे| इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|