उदीच्य या औदीच्य का अर्थ है, उदीची या सूर्य के उदित होने की दिशा, भारत का उत्तर पूर्व भू भाग, जहाँ प्रमुख रूप से हिंदी भाषियों का निवास है|
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विवाह निश्चित करने के लिए, जन्म पत्रिका मिलाने
से अधिक जरुरी, कुछ और है?
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| औदीच्य वैवाहिकी विज्ञापन सेवा |
पिछले दो तीन
दशक से जन्म कुंडली मिलाने का चलन, चरम सीमा पर है, आज “पड़े-लिखे” जो स्वयं को विद्वान समझते हें वे भी कुंडली मिलान को
प्राथमिक आवश्यकता मान रहे हें| जबकि 30 40 वर्ष पूर्व अधिकांश विवाह कार्य बिना कुंडली मिलाये किये जाते रहे है,
में स्वयं और मेरे हम उम्र अन्य कई मित्र भी बिना जन्म पत्रिका
मिलाये विवाह कर आज भी सुखी जीवन जी रहे हें| जबकि पिछले एक
दशक से जन्म पत्रिकाएं मिलाने के बावजूद भी कई युवा युवती संतान हीनता, तलाक, अलगाव, अथवा
कडुवाहट भरा जीवन जीने के लिए विवश है|
औदीच्य बंधू डिजिटल पत्रिका प्रकाशित होना चाहिए?
प्रिय मित्रो
"औदीच्य बंधू मासिक पत्रिका" वर्ष २०१२ से सतत जनवरी २०१७ तक डिजिटल प्रकशन के रूप में हम आपको उपलब्ध करते रहें है|
समाज संगठन, बंधू सम्पादन / व्यवस्था आदि परिवर्तन से फरवरी 17 से हमको मेल से प्राप्त होने वाली (पीडीएफ औदीच्य बन्धु) प्राप्त न होने के कारण हम आपको "डिजिटल पत्रिका उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हें|
“ठाकुर सुहाती या चापलूसी स्वीकार न करने पर “औदीच्य बंधू” मासिक इन्दोर के सम्पादक मंडल में परिवर्तन संभावित?
जनवरी औदीच्य बंधू का डिजिटल एडिशन
प्रस्तुत है विचारने योग्य इस लेख के साथ-
“ठाकुर सुहाती या चापलूसी
स्वीकार न करने पर “औदीच्य बंधू” मासिक इन्दोर के सम्पादक मंडल में परिवर्तन
संभावित?
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| औदीच्य बंधू जनवरी 17 डिजिटल अंक |
औदिच्य बंधू मासिक पत्रिका का दिसमबर
के बाद अब पुन: जनवरी 17 का नव वर्ष का नया अंक सम्पादक मंडल के नामों से रहित, अपने
आप में विशेष हैI दिसम्बर के पिछले अंक से ही पूर्व सम्पादक मंडल प्रमुख सर्व श्री
ओंम ठाकुर, संपादक सर्व श्री धर्मेन्द्र रावल, सर्व श्री उद्दव जोशी प्रबंध संपादक
सर्व श्री मनमोहन ठाकर जी के नाम उनकी जगह देखने नहीं मिले प्रमुख संपादक श्री ओम
जी के सत्य को इंगित करता हुआ लेख दिसंबर अंक में देखा गया था, नई पुन: पीड़ा के
साथ लिखा गया स्वतंत्र कलम से लिखा गया शायद अब अंतिम लेख हो सकता हैI
जैसा की सभी जानते हें की पिछले दिनों
अखिल भारतीय औदिच्य महासभा अध्यक्ष के चुनाव आर्थिक धरातल पर वर्चस्व की भावना
स्थापित करने के उद्देश्य से लादे गए थे, जिन्हें महत्वाकांक्षियों ने अपने पक्ष
में कर लिया थाI इसके बाद अगले चरण में स्वतंत्र पत्रिका औदिच्य बंधू जिसके जन्म के लिए
महासभा की कोई भूमिका नहीं हैI
लेख आमंत्रित- विषय- हिन्दुओं में विवाह संस्कार दिन में क्यों न करें? वर्ष भर विवाह क्यों नहीं हो सकता?
