तन को चाहे नर रूप बनालो, मन में तो नारी रमी हुई है।

       घर के कोने कोने को वह गुलजार बनाती है । नारी ही घर आंगन में सुख का संसार बसाती है।।
       ग्रहस्‍थ का आधार पत्‍नी ही है। घर की सुरक्षा व्‍यवस्‍था और संचालन का पूर्ण दायित्‍व पत्‍नी पर ही होता है । वह ग्रहस्‍थ रूपी व्रक्ष का मूल है। नारी बहूस्‍वरूपा है , जन्‍म लेकर बेटी,शादी करके बहू,संतान उत्‍पन्‍न कर मां,और अपने घर बहू लाकर सास बन जाती है। इस तरह एक नार संबोधन हजार हो जाते हैं।  छिद्रान्‍वेषण वाला व्‍यक्ति परिभाषित करता है कि जो पति को पत नहीं करे उसे पत्‍नी कहते हैं । यह स्थिति उसी पति के साथ हो सकती है जिसमें पत्‍नी के साथ सहकार की भावना न हो अन्‍यथा पत्‍नी विपरीत अवस्‍था में भी घर की आस्‍था को आंच नहीं आने देती है। ग्रहस्‍थाश्रम का प्रारंभ  विवाह संस्‍कार से होता है। कन्‍या को विवाह के पूर्व तीन देवताओं का आशीर्वाद प्राप्‍त होता है । सोम देवता ,सुशीलता,सौम्‍यता ,रितुजा और विनय,गंधर्व देवता स्‍वर माधुर्य तथा अग्नि देवता तेजस्विता,पवित्रता और प्रगति का आशीष देते हैं ।  मनु का कथन है कि जिस परिवार में स्‍त्री का आदर होता है वहां देवों का वास होता है और सभी प्रकार की श्री व्रध्दि होती है तथा जहां अनादर होता है उस घर की श्री नष्‍ट हो जाती है।
                 जीवन के लिए प्रसन्‍नता रसायन, स्‍वाभाविक सौंदर्य च्‍यवनप्राश और सदव्‍यवहार चुबंक होता है। इन गुणों से लबरेज नारी परिवार और समाज में लोकप्रिय होती है। सुखी ग्रहस्‍थ जीवन भी  नवीन प्रेरणा नव विचार तथा नवयौवन की नींव पर आधारित होता है।  कालिदास ने कुमार संभव में कहा है कि प्रियेषु सौभग्‍यफला ही चारूता , पति की प्रसन्‍नता ही स्‍त्री के सौंदर्य का परम लक्ष है।  आदर्श ग्रहिणी  में सरसता,विनम्रता,सरलता ,क्रदुता,परिश्रमशीलता,कर्मठता  के गुण  ही परिवार को सुखमय और दाम्‍पत्‍य जीवन को अम्रतमय बनाते हैं। दूसरों का सम्‍मान करने से अपना सम्‍मान बढता है । यह सबसे सरल वशीकरण मंत्र है । प्रणाम करते ही दूसरों चित्‍त द्रवित हो जाता है  और अनायास ही वह शुभ वचन कहता है।  अभिवादन शीलस्‍य,नित्‍यं व्रध्‍दोपसेविन । चत्‍वारि तस्‍य वर्धन्‍ते आयुर्विध्‍या यशो बलम। दान का भी जीवन में  महत्‍व है । सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से दान करो । इस प्रकार आदर्श ग्रहिणी में आशीर्वाद लेने और दान देने का स्‍वाभाविक गुण होगा तो  परिवार सुखी और सम्‍पन्‍न रहेगा1  जिस प्रकार जल को पा‍कर व्रक्ष या वनस्‍पति फलते फूलते है  उसी प्रकार सुशील पत्‍नी को पाकर  पति का परिवार आनन्‍दमय होता है।  जैसे नदियों का अस्तित्‍व समुद्र में पहुंचकर समाप्‍त हो जाता है  उसी प्रकार नारी भी अपने पति के परिवार से एकरूपता स्‍थापित कर ग्रहस्‍वामिनी बन जाती है। कालिदास जी ने उत्‍तरदायित्‍व की व्‍याख्‍या करते हुए कहा है कि राजा या सम्राट होने  से केवल उत्‍सुकता या महत्‍वाकांक्षा की शांति होती है  किन्‍तु उसके साथ जो उत्‍तरदायित्‍व आता है  वह अत्‍यन्‍त कष्‍टसाध्‍य होता है  तथा राजा को शांन्ति से नहीं बैठने देता है। ग्रह साम्राज्ञी की भी यही दशा होती है । पतिव्रता स्‍त्री अग्नितुल्‍य है।  तभी उसे सूर्य,लोकप्रिय राजा और आत्‍मत्‍यागी वीरों की श्रेणी में रखा गया है।
                     वर्तमान संदर्भ  में सुक्ष्‍मातिसुक्ष्‍म  प्रतिशत उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त महिलाऐं  ग्रहिणी के गुणों  एवं घर के स्‍वर को महत्‍व न देकर दर बदर हो नौकरी को ही सर्वस्‍व समझे तो उसमें भी उनका दोष नहीं क्‍योंकि वातावरण का असर तो होना ही है। अपने सपनों का अवश्‍य आकार दो  किन्‍तु सूर्य,चन्‍द्र धरा और आकाश के समान नारी को सौंदर्य तथा गुणों को मन से ओझल नहीं होने देना चाहिए।
          तन को चाहे नर रूप बनालो, मन में तो नारी रमी हुई है। 
अधिकार चाहे जितना ले लो, कर्त्‍तव्‍यों की कहां कमी हूई है।

