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Purpose of festivals - in the present references. त्यौहार एवं व्रत का उद्देश्य- वर्तमान परिपेक्ष में|

 त्यौहार एवं व्रत का उद्देश्य- वर्तमान परिपेक्ष्य में|
श्रीमती कल्पना व्यास उज्जैन
हमारे देश में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक बिना लिंग भेद के, उत्सव- त्योहार का आगमन जन मानस को बड़े ही आनंद और उल्लास से भर देता है, जितना बड़ा त्यौहार उतना बड़ा आनंद का अवसर होता है
 यूँ तो वर्ष भर प्रतिदिन कोई न कोई व्रत और त्योहार सनातन धर्म में सम्मलित हैपूर्व काल से हीवर्षाकाल में अनेक प्राकृतिक समस्यायें विशेषकर आवागमन की, कृषि कार्य भी लगभग कम हो जाता हैइसके चलते अधिकांश व्यक्ति, विशेषकर महिलाओं के पास खाली समय अधिक रहता था|
यह प्रमाणित है कि "खाली दिमाग शैतान का घर". 
इसलिए जैसा की कहा जाता है की "व्यस्त रहो मस्त रहो"|

जब व्यस्तता नहीं होगी तब अनावश्यक विचार मष्तिष्क (खुराफातें) में उत्पन्न होंगी जिससे अनावश्यक संकट, विरोध आदि होने लगेंगें| अतः एक प्रकार से त्योहार व्यस्त रखने के एक प्रबल रास्ता रहा है|

Is there anything else more important, than matching the horoscope for marriage?

Is there anything else more important, than matching the horoscope for marriage?
 विवाह निश्चित करने के लिए, जन्म पत्रिका मिलाने से अधिक जरुरी, कुछ और है?
औदीच्य वैवाहिकी विज्ञापन सेवा
पिछले दो तीन दशक से जन्म कुंडली मिलाने का चलन, चरम सीमा पर है, आज “पड़े-लिखे” जो स्वयं को विद्वान समझते हें वे भी कुंडली मिलान को प्राथमिक आवश्यकता मान रहे हें| जबकि 30 40 वर्ष पूर्व अधिकांश विवाह कार्य बिना कुंडली मिलाये किये जाते रहे है, में स्वयं और मेरे हम उम्र अन्य कई मित्र भी बिना जन्म पत्रिका मिलाये विवाह कर आज भी सुखी जीवन जी रहे हें| जबकि पिछले एक दशक से जन्म पत्रिकाएं मिलाने के बावजूद भी कई युवा युवती संतान हीनता, तलाक, अलगाव,  अथवा कडुवाहट भरा जीवन जीने के लिए विवश है|  

Features of an auspicious bride- विवाह के रंग-जीवन के संग

विवाह के रंग-जीवन के संग
Uddhav Joshi                    
भारतीय समाज में विवाह कब से प्रारम्भ हुए और किसने किया इसका विचार करने पर पहला उदाहरण उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु का मिलता है। जब श्वेतकेतु की माता जबाला अपने इस बालक के लिए भोजन बना रही थी, जब एक शक्तिशाली व्यक्ति आया और उन्हे बलात अपनी वासनापूर्ति के लिए ले गया। बालक के मन पर इस घटना का गहरा प्रभाव पडा! वयस्क होने पर वह एक महान ऋषि बना और उसने समाज में विवाह नामक संस्था की नीव रखी! यह कथा पुरा वैदिक है, परन्तु निश्चित ही यह विवाह संस्था के विकास पर प्रकाश डालती है!
हिन्दू समाज में विवाह को एक पवित्र संस्कार के रूप में माना

उज्जैन में सहस्र औदीच्य समाज की "वरिष्ठजन समिति" एक प्रेरणा|

उज्जैन में सहस्र औदीच्य समाज की "वरिष्ठजन समिति" एक प्रेरणा| 
    यह बात कही है 1 नवम्बर 2015 को भोपाल में आयोजित प्रथम परिचय सम्मेलन के अवसर पर श्री हीरालाल जी त्रिवेदी, आयुक्त सूचना विभाग भोपाल ने अपने उद्बोधन में|
  अपने कहा ‘‘सहस्त्र औदीच्य समाज वरिष्ठजन समिति उज्जैन समाजहित के आयोजन संपादित कर रही है जो प्रेरणास्पद और अनुकरणीय है।
   सहस्त्र औदीच्य समाज वरिष्ठजन समिति उज्जैन व्दारा की जा रही कल्याणकारी गतिविधियों की जानकारी अ.भा. औदीच्य महासभा के मुख पत्र ‘‘औदीच्य बन्धु‘‘ के माध्यम से प्रस्तुत की जा रही है । 
      सम्पूर्ण भारत वर्ष में पंजीकृत एवं शासन से मान्यता प्राप्त एक अशासकीय संगठन ‘‘सहस्त्र