हिन्दुओं
में विवाह रात्रि में क्यों होने लगे हैं ?
क्या कभी आपने सोंचा है कि हिन्दुओं में रात्रि को विवाह क्यों होने लगे हैं, जबकि हिन्दुओं में रात में शुभकार्य करना अच्छा नहीं माना जाता है? रात को देर तक जागना और सुबह को देर तक सोने को, राक्षसी प्रव्रत्ति बताया जाता है. रात में जागने वाले को निशाचर कहते हैं| केवल तंत्र सिद्धि करने वालों को ही रात्री में हवन यज्ञ की अनुमति है| वैसे भी प्राचीन समय से ही सनातन धर्मी हिन्दू दिन के प्रकाश में ही शुभ कार्य करने के समर्थक रहे है| तब हिन्दुओं में रात की विवाह की परम्परा कैसे पडी ?
लेख आमंत्रित - लेख आमंत्रित- विषय-
क्या कभी आपने सोंचा है कि हिन्दुओं में रात्रि को विवाह क्यों होने लगे हैं, जबकि हिन्दुओं में रात में शुभकार्य करना अच्छा नहीं माना जाता है? रात को देर तक जागना और सुबह को देर तक सोने को, राक्षसी प्रव्रत्ति बताया जाता है. रात में जागने वाले को निशाचर कहते हैं| केवल तंत्र सिद्धि करने वालों को ही रात्री में हवन यज्ञ की अनुमति है| वैसे भी प्राचीन समय से ही सनातन धर्मी हिन्दू दिन के प्रकाश में ही शुभ कार्य करने के समर्थक रहे है| तब हिन्दुओं में रात की विवाह की परम्परा कैसे पडी ?
लेख आमंत्रित - लेख आमंत्रित- विषय-
1-
हिन्दुओं में विवाह संस्कार दिन में क्यों न करें?
रात्रि कालीन विवाह विषयक
निम्न (*हिन्दुओं में विवाह रात्रि में क्यों होने लगे हैं ?*)
लेख नीचे देखें (जानकारी) फेस बुक/मिडिया आदि पर देखी जा रही
है|
यदि
हिन्दू समाज में यह परिवर्तन लाया जा सके तो अनावश्यक व्यय जो रात्रि विवाह
में होता है बचा जा सकेगा| प्रदर्शन/ आडम्बर कम होंगे / आदि अनेक लाभ होंगे|
आप देश क्या कहते हें वे इस बारे में मोलिक लेख
के रूप में भेजने का कष्ट करें, लेख औदिच्य बंधू (वेव)
में प्रकाशित होगा, पत्रिकाओं में भी प्रेषित किया जायेगा|
2-
वर्ष भर विवाह क्यों नहीं हो सकता? -
देश में भोगोलिक परिस्थिति/ कृषि कार्य / आवागमन विकल्प /क्षेत्रीय
समस्याएं आदि कई कारणों के चलते विवाह विशेष मुहूर्त में देव प्रबोधनी एकादशी से
देव शयनी एकादशी के मध्य ही संपन्न होते रहे है|
वर्तमान समय में अब एसी कोई समस्या नहीं है|
चार माह तक विवाह करने के स्थान रिक्त रहते हें, विशेष मुहूर्त के चलते उन विशेष दिनों में धर्मशाला, होटल, और विवाह मंडप आदि का व्यय सबके सामर्थ्य से
अधिक हो रहा है| कई हिन्दू जातियों और पंजाब आदि
प्रदशों वर्ष भर किये जाते हें और मुहूर्त न होने से भी कोई हानि नहीं होती|
लाभ यह होता है की आर्थिक संसाधन और बेंड बाजा /घोड़ी / स्थान/ आदि आदि आसानी से कम व्यय पर जुटाए जा सकते हें|
·
तो फिर अब क्यों नहीं
परिवर्तन किया जा सकता?
·
किस काल से और क्यों यह
परम्परा जारी है?
·
इस विषयक प्रमाण क्या
है?