 जय गोविन्‍द माधव ।                                               उघ्‍दव जोशी उज्‍जैन
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निमंत्रण पत्र की पदयात्रा

निमंत्रण पत्र की पदयात्रा
 निमंत्रण पत्र की यात्रा मानव की उत्‍पत्ति के साथ ही प्रारम्‍भ हुई और परिवर्तन के साथ निरंतर आगे बढ रही है। निमंत्रण पत्र ही वह सशक्‍त माध्‍यम है  जो हमें अपनों से परिचित कराता है। 
सामाजिक, मांगलिक, धार्मिक, राजनैतिक, साहित्यिक  या अन्‍य किसी प्रकार का आयोजन हो संबंधित सदस्‍यों को बुलाने के लिए निमंत्रण पत्र ही हमारा सहयोगी मित्र है। निमंत्रण कार्ड में विषय वस्‍तु,आयोजन का स्‍थान,दिनांक , जैसी महत्‍वपूर्ण जानकारियां उपलब्‍ध रहती है। जिसके अनुसार ही आनेवाले अतिथि अपना कार्यक्रम बनाते हैं। निमंत्रण पत्र ने अपनी कठिन से कठिन यात्रा किन परिस्थितियों  में प्रारम्‍भ की और आज वह किस पायदान पर है , उसी से जाने उसका हाल ;
मौखिक सूचना ;
    स्रष्टि के प्रारम्‍भ में मानवीय संसार सिमटा हुआ था । आवागमन के साधनों ,प्रेषण के माध्‍यमों,एवं लेखन कला का विकास नहीं हुआ था । इस कारण पहले मौखिक रूप से स्‍वयं,नाई या अन्‍य माध्‍यमों से सूचना भेजी जाती थी । सूचना सम्‍प्रेषण का माध्‍यम मौखिक  और शाब्दिक था किन्‍तु उसमें अपनत्‍व का भाव भरा होने से लोग खीचें चले आते थे ।
लिखे हुए निमंत्रण पत्र
     धीरे धीरे समाज का फैलाव होने लगा,रिश्‍तेदारियां बढने लगी, आवागमन के साधन  सुलभ होने लगे तथा शिक्षा का प्रसार भी प्रारम्‍भ हो गया । स्‍याही,कलम,और कागज का चलन प्रारंभ  हूआ । समयानुसार एक ही कागज पर राजमान राजेश्री  जोग लिखी-------------लिखकर गांव  के सभी स्‍वजनों तथा स्‍नेहीजनों  के नाम लिखकर कार्यक्रम की सूचना भेज दी जाती थी । जिस व्‍यक्ति को यह निमंत्रण भेजा जाता था वह प्रत्‍येक परिवार तक सूचना पहुचाता ही था । कूछ जातीयों में तो निमंत्रण पत्र में नामों के स्‍थान पर सकल पंच ही लिख दिया जाता था । उस समय आपसी सदभाव इतना गहरा था कि आयोजन की जानकारी मिलते ही मेहमान मेजबान समझा कर सारी व्‍यवस्‍था में हाथ बटाता था । उस समय बहुत ही कम खर्च में सभी को सूचना चली जाती थी । यदि कोई मेहमान कारण वश नहीं आ पाता तो उसके बारे में पूरी जानकारी मेजबान व्‍दारा ली जाती थी । यह थी आत्‍मीयता।
मशीन पर छपते निमंत्रण पत्र ;