सस्रोदिच्य ब्राह्मण परिवार में जन्मी स्वर्ण/ रजत कांस्य पदक प्राप्त शिक्षिका एवं अंतर्राष्ट्रीय खिलाडी- श्रीमती इंदिरा भंडारी-महिला दिवस विशेष 08 मार्च 2015 –औदीच्य बंधू वेव.

महिला दिवस विशेष 08 मार्च 2015 –औदीच्य बंधू वेव
डूंगरपुर राजस्थान के सस्रोदिच्य ब्राह्मण परिवार में जन्मी स्वर्ण/ रजत कांस्य पदक प्राप्त 
शिक्षिका एवं अंतर्राष्ट्रीय खिलाडी- श्रीमती इंदिरा भंडारी

      वर्तमान में उदयपुर राजस्थान में निवास रत, औदीच्य ब्राह्मण श्रीमती इंदिरा भंडारी W/O जे.पी शर्मा जन्म 10 फ़रवरी 1972 डूंगरपुर राजस्थान में हुआ था| आप वर्तमान में उदयपुर में सीनियर साइंस टीचर और अंतर्राष्ट्रीय खिलाडी के रूप में विख्यात हें| 
      आपने डूंगर पुर राजस्थान में सेकंडरी शिक्षा, और मोहन लाल सुखाडिया विश्व विद्यालय उदयपुर से अन्य स्नातक/ स्नात्तकोत्तर उपाधि - बीएससी (बायोलोजी), बी एड, / एम् एस सी (कंप्यूटर.) एम् ए (पोलिटिकल साइंस,) प्राप्त की|

दृष्टि हीनों के मसीहा- श्री संदीप त्रिवेदी के जज्बे को प्रणाम!

श्री संदीप त्रिवेदी के जज्बे को प्रणाम! 

  बांसवाडा राजस्थान निवासी 30 वर्षीय युवक श्री संदीप त्रिवेदी, पुत्र श्री विजय कुमार और माता हेमलता त्रिवेदी, देवयोग वश तीन वर्ष की आयु में अपने नेत्र दृष्टि खो बेठे, माता-पिता की छत्र-छाया में १९९३ में अंध विद्यालय में प्रवेश कर शीघ्र ही अपने मेधावी होने की बात सिद्ध कर दी| 

  2004 में 12 वी उत्तीर्ण कर 2007, में स्नातक, 2008 में बी एड, 2010 में अंग्रेजी में एम् ए कर व्याख्याता बने और अब 2012 में सीनियर सेकेंडरी स्कुल अजमेर में सामान्य बच्चो को अंग्रेजी पढाते हें| 

महासभा अध्यक्ष माननीय श्री रघुजी की मान प्रतिष्ठा को अपूर्णीय क्षति? -प्रबोध पंड्या उज्जैन|

महासभा अध्यक्ष माननीय श्री रघुजी की मान प्रतिष्ठा को अपूर्णीय क्षति?
 -प्रबोध पंड्या उज्जैन|
काश! राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को इन लोगों ने अँधेरे में ना रखा होता?
महासभा की साधारण सभा में घटित असाधारण दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर हर कोई अपना पक्ष रख रहा है|  श्री मुकेश जी जोशी की ''आंखों देखि''  कुछ को सटीक तो कुछ को अनर्गल लगी|

अ. भा. औदीच्य महासभा की साधारण सभा के घटनाक्रम का सही एवं तथ्यात्मक विवरण -प्रस्तुत कर्ता - रमेश पण्ड्या, उज्जैन

अ. भा. औदीच्य महासभा की साधारण सभा के घटनाक्रम का सही एवं तथ्यात्मक विवरण
प्रस्तुत कर्ता - रमेश पण्ड्या,  उज्जैन