·
आदि आदि अनेक बातों पर
विचार कर लेख आमंत्रित है-
e Mail <audichyamp@gmail.com>
पता - मधु सूदन व्यास
एम् आई जी 4/1 प्रगति नगर उज्जैन mp
०७३४-२५१९७०७
*हिन्दुओं में विवाह रात्रि में क्यों होने लगे हैं ?* लेखक अज्ञात कभी हम अपने पूर्वजों के सामने यह सवाल क्यों नहीं उठाते हैं या स्वयं इस प्रश्न का हल क्यों नहीं खोजते हैं? दरअसल भारत में सभी उत्सव एवं संस्कार दिन में ही किये जाते थे, माँ सीता और द्रौपदी का स्वयंवर भी दिन में ही हुआ था, प्राचीन काल से लेकर मुगलों के आने तक भारत में विवाह दिन में ही हुआ करते थे| मुस्लिम पिशाच* आक्रमणकारियों के भारत पर हमले करने के बाद ही, हिन्दुओं को अपनी कई प्राचीन परम्पराएं तोड़ने को विवश होना पडा था| मुस्लिम पिशाच आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर अतिक्रमण करने के बाद भारतीयों पर बहुत अत्याचार किये गये| यह आक्रमणकारी पिशाच हिन्दुओं के विवाह के समय वहां पहुच कर लूटपाट मचाते थे| कामुक अकबर के शासन काल में, जब अत्याचार चरम सीमा पर थे,तो मुग़ल सैनिक हिन्दू लड़कियों को बलपूर्वक उठा लेते थे और उन्हें अपने आकाओं को सौंप देते थे.| भारतीय ज्ञात इतिहास में सबसे पहली बार रात्रि में विवाह सुन्दरी और मुंदरी नाम की दो ब्राह्मण बहनों का हुआ था,जिनका विवाह दुल्ला भट्टी ने अपने संरक्षण में ब्राह्मण युवकों से कराया था. उस समय दुल्ला भट्टी ने अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाये थे.| दुल्ला भट्टी ने ऐसी अनेकों लड़कियों को मुगलों से छुडाकर, उनका हिन्दू लड़कों से विवाह कराया था |उसके बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों के आतंक से बचने के लिए हिन्दू रात के अँधेरे में विवाह करने लगे.\ लेकिन रात्रि में विवाह करते समय भी यह ध्यान रखा जाता है कि नाच -गाना, दावत,जयमाल, आदि भले ही रात्रि में हो जाए लेकिन वैदिक मन्त्रों के साथ फेरे प्रातः पौ फटने के बाद ही हों.पंजाब से प्रारम्भ हुई परंपरा को पंजाब में ही समाप्त किया गया|
समाज हित में प्रकाशित।आपको कोई जानकारी पसंद आती है, ऑर आप उसे अपने मित्रो को शेयर करना/ बताना चाहते है, तो आप फेस-बुक/ ट्विटर/ई मेल आदि, जिनके आइकान नीचे बने हें को क्लिक कर शेयर कर दें।
महासभा अध्यक्ष(औदीच्य ब्राह्मण समाज) के चुनाव में बड़ी -छोटी सम्भावाद|
महासभा अध्यक्ष(औदीच्य ब्राह्मण समाज) के चुनाव में बड़ी -छोटी सम्भावाद|
अखिल भारतीय औदीच्य महासभा के चुनाव 11 जनवरी 15 में हुए हंगामें के विषय में एक बात शोध में हमारे सामने आई है, वह यह की चूँकि श्री रघुनन्दन जी शर्मा छोटी सभा के हैं इसलिए उन्हें नहीं बनाने देना| हालाँकि
यह भी सही है की बड़ी सभा के बहुत से सदस्य और प्रभावशाली इस छोटी बड़ी संभा भेद को नही मानते|
अखिल भारतीय औदीच्य महासभा के चुनाव 11 जनवरी 15 में हुए हंगामें के विषय में एक बात शोध में हमारे सामने आई है, वह यह की चूँकि श्री रघुनन्दन जी शर्मा छोटी सभा के हैं इसलिए उन्हें नहीं बनाने देना| हालाँकि यह भी सही है की बड़ी सभा के बहुत से सदस्य और प्रभावशाली इस छोटी बड़ी संभा भेद को नही मानते|
इस परिस्थिति में में यह बात बता देना आवश्यक समझ्र रहा हूँ, की सभी समाज जन जिनमें बड़ी सभां के लोग भी सम्मलित हें, वे स्वयं नहीं जानते की बड़ी संभा कहाँ से उत्पन्न हुई, |
दोराहे पर खड़ा है औदीच्य समाज!- क्या सपने टूट जायेंगे?