      विज्ञान की प्रगति ,संचार माध्‍यमों के रूप में तार और दूरभाष के व्‍दारा सम्‍पर्क बढने लगा । प्रिटिंग मशीनों का आविष्‍कार हुआ और निमंत्रण पत्र छपने लगे । धीरे धीरे भाषा में भी निखार आया । निमंत्रण पत्रों में अब सारे गांव के बजाय एक परिवार के नाम एक पत्र में लिखे जाने लगे । इनमें संख्‍यात्‍मक व्रध्दि होने लगी । स्‍थानीय या आस पास के निमंत्रण पत्र तो हाथों हाथ और दूर के पत्र डाक के माध्‍यम से भेजे जाने लगे।
आफसेट मशीन पर छपते निमंत्रण पत्र
       समय के साथ कम्‍प्‍यूटर और आफसेट मशीनों का आविष्‍कार हुआ जिन पर छपने वाले निमंत्रण पत्रों  की सुन्‍दरता और सजावट मन को छूने लगी । थोडे समय में अधिक काम होने लगा । मंहगे कार्ड बाजार में आगये ,भाषा सरल और साहित्यिक होगई । निमंत्रण पत्रों में शेरो शायरी के कई विधाओं का सम्मिश्रण होने लगा।
निमंत्रण पत्रों को बाटने की व्‍यवस्‍था
      अब व्‍यक्तिगत रूप से निमंत्रण बाटने का चलन बढ सा गया है इसमें समय तो अधिक लगता है किन्‍तु उसका प्रभावी असर सामने वाले पर अवश्‍य गिरता है औरविशेष परिस्थितियों को छोड कर  उसे आना ही पडता है। यहां एक बात तो अवश्‍य महत्‍वपूर्ण है कि शोक पत्र तो किसी को भी किसी अन्‍य के हाथ भेज देने पर  कोई टिका टिप्‍पणी नहीं होती  किन्‍तु मांगलिक आयोजनों के कार्ड स्‍वजनों और स्‍नेहीजनों के पास कितने सम्‍मान के साथ पहुंचाया जाना है इस बात का बहुत बारीकी से ध्‍यान रखना आवश्‍यक है। अन्‍यथा उनकी नाराजगी की मार झेलना पडती है।
     पहले निमंत्रण कार्ड पतले कागज पर छपते थे जिन्‍हे जेब में रखने में बडी सुविधा होती थी किन्‍तु वर्तमान समय में आमंत्रण कार्ड लंबाई,चौडाई और मोटाई में भारी भरकम हो जाने तथा मोडने पर उसकी सुन्‍दरता का दाग लगने के डर  के कारण उसे ले जाने वाले को बडी असुविधा का सामना करना पडता है। यदि परिवार साथ हो तो आदमी महिलओं के सुपुर्द  कर देता है किन्‍तु यदि अकेला हो तो हाथ में हिलाकर ले जाने के सिवा कोई चारा नहीं बचता है। आजकल तो किसी रिश्‍तेदार के कार्यक्रम में जाने पर अपने कार्यक्रम के कार्ड वहीं लिख कर देने की परम्‍परा प्रारम्‍भ होने के साथ ही अन्‍य आस पास वालों के निम्रत्रण कार्ड भी दे दिए जाते है  जिन्‍हे सुरक्षित रूप में संबंधितों तक पहुंचाने का बोझ मन पर बना रहता है । कई बार तो नाम स्‍मरण नहीं होने की दशा में कोरे कार्ड यह कह कर दे दिये जाते हैं कि फलां फला के नाम लिख कर उन्‍हे दे देना । कई बार तो ऐसे भूल भूलैया वाले कार्ड संबंधितों तक पहुचते ही नहीं है। आजकल