     औदीच्य बन्धु के माह फरवरी 2015 के अंक में समाज के बन्धुओं व्दारा अपने अपने ढंग से  अ. भा. औदीच्य महासभा की बैठक दिनांक 11 जनवरी 2015  के घटनाक्रम पर प्रतिकियांए व्यक्त की गई है। कुछ प्रतिक्रियांए पूर्वाग्रह से ग्रसित थी,   तथा एक बन्धु व्दारा अपनी बौध्दिक शक्ति का पूर्ण उपयोग व्यक्ति विशेष की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से ही प्रतिक्रिया व्यक्त की गई। प्रतिक्रिया विशेष जिसमें स्पष्ट तौर पर मेरा नाम उल्लेखित किया गया है,  पूर्णतः असत्य एवं समाज को भ्रामक जानकारी देने वाली प्रतिक्रिया तो है ही वहीं दूसरी और मेरी एवं समाज  के वरिष्ठजनों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने की कुचेष्टा है।

दोराहे पर खड़ा है औदीच्य समाज!- क्या सपने टूट जायेंगे?

दोराहे पर खड़ा है औदीच्य समाज!- क्या सपने टूट जायेंगे?
 अखिल भारतीय औदीच्य महासभा का शुभारंभ आषाढ क्रष्णपक्ष 10 संवत 1960 सन 1903 में मथुरा में हुआ था।  सौ वर्षों के इस इतिहास में लगभग सभी महासभा अध्यक्षों के कार्यकाल में कुछ न कुछ होता ही रहा है।
1903 से वर्ष 2014  तक महासभा के कई सम्मेलन या बेठकें हुई, पर जो उपलब्धि विगत चार वर्षों में, (वर्ष २०१० से २०१४ तक)  उल्लेखनीय कार्य हुए, एसा पूर्व में कभी नही हुआ था। वर्ष 2009 से अखिल भारतीय औदीच्य महासभा के अध्यक्ष पद पर श्री रघुनन्दन जी शर्मा के सर्व सम्मति से निर्वाचित होने के पश्चात, महासभा जैसे सोते से जग उठी।  नए परिवर्तन, विकेन्द्रीकरण के अंतर्गत प्रादेशिक और जिला इकाइयों का गठन, महिला एवं युवा प्रदेश और जिला इकाइयो का गठन, अभूतपूर्व सदस्यता अभियान, कई साधारण ओर विशेष सभाओं का केंद्र, प्रादेशिक और जिला स्तर पर आयोजन कई एतिहासिक निर्णय, गुजरात के औदीच्य बंधुओं को जोडेने का कार्य, समाज से संबन्धित पुस्तक श्रीस्थल प्रकाशका हिन्दी अनुवाद प्रकाशन,आदि, 2013 के अंत तक सम्पन्न हुए। वर्ष 2014 के प्रारम्भ में बहू प्रतिक्षित अखिल भारतीय औदीच्य महासभा का लंबित और संशोधित पंजीयन का काम सम्पन्न होना बड़ी उपलब्धि रही है। 

वर्चस्व की लड़ाई में नेतृत्व का कर्तव्य ।


 वर्चस्व की लड़ाई में नेतृत्व का कर्तव्य । 
   युग परिवर्तन के साथ समाज सेवा भी व्यावसायिकरण की और गति कर रही है।  अभी तक समाज सेवा के क्षेत्र में माना जाता रहा है, की समाज सेवा, सम्पूर्ण समाज को दिशा देने का एक सार्थक प्रयत्न है, अत: समाज सेवकों को सम्मानित किए जाने की परंपरा हो गई। उन्हे मंच पर आसीन कर गुणगान कर शाल-श्रीफल, उपाधियों, आदि विविध प्रकारों से सम्मानित किया जाता देख, अनेक व्यक्तियों में महत्वाकांक्षा का जन्म होने लगा। उन सभी का समाजसेवा के प्रति उत्साहित होना भी एक स्वाभाविक भी था। 

अखिल भारतीय सहस्त्राब्दी समारोह - सिद्धपुर मई 1978 की रिपोर्टिंग -औदीच्य ब्राह्मण समाचार पत्र गुना के सोजन्य से।

औदीच्य ब्राह्मणो के सिद्धपुर में आए एक सहस्र (एक हजार ) वर्ष होने पर एक अभूत-पूर्व सहस्राब्दी समारोह मनाया गया था।  इस समारोह की कवरेज डॉ ओ पी व्यास गुना के द्वारा की जाकर तत्कालीन प्रकाशित "औदीच्य ब्राह्मण समाज " समाचार पत्र गुना  के मई 1978 में प्रकाशित हुआ था। पड़ें और एतिहासिक गौरव से साक्षात्कार करें। इसमें हमारे  क्षेत्र से कई प्रतिनिधि उपस्थित थे- देखे विस्तार से व्योरा . 
- डॉ मधु सुदन व्यास