दोराहे पर खड़ा है औदीच्य समाज!-
क्या सपने टूट जायेंगे?
अखिल भारतीय औदीच्य महासभा का शुभारंभ आषाढ
क्रष्णपक्ष 10 संवत 1960
सन 1903 में मथुरा में हुआ था। सौ वर्षों के इस इतिहास में लगभग सभी महासभा
अध्यक्षों के कार्यकाल में कुछ न कुछ होता ही रहा है।
1903 से वर्ष 2014 तक महासभा के कई सम्मेलन या बेठकें हुई, पर जो उपलब्धि विगत चार
वर्षों में, (वर्ष २०१० से २०१४ तक) उल्लेखनीय कार्य हुए, एसा पूर्व में कभी नही हुआ
था। वर्ष 2009 से अखिल
भारतीय औदीच्य महासभा के अध्यक्ष पद पर श्री रघुनन्दन जी शर्मा के सर्व सम्मति से
निर्वाचित होने के पश्चात, महासभा जैसे सोते से जग उठी। नए परिवर्तन, विकेन्द्रीकरण के अंतर्गत
प्रादेशिक और जिला इकाइयों का गठन, महिला एवं युवा प्रदेश और
जिला इकाइयो का गठन, अभूतपूर्व सदस्यता अभियान, कई साधारण ओर विशेष सभाओं का केंद्र, प्रादेशिक और
जिला स्तर पर आयोजन कई एतिहासिक निर्णय, गुजरात के औदीच्य
बंधुओं को जोडेने का कार्य, समाज से संबन्धित पुस्तक
श्रीस्थल प्रकाश” का हिन्दी अनुवाद प्रकाशन,आदि, 2013 के अंत तक सम्पन्न हुए। वर्ष 2014 के प्रारम्भ में बहू प्रतिक्षित अखिल भारतीय
औदीच्य महासभा का लंबित और संशोधित पंजीयन का काम
सम्पन्न होना बड़ी उपलब्धि रही है।
वर्चस्व की लड़ाई में नेतृत्व का कर्तव्य ।
वर्चस्व की लड़ाई में नेतृत्व का कर्तव्य ।
युग परिवर्तन के साथ समाज सेवा भी
व्यावसायिकरण की और गति कर रही है। अभी तक समाज सेवा
के क्षेत्र में माना जाता रहा है, की समाज सेवा, सम्पूर्ण समाज को दिशा देने का एक सार्थक प्रयत्न है, अत: समाज सेवकों को सम्मानित किए जाने की
परंपरा हो गई। उन्हे मंच पर आसीन कर गुणगान कर शाल-श्रीफल, उपाधियों,
आदि विविध प्रकारों से सम्मानित किया जाता देख, अनेक व्यक्तियों में महत्वाकांक्षा का जन्म होने लगा। उन सभी का समाजसेवा
के प्रति उत्साहित होना भी एक स्वाभाविक भी था।
कार्तिक पूर्णिमा और गोविन्द माधव जयंती की शुभकामनाये.