तो कई फोल्‍डरों वाले मंहगें कार्ड चलन में है जिनके लिऐ लोग सामने तो प्रशंसा कर देते हैं किन्‍तु बाद में कसीदा पढते हैं कि यह तो पैसे वालों का काम है । पैसों की बरबादी के सिवा कुछ नही है। आजकल निमंत्रण पत्र के उपर ही प्रीतिभोज का दिनांक समय आदि लिख दिया जाता है तो कई सज्‍जन तो लिफाफा खोलने का भी कष्‍ट नहीं करते है।
      आजकल शादी के कार्डो में बाल मनुहार,मीठी मनुहार, बाल विनय आदि कई नामों से कविता शैली में बच्‍चों की ओर से भी आने का निवेदन किया जाता है। यह अच्‍छी परम्‍परा है इससे परिवार के बच्‍चों को सम्‍मान तो मिलता ही है रिश्‍तेदारों को उनके नाम की जानकारी और अपने बच्‍चों के नाम रखने वालों को नये नये नाम मिल जाते हैं।
        शादी के निमंत्रण पत्रों में प्रीतिभोज के लिये नई नई परिभाषाऐं जुडती जा रही है। जैसे आपके आगमन तक,सुनहरी शाम से ढलती रात तक,तारों भरी छांव तक,गोधुली बेला से चांद निकलने तक ,आकाशीय छटा तक आदि आदि । स्‍वागत शब्‍दावली में विनीत,प्रतिक्षारत,उत्‍सुक नयन,राह निहारे,स्‍वागतातुर,स्‍नेहाधीन, आत्‍मीय वंदन जैसी कई नवीन शब्‍दावली का उपयोग होने लगा है। कार्यक्रमों के भी आकर्षक नाम जैसे परिणय प्रसंग,मंगल उत्‍सव,मंगल बेलाऐं,मंगल क्षणिकायें,शगुन के पल,लम्‍हे शगुन के मंगल प्रसंग आदि ।
निमंत्रण पत्रिकाओं में नवीन प्रयोग
    वैसे तो भारतीय परंपरा मे पत्रिकायें अपनी अपनी भाषा में ही छपवाई जाती है किन्‍तु अब प्रयोग के तौर पर  पत्रिका के मेटर को कई भाषाओं में अनुवादित किया जा रहा है ताकि समझने में कोई असुविधा न हो । एक परिवार ने तो निमंत्रण की सीडी तैयार कर जिसमें आयोजन की रूपरेखा और शादी के मंगल गीतों को समाविष्‍ट किया गया । इस नवीन प्रयोग से निश्चित रूप से रोचकता के साथ संगह का रूझान भी लोगों में बढेगा। इससे निमंत्रण कार्डो की रोचकता और विस्‍तारित होगी । आपके पास भी निमंत्रण काडों के संबंध में नवीनतम जानकारी हो तो शेयर करें ।
                                                                                              उघ्‍दव जोशी ,उज्‍जैन
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ढोल के साथ ढोडी पिटवा कर भी सुचना /निमत्रण दिया जाता रहा था रतलाम जिले की तहसील जावरा में आज भी यह प्रथा देखी जा सकती हे। डॉ व्यास
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सभी अपना अहम् छोड़ें अन्यथा इतिहास उन्हें माफ़ नहीं करेगा।