महासभा महासभा संविधान
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जीवन साथी का चयन - जीवन की एक बड़ी उपलब्धि।

प्रविष्टि ऑन लाइन भेजने के लिए लिंक 

जीवन साथी
  परम पिता परमात्मा ने सृष्टि को प्रकृति, प्रेम, और परिचय से संवार कर मानव जीवन को उर्जा प्रदान की है। प्रकृति ने मानव को सारी सुख सुविधाओं से नवाजा, प्रेम ने मानवीय भावना और अनुभूति को बढाया तो परिचय ने सृष्टि के कण कण को अपनत्व प्रदान किया। सांसारिक कार्यो के लिए साधनों की पूर्ति का मुख्य आधार परिचय है ! हर व्यक्ति अपने  जीविकोपार्जन के सारे सर्व सुलभ साधन एक दूसरे के सहयोग से उपलब्ध करता है किन्तु  अपने बेटे बेटियों के लिए योग्य जीवन साथी का चयन सामाजिक परिचय के बिना संभव नहीं होता है !

उज्जैन औदीच्य समाज वरिष्ठ जन समिति का क्रांतिकारी आयोजन- विधवा, परित्‍यक्‍ता बेटियों के जीवन में इन्‍द्रधनुषीय रंग भरने वालों का सम्मान।

उज्जैन 27/7/2014  
आओ कुछ करें -
शुष्‍क जीवन के केनवास पर दाम्‍पत्‍य जीवन का रंग भरें।  
औदीच्य समाज वरिष्ट जन समिति उज्जैन के तत्वावधान में उज्जैन शहर में 27 जुलाई 14 को दो बड़े ही क्रांतिकारी कार्य सम्पन्न हुए । समाज के दो अविवाहित युवको का जिनमें एक ने एक दो पुत्रियों की माता विधवा औदीच्य युवती से एवं एक ने तलाक प्राप्त युवती से विवाह कर उनके सूने जीवन में रंग भरे, सम्मान हुआ। समाज के वरिष्ठ सदस्यों ने उज्जैन महिला संगठन के सहयोग से इस सम्मान समारोह का आयोजन कर सम्मान पत्र और प्रशंसा द्वारा सम्मानित किया  निश्चय ही भविष्य में ये सारे समाज के लिए बड़े ही अनुकरणीय उदाहरण बनेगे।