जय गोविन्द माधव
आज
कार्तिक पूर्णिमा अर्थात हम सब औदीच्य ब्राह्मणों के गुजरात सिद्धपुर आने की वर्ष
ग्रंथि| इस दिन की याद् हम अपने इष्ट देव भगवान गोविन्द माधव की जयंती के रूप में
आयोजित करते हें. आज से लगभग एक हजार छब्बीस वर्ष पूर्व उत्तर दिशा से आये
ब्राह्मण जो उदीच्य ब्राहमण कहाते थे| सिद्धपुर आकर सहस्र औदीच्य ब्राह्मण कहाने
लगे| कालांतर में मुस्लिम आक्रमण कारियों के गुजरात आक्रमण, परिवार बड़ने आजीविका
प्राप्ति हेतु अपनी महाराजा मूलराज सोलंकी द्वारा प्रदत्त ग्राम और जागीर को छोड़कर
अन्यत्र जाना पड़ा| जो देश के विभिन्न भागों विशेषकर तीर्थ क्षेत्रों में स्थापित
हुए|
देव
दुर्देव से विपत्ति के कारण हम सबका वैदिक ज्ञान निरंतर अभ्यास की कमी और नई पीडी
को न मिल पाने से नष्ट प्राय हो गया| पिछले पांच विशेषकर २०० वर्ष पूर्व की दासता ने
और भी रहा सहा नष्ट कर दिया| आज हमारे पास ब्राहमण कहलाने लायक केवल नाम रह गया
है| हालाँकि वैदिक ज्ञान के अतिरक्त अन्य ज्ञान की प्राप्ति में समाज ने विश्व में
अपना विशेष स्थान पाया है, इस बात का प्रमाण हमारे कई विद्वतजन वैज्ञानिक,
शोधकर्ता, आदि हें|
एक
बात और जो हमको एक सूत्र में बांधती है वह है, कुलदेवी, इष्ट देव आदि की आराधना|
हम गुजरात से चलकर छोटे बड़े कई समूहों में अलग अलग ग्राम, शहरों में पहुंचे, जहाँ
आजीविका की प्राथमिकता ने सब कुछ अन्य पीछे छोड़ दिया, हम अपने इष्टदेव गोविन्द माधव
से दूर क्या हुए उन्हें भुला बैठे|
अब
जबकि हम सक्षम हें, संपन्न भी हें, और अब
अधिक संख्या में भी हें, तो हमको अपनी विरासत अपनि संतानों को देनी ही होगी|
कार्तिक पूर्णिमा पर हम भगवान गोविन्द माधव की जयंती मना कर संगठन इस महत कार्य को
पूरा कर रहे हें, हमारी आने वाली पीडी हमारे प्राचीन गौरव को जाने, ही नहीं उसको
जीवन में उतारकर पुन: समाज में श्रेष्टता स्थापित कर सके, और राजा और राज्य का सिर
मोर बनकर रहे, फिर अब तो राजा तलवार के जोर पर न बनकर वोट के जोर पर बनते हें तो
हम सब भी संगठित होकर स्वयं शासक प्रशासक या नियंत्रक बन कर गोरव स्थापित क्यों न
करें|
भगवान
गोविन्द माधव जयंती के इस अवसर पर और अनेक अवसर तलाश कर, हम इसी तरह एकत्र हों, यह
संगठन आगे बढाएं, वह शक्तिशाली बने इसी भावना के साथ सभी को शुभ कामनाएं|
डॉ मधु सूदन व्यास
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औदीच्य ब्राह्मणो के सिद्धपुर में आए एक सहस्र (एक हजार ) वर्ष होने पर एक अभूत-पूर्व सहस्राब्दी समारोह मनाया गया था। इस समारोह की कवरेज डॉ ओ पी व्यास गुना के द्वारा की जाकर तत्कालीन प्रकाशित "औदीच्य ब्राह्मण समाज " समाचार पत्र गुना के मई 1978 में प्रकाशित हुआ था। पड़ें और एतिहासिक गौरव से साक्षात्कार करें। इसमें हमारे क्षेत्र से कई प्रतिनिधि उपस्थित थे- देखे विस्तार से व्योरा .