सावधान युवा जाग रहा हे। 
आज  सभी ओर जब युवा एक नई दिशा की और बढता दिखाई दे रहा हे, ऐसे समय पर  एक ही ढर्रे पर चलती और स्वयं को सही मानती पुरानी पीडी या पुराना स्थापित नेतृत्व  इसे स्वीकार करने के प्रति असमंजस में हे। 

पिछले चार वर्षो के अन्तराल में औदीच्य ब्राम्हण समाज के इस हिंदी भाषी क्षेत्र के इस औदीच्य बहुल क्षेत्र  में  अखिल भारतीय औदीच्य महासभा के अध्यक्ष श्री रघुनन्दन जी शर्मा के पदासीन होने के बाद से इस स्थिति में बदलाव आया हे। समाज ने कई नई उचाईयों को छुआ हे, समाज आज पुन गतिवान हुआ हे।  जाग्रति का नया इतिहास भी रचा गया हे। श्री शर्मा जी ने युवाओ और महिलाओं को भी भी मंच दिया। सभी दूर उनके नेतृत्व में समाज में बहुत कुछ अच्छा और स्मरणीय हुआ हे।
 पूर्व में  सब कहते थे की युवा पीडी समाज के कामो में रूचि नहीं लेती, उसे आगे आना चाहिए । पर आज यह युवा पीडी जब बड चड़कर भाग ले रही हे, तब हममे से ही कुछ को यह पसंद क्यों नहीं आ रहा हे। में बात कर रहा हूँ इंदौर में पिछले एक वर्ष के दोरान हुए  रचनात्मक कामों की जिन्हें उत्साही और सक्रिय युवाओं द्वारा किया गया था। उन्हें निष्पक्ष सराहा और प्रात्साहित किया जाना जाना था, और ऐसे नव कार्यो को करने वालो को प्रत्साहन पुरुस्कार स्वरुप उचित पद पर भी बैठाया जाना था  और यह सब भी होना था बिना किसी नाते रिश्तेदारी पसंद  नापसंद का विचार किये विना। पर क्या हुआ ? यह सबने देखा। इन सभी रचनात्मक कार्यक्रमों को किसी भी रूप में समाज की पत्रिका औदीच्य बन्धु में सुचना या समाचार के रूप में स्थान न मिलना भी आश्चर्यजनक लगता हे।  इसने जहाँ एक और नव युवको का मनोबल तोड़ने का प्रयत्न हुआ वहीँ  दूसरी और समाज को हानि हुई। 
बीच  बचाव के कई उपाय भी किये गए पर बीच-बचाव करने वाले अपनी निष्पक्षता सिद्ध नहीं कर पाए । इसमें भी दो मत नहीं की वरिष्ट और सक्षम पदाधिकार ''किंकर्तव्यम '' की स्तिथि में में केवल मूक दर्शक की भूमिका  अदा करते रहे हें, और आज तक भी इसी उहोपोह में हें। 
 आने वाले दिनों में समाज के एक ही दिन में दो परिचय सम्मलेन आयोजित होते दिख रहे हें। एक पक्ष जहाँ निशुल्क आयोजित कर रहा हे वही दूसरा परंपरागत। निशुल्क परिचय सम्मलेन करने का निर्णय में क्या सभी को साथ नहीं देना चाहिए?
क्या यह अहम् का प्रश्न नहीं बना दिया गया हे , यह अहम् के राक्षस और कुछ करे न करे समाज के हितो को दुधारी तलवार की तरह काट जरुर रहा हे। इसकी चरम परिणिति क्या होगी? 
पिछले अस्सी वर्षो से प्रकाशित हो रही ''औदीच्य बन्धु '' की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हें। उनका उत्तर भी किसी के पास नहीं। 
पिछले चार वर्षो के दोरान जिनकी सक्रियता ने  समाज का जितना हित किया उन्हें  इस हानी का का बोझ क्या उठाना नहीं पड़ेगा? 
अभी भी वक्त हे, इसके पूर्व की  हम सब का  इस विराध की चरम परिणती से सामना हो , कुछ किया जाये। सभी अपना अहम् छोड़ें अन्यथा इतिहास उन्हें माफ़ नहीं करेगा। युवाओं को भी संयम रख कर सर्वजनहित की भावना से अन्य पक्ष के साथ समझोता की मनस्थिति बनाना होगी और इस वैमनस्य के बीज को यही नष्ट करना होगा। 
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कुदरत का किरश्‍मा है शिशु