चिर यौवन का रहस्य।

चिर यौवन का रहस्य।  
 बूढ़ा कोन ?  क्या आयू  अधिक हो जाने से कोई बूढ़ा है?
मेरे विचार से जब भी जो व्यक्ति किसी भी नई बात को सीख नहीं सकता या नया काम नहीं कर सकता दूसरे शब्दो में कहें तो स्वयं को बदल नहीं सकता वह व्यक्ति ही बूढ़ा होता है।  
आयु की अधिकता या परिपक्वता के समय तक, प्रत्येक मनुष्य का अधिकतम विकास होता रहता है। इस परिपक्व आयु के समय जब उसे लगाने लगता है, की उसका काम पूरा हो गया, उसने सब कुछ जान लिया, और अब जानने या करने योग्य कुछ शेष नहीं बचा है, बस यही वह क्षण है, जहां से व्यक्ति बूढ़ा होना शुरू हो जाता है। उसकी तमाम इंद्रियाँ साथ छोड़ने लगतीं हें।
इसके विपरीत जो व्यक्ति हर समय (आयु की परिपक्वता के बाद भी,) कुछ न कुछ सीखने या जानने का प्रयत्न करता रहता है, वह उत्साही चिर युवा बना रहता है।  कहा गया है - मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
यदि हम यह कामना करते रहें, की हम शतायु होंगे, हमारे सुनने देखें की क्षमता बनी रहेगी, हम दीन हीन, पराधीन नहीं, अपना सब काम स्वयं कर सकते हें, मनुष्य की आयु परमात्मा ने सौ वर्ष दी है तो फिर में निश्चय ही सौ वर्ष तक जीवित रहूँगा। तो कोई कारण नहीं की वह बूढ़ा हो जाए।
शरीर विज्ञानियों ने यह सिद्ध किया है, की शरीर की करोड़ों पुरानी कोशिकाएं प्रति क्षण नष्ट होती हें, और उतनी से अधिक पुन: बन जातीं हें। मस्तिष्क के कोषों पर भी भी जितना अधिक दवाव या जौर डाला जाए, उतने ही अधिक संख्या में, अधिक सक्षम और नवीन बनते रहते हें, और इसके विपरीत जितना अधिक आराम उन्हे दिया जाए, काम न होने से वे उतने ही अधिक तेजी से कम, और निर्बल होने लगते हें।
आयु की परिपक्वता के समय भी यही होता है, अधिकतर व्यक्ति कुछ भी नया सीखने जानने या करने के बजाय यह विचार करते हें, की अब बहुत कर लिया अब तो आराम करना  चाहिए, - बस यहीं से उनका बुढ़ापा शुरू हो जाता है, और वे धीरे धीरे निर्बल, पराधीन बुड्ढे होने लगते हें। कई कम आयु के जवान व्यक्ति भी इसी सौच के चलते असमय बूढ़े हो जाते हें।
बुढ़ापे को दूर रखने का सबसे अच्छा उपाय है, की हम हमेशा अपने मन में अपनी युवावस्था की गतिविधियों को सामने रखें, अपने मन को वैसा ही तरोताजा, प्रफुल्लित लचीला अनुभव करें। शरीर की फिजिकल सक्रियता,और मानसिक सक्रियता वनाए रखने के लिए यही सौचें, कि में सब कुछ कर सकता हूँ, और सतत नया करते रहें, सीखते रहें,  तो बुढ़ापा समय अर्थात सौ वर्ष से पहिले आ ही नहीं सकता।      
डॉ मधु सुदन व्यास

26 जुलाई 2014        

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श्रीस्थल प्रकाश हिन्दी भाष्यांतर ग्रंथ का उसके संपादक मण्डल द्वारा, सिद्धपुर गुजरात में भगवान गोविंद माधव के चरणों में समर्पण।

उज्जैन 14 फरवरी 2014

    श्रीस्थल प्रकाश हिन्दी भाष्यांतर ग्रंथ संपादक मण्डल का सिध्दपुर भ्रमण।
सिद्धपुर यात्रा के अन्य  ओर फोटो लिंक 
      इतिहास सदैव भूतकाल की स्मृतियों/ घटनाओं का लेखा जोखा सुरक्षित रखता है, और जिज्ञासु भूतकाल से वर्तमान एवं भविष्य के हितार्थ कुछ संदर्भ खोजने का प्रयास करता है। इसी जिज्ञासा और श्रीस्थल प्रकाश हिन्दी भाष्यांतर ग्रंथ का सिद्धपुर गुजरात में भगवान गोविंद माधव के चरणों में समर्पण हेतु ‘‘ श्री स्थल प्रकाश’’ हिन्दी भाषान्तर ग्रन्थ के सम्पादक गण, श्री प्रकाश दुबे, डॉ मधुसूदन व्यास, उद्धव जोशी, एवं सोहन पण्ड्या व्दारा औदीच्य ब्राह्मणों के पवित्र तीर्थस्थल सिध्दपुर की यात्रा 4 फरवरी से 8 फरवरी तक की गई।

स्वरूचि भोज की अंतव्यथा।

  स्वरूचि भोज की अंतव्यथा - भोजन का अपव्यय रोकना होगा।
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    मेरा जन्म बफे पार्टी के नाम से पाश्चात्य सभ्यता में हुआ। जहां थोडी सी जगह में, कम लोगों को, अच्छी सेवा, सुन्दर सजावट और मधुर स्वाद के साथ मैं अपनी सेवा देता आ रहा था। पश्चिम के लोग तो अपने हाथों से खाना लेकर खाना पसन्द करते हैं! वहां एक दूसरे को परोसने की संस्कृति कभी पनपी ही नहीं!  मंहगे सूट, मंहगे शुज तथा खडे खडे ही खाने की आदत, ने मुझे चलन में ला दिया। एक देश में दूसरे देश के निवासीयों का जब से आवागमन शुरू हुआ तबसे हर देश की संस्कृति और संस्कार दूसरे देशों में अपने पैर जमाने लग गये ! मैं कब हिन्दुस्तान की सरजमी पर प्रगट हो गया, और प्रचलन में आ गया इसका मुझे पता ही नहीं चला! भारत की सरजमी पर आकर मैं गौरवान्वित तो हूं, क्योंकि यहां जो संस्कृति, संस्कार, प्रेम और परिवार है, वैसा अन्य किसी देश में मुझे देखने को नहीं मिला। यहां आकर मैं स्वयं को अकेला महसूस कर रहा हूं, क्योंकि मेरे अन्य सहोदर जो भारत वासियों को पत्तलों पर प्रेम भाव के साथ भोजन कराते थे, मेरे आगमन से धीरे धीरे विलुप्त होने लगे।