- डॉ मधु सुदन व्यास
महासभा महासभा संविधान
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जीवन साथी का चयन - जीवन की एक बड़ी उपलब्धि।
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परम पिता परमात्मा ने सृष्टि को प्रकृति, प्रेम, और परिचय से संवार कर मानव जीवन को उर्जा प्रदान की है। प्रकृति ने मानव को सारी सुख सुविधाओं से नवाजा, प्रेम ने मानवीय भावना और अनुभूति को बढाया तो परिचय ने सृष्टि के कण कण को अपनत्व प्रदान किया। सांसारिक कार्यो के लिए साधनों की पूर्ति का मुख्य आधार परिचय है ! हर व्यक्ति अपने जीविकोपार्जन के सारे सर्व सुलभ साधन एक दूसरे के सहयोग से उपलब्ध करता है किन्तु अपने बेटे बेटियों के लिए योग्य जीवन साथी का चयन सामाजिक परिचय के बिना संभव नहीं होता है !
पारिवारिक समस्याएँ और निवारण।
पति-पत्नी
में झगड़ा होना आज आम समस्या हो रही है। छोटा मोटा हल्का फुल्का विवाद होना तो कोई
खास बात नहीं, पर यह झगड़ा
अधिक बड जाए और मार पीट तक पहुँच जाए तो यह अति वाद है।
पुरुष
प्रधान हमारे समाज में पुरुष स्वयं को पूर्ण निर्णायक मान कर चलता है। एसे में जरा
भी विरोध उसके अहंकार को ठेस पाहुचाने लगता है। वर्तमान में महिलाओं ने भी शिक्षा
के क्षेत्र में भी समकक्षता प्राप्त कर ली है। एसे में जब पती और पत्नी
दोनों ही समकक्ष योग्यता धारी हों तो अकसर समस्या और बड़ जाती है।
वर्तमान
में सुख सुविधा की अधिक चाह ने अपने बेटे के विवाह हेतु समकक्ष या अधिकतम योग्यता
धारी बहू लाने जिससे अधिकतम सुख के साधन प्राप्त किए जा सकें,
लाने की इच्छा पेदा कर दी है।
विवाहोपरान्त
यदि पुरुष का पद और वेतन अधिक है, तब
तो अधिकतर ठीक हो सकता है,
परंतु यदि महिला का पद बड़ा या बराबर का
हुआ तो महिला भी परिवार में अपना सम्मान पुरुष के समान ही पाने की इच्छा रखने लगती
हें। यह गलत भी नहीं है।
उज्जैन औदीच्य समाज वरिष्ठ जन समिति का क्रांतिकारी आयोजन- विधवा, परित्यक्ता बेटियों के जीवन में इन्द्रधनुषीय रंग भरने वालों का सम्मान।
उज्जैन
27/7/2014
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| आओ कुछ करें - शुष्क जीवन के केनवास पर दाम्पत्य जीवन का रंग भरें। |
‘ नो उल्लू बनाविंग ‘‘
‘ नो उल्लू बनाविंग ‘‘
आज कल बडे जोर शोर से धूम मचा रहा है एक स्लोगन ‘‘ नो उल्लू बनाविंग‘‘ क्यों कि हम सब एक दूसरे को कहीं न कहीं उल्लू बनने/बनाने में लगे है। इस विज्ञानमय जगत में हर आदमी तत्काल हाजिर जवाब देकर कह देता है कि ‘‘नो उल्लू बनाविंग‘‘।
॥श्रीस्थल प्रकाश को घर-घर का प्रकाश बनाएँ॥
श्रीस्थल प्रकाश को समाज के घर-घर का प्रकाश बनाएँ।
सहस्रौदीच्यों के गौरव की गाथा अगली पीढ़ी भी गायें ॥
जीवन संघर्ष रत वे जाति जो अपना इतिहास सुरक्षित रखती हें वे ही ठहर पातीं हें। एक नेत्रहीन व्यक्ति की तरह अल्पसंख्यक और शांति प्रिय जातियाँ इतिहास के माध्यम से ही अपनी उन्नति का मार्ग टटोल सकतीं हें। वर्तमान दादागीरी, दवंगता, और विद्वत जन के प्रति नित नए हो रहे षडयंत्रों के विरुद्ध शुद्ध, सात्विक और प्रताड़ित जातियों को उनके जींस से प्राप्त ज्ञान, बल, को स्मरण कराने के लिए इतिहास से बढ़कर कोई साधन नहीं है।
दहेज में कार या हाथी बांधा द्वार ?