शिशु भगवान का रूप है जिसमें न राग व्‍देष न माया प्रपंच होती है वह तो मुस्‍कराहट बिखेर कर इर अंजान की बांहो में झुल जाने को तैयार रहता है । गर्भावस्‍था में रहते हुवे भी सभी का ध्‍यान अपनी और खीचता है। बच्‍चा कैसा होगा, किस पर जायेगा। मां की ममता,पिता का प्‍यार और परिवार का दुलार नये मेहमान के आने की राह बडी बेसब्री से देखते हैं । शिशु के जन्‍म लेते ही डाक्‍टर और नर्सो के चेहरे पर अकल्‍पनीय खुशी बिखरती है तो कल्‍पना कीजिए  माता पिता और परिवार की खुशी का पैमाना क्‍या होगा । जच्‍चा खाने  में शिशु की किलकारी  मां को बच्‍चे के भूखे होने का पिता को उसे बांहो में झुलाने  और बहना को चिकोटी काटने की याद दिलाती है । शिशु थोड ही समय में सबका चहेता बनकर अपनी मनोहारी विलक्षण आभा से सभी को एहसास कराता है कि यदि आप सब भी मेरे जैसा राग व्‍देष से दूर रहकर मन मन्दिर में भाईचारे की मूर्ति स्‍थापित कर लो तो ईश्‍वर आपके आस पास ही दिखाई देगा ।
                शिशु ,लोगों के बीच  अकेला ही चर्चा का केंन्‍द्र बिंदु रहता है । अपना पराया जो भी आता है बच्‍चे की अठखेलियों की चर्चा करता है। बच्‍चु बडा शैतान है ,दिन भर परेशान करता है,बडा तेज तर्राट है,ऐसी अनेकों दलील  देकर सारा समय बच्‍चें की प्रशंसा के कसीदे पढने में ही गुजर जाता है।
               समय ही धन है के अनुसार शिशु ही बडों को हर काम समय पर करवाने की आदत डलवाता है। जल्‍दी सोना,गहरी नींद लेना,सुबह जल्‍दी उठना जैसी क्रिया शिशु करता है बडों को भी उसकी अनुसरण करना पडता है।शिशु के दैनन्दिनी कार्यो को समय पर करना ही हमारा धर्म बन जाता है । समय पर नाश्‍ता तैयार करना,स्‍कूल छोडना,स्‍कूल बस पर जाने के लिये समय की पाबंदी आदि के कारण वह घर के बडों के पास आलस्‍य को फटकने ही नहीं देता है । शिशु के संग रहने वाला हर सदस्‍य चुस्‍त दुरूस्‍त और स्‍वस्‍थ्‍य रहता है।
              शिशु प्रयोगधर्मी होता है । बचपन की प्रव्रत्ति होती है कि  जो देखता है उसे येन केन प्रकारेण पाने की जिद करता है । तोड फोड कर वह कई नये प्रयोग के साथ कुछ अलग बनने का प्रयास करता है। वह अपने प्रयास को विकास की राह पर ले जाने के लिए बडों की डांट फटकार की भी परवाह नहीं करता है। इसलिऐ हमारा फर्ज भी बनता है कि उसे अच्‍छा वातावरण उपलब्‍ध कराना चाहिए जिससे वह अपनी रचनात्‍मक प्रतिभा को विकसित कर सके। शिशु हमें अपनी क्रियाओं से सचेत करता है कि बडों को भी नकारात्‍मक प्रव्रत्ति के स्‍थान पर सकारात्‍मक,रचनात्‍मक और स्रजनात्‍मक प्रव्रत्ति  को विकसित करना चाहिए ।
             शिशु बुढापे की लाठी बनता है । शिशु जब यौवन की पगडंडी पर कदम रखता है तो उससे माता पिता यह आशा रखते हैं कि वह उनके बुढापे का सहारा बने । किसी शायर इसके लिए अनमोल बात कही है कि  आज उंगली पकड कर मैं तुझको सैर कराउ, तू हाथ थाम कर चलना जब मैं बूढा हो जाउं। 
कुदरत के शब्‍द कोष में शिशु शब्‍द का आशय बेटा और बेटी दोनों से है क्‍यों कि उसने दोनों को एक समान अपनी रेहमत से संवारा है। आजकल लिंग भेद के कारण शिशु को शव बनाने का जो कुत्सित कार्य किया जा रहा है वह राक्षसी कार्य है और उसके दुष्‍परिणाम भी दिखाई दे रहे हैं।
          कुदरत का यही संदेश है कि शिशुवत बनों , दिल में दया रखों ,कन्‍या को अपनाओ और मानव जीवन को सुदर्शन बनाओ ।                                                                                      
उघ्‍दव जोशी उज्‍जैन
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व्‍यावहारिक जीवन में धारण करने योग्‍य संकल्‍प