''वर्तमान की महती आवश्‍यकता'' परिचय सम्‍मेलन''

''वर्तमान की महती आवश्‍यकता'' परिचय सम्‍मेलन''
उद्धव जोशी
  मानव का स्‍वभाव है, अपने से इतर दूसरों से परिचय करना और परिचय की अनमोल विशेषता है, समान विचारधारा वालों को आपस में मिला कर अर्न्‍तमन में ऐसी ज्‍योति जला देता है, जिसके व्‍दारा सब एक दूसरे से भावना और आत्‍मा से जुडें । युवा युवति के मन में जब कोमल भावनाऐं पनपती है, वाणी बोलने में कंजुसी बरतती है, नयन अपनी शैली में जीवन साथी चयन का संकेत देते हैं, तब चेहरा निखर उठता है, और परिचय, पहचान में बदल कर प्रगाढ रिश्‍ते में ढल जाता है। 
सदियों से करते हें, माता पिता अपने बच्‍चों के लिए जीवन साथी का चयन!

जन्‍म पत्रिका बनाम वैवाहिक संबंध

           मानव मस्तिष्‍क सदैव कुछ नया करने की और अग्रसर होता रहता है। इसी कडी में उसके दिमाग ने इस विचार को जन्‍म दिया की भूतकाल की जानकारी हमारे पास मौजूद है, वर्तमान को जीते हुए हम निकट से उसे देख रहे हें, तो भविष्‍य को भी जानना आवश्‍यक है, और जन्‍म समय को  आधार मान कर ग्रह नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार जन्‍म कुण्‍डली बनाई जाने लगी।

नव दम्‍पत्तियों के चूर चूर होते सपने।

तलाक पर लगाओ लाक, दाम्‍पत्‍य जीवन न करो खाक
भावों के स्‍पन्‍दन से गणनायक,प्रथम आपका वन्‍दन है। 
मंगल कार्य विवाह का रिध्दिसिध्‍दी संग आमन्‍त्रण है॥
    16 संस्‍कारों के कल्‍पतरू से विवाह संस्‍कार की उडान भरने वाले नव दम्‍पत्तियों के भावी जीवन को सुखी देखने एवं विवाह कार्य निर्विध्‍न रूप से सम्‍पन्‍न हो इसके लिए माता पिता, सगे संबंधी, गणनायक गजानन को रिध्‍दी सिध्‍दी सहित आने का प्रथम निमन्‍त्रण पत्रिका के माध्‍यम से देते हैं।

संयुक्‍त परिवार अर्थात आम के आम ' गुठलियों के दाम?