कन्या और कार
पुत्री परिवार की पावनता, कन्या कलियों की मुस्कार, और बेटी बचपन का संस्कार, जैसे अलंकरणों से युक्त है। बेटी माँ की गोद से लेकर गोदावरी के किनारों तक अठखेलियाँ करते हुवे पुष्पित,पल्लवित हो, कन्या का रूप ग्रहण कर लेती है । इसी बेटी पुत्री, कन्या को कवियों, साहित्यकारों,कथाकारों, सन्तो, महन्तों ने मासूम शब्दों,आदर सूचक वर्णनों एवं उपदेशों से नवाजा है। ‘‘बेटी बेटा एक समान ‘‘ के पाठ का पय पान सभी लोग एक दूसरे को कराने में लगे हैं, और बेटीयों पर जुल्म की इन्तहा भी कर रहे हैं। दोनों का महत्व अपनी अपनी जगह है किसी को समझाने से कोई असर नहीं होगा। समय आने पर परिवार खुद ब खुद इसका एहसास कर लेता है।श्रीस्थल प्रकाश - क्या है?
श्रीस्थल प्रकाश
प्राप्ति स्थान-
श्रीस्थल प्रकाश
किंवा (अथवा) उदीच्य प्रकाश जैसा की नाम से जाना जा सकता है,
श्रीस्थल अर्थात सिद्धपुर में प्रकाशित होने वाले, उत्तर भारत से आए (उदीची)
ब्राह्मणो का संस्कृत वर्णित इतिहास गाथा है। पौराणिक शैली में गुरु- शिष्य संबाद
के रूप में दो खंडो में लिखा गया एक महत्व पूर्ण प्राचीन ग्रंथ है।
मूल स्वरूप के इस
ग्रथ के रचना कार “ ठाकुर पुरुषोत्तम शर्मा” ने ग्रंथ रचना कब की यह शोध का विषय
है। इसका प्रथम गुजराती भाषांतर का प्रकाशन अहमदवाद के श्री ठाकुर प्राण गोविंद राजाराम जी ने किया था।
श्री ठाकुर प्राणगोविंद जी की प्रेरणा से स्व. श्री शास्त्री अमृतराम
करुणा शंकर ठाकर जी ने संबत 1929 (सन 1872) में इस ग्रंथ की अशुद्धियाँ सुधार कर गुजराती
भाषांतर तैयार करवाकर प्रकाशित किया था। यह हिन्दी भाषांतर संबत 2058 सन 2002 में प्रकाशित
इसी ग्रंथ से, जो हमको श्री अजीत
भाई मरफतिया (त्रिवेदी) सिद्धपुर से प्राप्त हुआ था, पर आधारित है।
सहस्र औदीच्य ब्राम्हणौ
से संबन्धित अन्य प्रकाशित पुस्तकों में से प्रमुख रूप से ब्राम्हण उत्पत्ति
मार्तंड, औदिच्य रहस्य, गोत्र प्रवर भास्कर, औदीच्य गोत्रावली, औदीच्य रत्न माला, आदि लघु पुस्तकें इसी श्रीस्थल प्रकाश पर आधारित है।
श्रीस्थल प्रकाश
के प्रथम खंड में प्राचीन श्रीस्थल(सिद्धपुर) ओर वहाँ के पावन तीर्थ स्थानो की
भव्यता का वर्णन है, द्वितीय खंड या उतरार्ध में दसवीं /ग्यारहवीं
सदी, के पाटन(गुजरात) सम्राट मूलराज सोलंकी, का परिचय के साथ प्रायश्चित स्वरूप उनके द्वारा आमंत्रित उत्तर भारत
क्षेत्र के तेजस्वी विद्वान शाके 1037 संवत से अधिक ब्राह्मणो के द्वारा अनुष्टान/
प्रायश्चित यज्ञ/ ओर उन्हे ग्राम दान/ ब्राह्मणो के गोत्र,
अवतंक आदि आदि का वर्णन है।
वर्तमान हिन्दी
भाषी क्षेत्रों में संस्कृत या गुजराती भाषा को जानने की योग्यता न होने से हिन्दी
भाषान्तर की आवश्यकता पूर्त्ति के निमित्त इसका प्रकाशन महासभा द्वारा किया जा रहा