औदीच्‍य ज्ञाति के परमाराध्‍य इष्‍टदेव श्री गोविन्‍द माधव प्रभु का श्री चित्र, विविध परिस्थितियों में बिखरे औदीच्‍य बन्‍धुओं को एकसूत्र में आबध्‍द करने एवं अपनी गौरवमय संस्‍क्रति के संरक्षणार्थ समाज की भावना है कि प्रभुगोविंद माधव का चित्र भारत के समस्‍त औदीच्‍य परिवारों में पूजित हो । इष्‍टदेव के नित्‍य स्‍मरण , अर्चन, वन्‍दन, तथा चित्र प्रकाशन का पुनीत लक्ष्‍य तभी शुभ फलदायी होगा जब शहरों, गांवो कस्‍बों के अन्‍दर उंच नीच के भाव तथा धनी निर्धन के बीच की दूरी समाप्‍त हो साथ ही ज्ञाति सेवा में लगे विभिन्‍न संगठन परस्‍पर सौहार्द को बढाते हुए सर्वागीण समाजोत्‍थान की दिशा में अगसर हों ।

अत हम इष्‍टदेव का स्‍मरण करते हुए निम्‍नलिखिल संकल्‍पों को अपने व्‍यावहारिक जीवन में धारण करने का व्रत लें ।

1 ; स्‍वसंस्‍क्रति अनुसार आचार विचार का पालन ।
2; ज्ञाति सेवा कार्यो में उत्‍साहयुक्‍त सहयोग ।
3; अपनी ब्रहम संस्‍क्रति अनुसार नित्य संध्‍या वंदन ।
4; अपने ज्ञाति बन्‍धुओं के सुख दुख में सदैव सहयोग।
5; परस्‍पर सौहार्द स्‍थापित करना ।
6; विवाहादि कार्यो में आडम्‍बरयुक्‍त धन प्रदर्शन तथा अपव्‍यय न करना।
7; द‍हेज लेने देने जैसी कूरीतियों से दूर रहना ।
8; नारी से सम्‍मानजनक तथा समान व्‍यवहार ।
9; शराब,धूम्रपान,एवं अखाध्‍य वस्‍तु सेवन कर्ताओं से स्‍वयं को पूर्णतया प्रथक रखना ।
जय गोविन्‍द माधव् 

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सदा स्‍मरण रखने योग्‍य बातें ।


  1. पांच रात्रि तक कमल का फुल बासी नही होता । दस रात्रि तक बिल्‍वपत्र बासी नहीं होता । ग्‍यारह रात्रि तक तुलसी दल बासी नहीं होता ।
  2.  शंकर जी को बिल्‍वपत्र,विष्‍णु भगवान को तुलसी,गणेश जी को दुर्वा  लक्ष्‍मीजी को कमल और दुर्गा को लाल फूल प्रिय हैं । 
  3.  पत्र,पुष्‍प,फल को नीचे मुख करके नहीं चढावें ,जैसे उत्‍पन्‍न होते हैं वैसे ही चढावें किन्‍तु बिल्‍वपत्र उल्‍टा करके सुधार कर चढावें 1 खाण्डित बिल्‍वपत्र वर्जित है । पान के अग्रभाग की डंडी तोडकर चढावें ।
  4. विष्‍णु को चांवल,गणेश जी को तुलसी,दुर्गा और सूर्य को बिल्‍व पत्र नहीं चढाना चाहिए । 
  5.  आरती भगवान के चरणों की बार बार ,नाभि की दो बार ,मुख की तीन बार  एवं समस्‍त अंगो की सात बार आरती उतारें ।
  6.  मेरूहीन माला या मेरू का लंघन करके माला नहीं जपनी चाहिए ।
  7.  चंदन माथे पर लगाना शोभा तो देता ही है, इससे मस्तिष्‍क हमेशा ताजा रहता है ।
  8.  जप,ध्‍यान,साधना को जितना हो सके गुप्‍त रखो । 
  9.  दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए ।
  10.  देवता का पूजन देवता बनकर करों ।
  11.  स्‍नान करके तिलक अवश्‍य लगाना चाहिए ।
  12. बडों को प्रणाम करते समय उनके दोनों पैरों को अपने बायें हाथ से छूकर प्रणाम करें ।
  13.  परिक्रमा चंडी की एक,सूर्य की सात,श्री गणेश जी की तीन,श्री हरी की चार तथा शिवजी की आधी परिक्रमा करें ।
  14.  मंत्र में भगवान की शक्ति होती है । ऐसी भावना रखने से शीघ्र ईष्‍ट सिध्दि प्राप्‍त होती है । ..............................................................................................................................
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HEALTH FOR ALL dr.vyas: घुटनेके जोड़ [knee] का रोग वर्तमान समय की बड़ी समस...