कहावतें अनुभवों का खजाना समेट कर चंद शब्‍दों का अमूल्‍य इतिहास अपनी तिजोरी में छिपा कर रखती है। आम का वृक्ष जड से लेकर गुठलियों तक के सारे अंगो को मानव कल्‍याण के लिए समर्पित कर देता है। आम की जड,तना,शाखाऐं अग्निहोत्र के काम आकर पत्तियों को मंगल कार्यो में तोरण बना कर लटकाया जाता है। आम की छाया के नीचे विश्राम कर थका हुआ इन्‍सान अपनी सारी थकान भूल कर तरोताजा हो जाता है। कच्‍चा आम लोंजी,चटनी,पना आदि के रूप में मानव को स्‍वाद की अनूभूति कराते हुए बीमार होने से बचाता है। पका रसीला आम चूस कर खाने ,रस बना कर खाने और रस के पापड बनाने के काम आता है। आम की गंठली पुन बीज बनकर तथा दवाई के रूप में अपने दायित्‍व का निर्वहन करती है। इसीलिए कहा गया है आम के आम और गुठलियों के दाम।
 '' देर आयद दुरूस्‍त आयद'' या सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते'
की तर्ज पर फिर से संयुक्‍त परिवार रूपी आम के  वृक्ष की शीतल और घनी छाया में
आ जावे तो आम के मीठे फल की तरह सभी सुख उसकी गोदी में आ जावेगें।
        आम के वृक्ष की तरह ही संयुक्‍त परिवारभी  जागरण से शयन तक जनहिताय, जनसुखाय के काम ही करता रहता है। कहावत है, कि एक फुल से माला नहीं बनती उसके लिए कई रंगों के फूल चाहिए। इसी प्रकार संयुक्‍त परिवार की माला भी कई फूलों  जैसे कोमल रिश्तों  यानी दादा दादी, ताऊ ताई, माता पिता, भाई बहन आदि से गूथ कर बनती है ।
        संयुक्‍त परिवार का पहला शब्‍द ''स'' कई शब्‍दों की उर्जा का समेटे हुए है जैसे सुख, सेवा, स्‍वागत,
समानता, सरलता, मेहमान नवाजी आदि आदि। भले ही संयुक्‍त परिवार,एकल परिवारों में सिमट रहे हैं, किन्‍तु वे अपने महत्‍व को बरकरार बनाये हुए हैं। हम महसूस करें की संयुक्‍त परिवार  की प्रभात में  कितनी ताजगी समाहित है। अल सुबह अनाज पीसती घटिटयों  के सुर से सजी महिला संगीत की मीठी मीठी धुन, कुवों पर खनकती  गगरा बटलोई  के मिलन की मधुर ध्‍वनि, प्रणाम और आशीर्वाद की सरसराहट, मां की थपकी से बच्‍चों का जागना, आदि आदि। संयुक्‍त परिवार की सुबह, दोपहर, सांझ और रात के अंक में कर्त्‍तव्‍य, कर्मठता, ममता और आत्‍मीयता का भाव छिपा रहता था। संयुक्‍त परिवार के सदस्‍यों के दिलों में धन लिप्‍सा का भाव न होकर एक दूसरे के दिलों में समा जाने की जिजिविषा रहती थी। घर का मुखिया सबके अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य  का ध्‍यान रखते हुए कहा करते थे, कि सुबह का आहार राजा की तरह, दोपहर का युवराज की तरह और रात का भोजन कंगाल  की तरह याने हलका  करना चाहिए। बीमारीयों का संयुक्‍त  परिवार से कोई रिश्‍ता नहीं होता था। यदि कुछ हुआ भी तो दादी नानी की दवाई घर के चौके की डिस्‍पेन्‍सरी से दे दी जाती थी। परिवार के सभी सदस्‍य  सुरक्षि‍त और स्‍वतंत्र  जीवन यापन  करते थे।
      अब आज के एकल परिवार के हालात पर गौर करें तो मोरनिंग की शुरूवाद शमशान सी वीरानी से शुरू होती है। देरी से उठना, झाडू, पोछे, बर्तन और खाना बनाने वालीयों पर निर्भर रहना, बच्‍चे आया के सुपुर्द, सौंदर्य प्रसाधनों की भरमार, क़ृत्रिम हंसी का झलकना, नौकरी का टेंशन, चेहरे पर चिडचिडाहट, बुजुर्गो से एलर्जी, आत्‍मविश्‍वास की भारी कमी, असुरक्षितता, पति पत्‍नी की नोक झोंक जैसे अनेक जोखीमों के जख्‍मों से पीडित होता है। कितना कुछ कष्‍ट है,  एकल परिवार में किन्‍तु फिर भी थोथा चना बाजे घना  की तर्ज पर नकली सुख का जीवन जी रहे हैं।
      '' देर आयद दुरूस्‍त आयद'' या सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते' की तर्ज पर फिर से संयुक्‍त परिवार रूपी आम के  वृक्ष की शीतल और घनी छाया में आ जावे तो आम के मीठे फल की तरह सभी सुख उसकी गोदी में आ जावेगें। एकल परिवार की ग्रहिणियां संयूक्‍त परिवार में यदा कदा कुकुरमुत्‍तों की तरह उत्‍पन्‍न होने वाले वाद विवादों नजर अंदाज कर एकल से विविधता में आने का साहस करें तो अधिक लाभ में रहेगी ।
  उद्धव जोशी, एफ 5/20 एलआयजी ऋषिनगर उज्‍जैन
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इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा है|