है। 244 मुद्रित प्रष्ट, छह रंगीन फोटो प्रष्ट, ओर
12 अन्य भूमिका आधी के प्रष्टों से युक्त सजिल्द रंगीन ग्लेज्ड आधुनिकतम दोहरे कवर
प्रष्ट से सजी यह 7 ½ गुणा 9 ½ इंच की जिसके
मध्य में राजा मूलराज का ऋषि ब्राह्मणो के स्वागत का चित्र,
ओर आस-पास विंदुसरोवर, भगवान गोविंद माधव, भव्य विखंडित रुद्रमहालय के काल्पनिक चित्र से सजी हें। अंतिम कवर प्रष्ट
पर भग्न रुद्र महालय के चार चित्र के साथ उज्जैन की क्षिप्रा नदी तट पर सिंहस्थ
परिद्रश्य है।
यह आकर्षक ग्रंथ यह कोई कविता कहानी या उपन्यास
की तरह रोचक साहित्य तो नहीं है, पर यह कुल दो सो चौसठ प्रष्ट ओर रु
150/- का यह ग्रंथ जो इसका लागत मूल्य है, हिन्दी भाषी
औदीच्य बंधुओं के घर में रखा जाकर आगामी पीढ़ी को अपनी गौरव पूर्ण संस्कृति ओर
इतिहास से परिचित करवाते रहने का श्रेष्ठ साधन है।
डॉ मधु
सूदन व्यासएम आई जी 4/1 प्रगती नगर उज्जैन 0734-2519707/ e mail-audichyamp@gmail.com
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समाज हित में प्रकाशित।
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"श्रीस्थल प्रकाश" का हिन्दी अनुवाद (भाषांतर)।
सहस्र औदीच्य ब्राह्मण के सिद्धपुर पहुचने की गाथा जो की सदियों पूर्व
साथ ही इसमें सम्मलित है, हिन्दी में वर्तमान तक की औदीच्य ब्राह्मण समाज के दुरस्थ स्थानो तक प्रवास/निवास की संक्षिप्त कहानी ।
यह पुस्तक अखिल भारतीय औदीच्य महासभा के सदस्यों को लगभग आधे मूल्य पर (वास्तविक खर्च मूल्य) पर उपलब्ध होगी।
विमोचन स्थल- महामालव औदीच्य समाज मांगलिक परिसर चिंतामण गणेश रोड उज्जैन।
विमोचन दिनांक-05/जनवरी 2014
विमोचन पश्चात
प्राप्त करने हेतु संपर्क फोन- 0734-2519707 / 0734- 2514343
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मन में संजोए सपने, आए थे युवा सारे, देकर नई दिशाएँ, उज्जयनी समाज ने संवारे।
मन में संजोए सपने, आए थे युवा सारे,
देकर नई दिशाएँ, उज्जयनी समाज ने संवारे।
औदीच्य ब्राहमण समाज उज्जैन, व्दारा परिचय की परम्परा को लगातार पिछले 14
वर्षो से जीवन्त बनाये रख कर, संख्याधिक
अभिभावकों के परिवारों में खुशी, बेटियों
के मांग में सिन्दूर तथा बेटों के सपनों को साकार किया है। सम्मेलन में आये
प्रत्याशियों का कहना है कि हमने अपने जीवन साथी चयन के लिए जो सपने संजोये थे, उन्हे परिचय के माध्यम से समाज ने साकार स्वरूप
दिया।
पूर्व परिचय सम्मेलन समिति द्वारा, इस बार युवा पीढी एवं महिला मण्डल की उर्जा का
सामयिक सदुपयोग करने हेतु, परिचय सम्मेलन
की बागडोर, उज्जैन नगर के
युवा एवं महिला संगठन को जिस विश्वास के साथ सौंपी गई थी जो सफल आयोजन से पूर्ण
हुई। |
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