किसी भी प्राणी के जोड़ों की रचना में कई महत्वपूर्ण मांसपेशियों, हड्डियों (Bons ) उपास्थियों (कार्टिलेज) लिगामेंट्स (बाँधने  के लिए रस्सी जेसी रचनाये),तरल पदार्थ आदि की एक संरचना होती हे। जब भी इन किसी भी संरचनाओ में किसी भी प्रकार की चोट,रोग,या अन्य कारणों से परिवर्तन आता हे तब उनके काम में समस्या आती हे जो दर्द,

----     इसका प्रमुख कारण व्यक्ति स्वयं के द्वारा प्राक्रतिक जीवन चर्या से अलग हट कर मिथ्याहार-विहार अर्थात अनावश्यक खाते-पीते रहना और रहना होता हे।

इसी बात को हम यदि और विस्तार से समझना चाहते हें तो कहा  जा सकता हे की देनिक जीवनचर्या में अपनी सुविधा अनुसार परिवर्तन कर लेना जो स्वय को अच्छा और आराम देने वाला हो, इसका प्रमुख कारण होता हे।

युवा शरीर की प्राक्रतिक क्षमताएं युवावस्था----

 ----आयुर्वेदिक चिकित्सा इसका एक मात्र विकल्प हे। आयुर्वेद द्वारा यह रोग पूरी तरह से अच्छा क्या जा सकता हे।

एक कुशल आयुर्वेदिक चिकित्सक रोगी  -----    रोगी ठीक होने लगता हे।

इस दोरान कई आयुर्वेदिक ओषधियो के साथ वमन / विरेचन, स्नेहन, स्वेदन आदि की ------महारास्नादी क्वाथ/कुछ गुगल युक्त ओषधि/मूत्रल/ और अश्वगंधा आदि ओक्सिदेन्ट्स /निशोथ /और अरंड तेल जेसे विरेचको के माध्यम से आश्चर्यजनक रूप से ठीक किया जा सकता हे।

आयुर्वेदिक चिकित्सा के प्रति कई लोगों को यह भ्रान्ति हे की इसमें परहेज अधिक करना होता हे। यह सच नहीं हे।



अधिकतर रोगी यह जानना चाहते हे की क्या खाए क्या न खाए,क्या करें क्या न करें तो इसका उत्तर हे

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HEALTH FOR ALL dr.vyas: घुटनेके जोड़ [knee] का रोग वर्तमान समय की बड़ी समस...:किसी भी प्राणी के

क्‍या मान सकोगे ---- बेटों को बेटी

    संत की वाणी प्रभावहीन होगई,उपदेशकों के उपदेश बेअसर होगए,लेखकों की कलम घिस गई बेटी की गाथा लिखते लिखते ,किन्‍तु सब बेअसर । जमाना भी कहते नहीं थक रहा है कि बेटी को बेटा मानों, बहू को बेटी समझो किन्‍तु व्‍यवहार में सब शुन्‍य । अब समझ लो वह समय सामने खडा है जब  बेटों को ही बेटी कहकर पुकारना पडेगा । बेटी और बेटों के बीच जन्‍म दर की खाई इतनी  अधिक गहराती जा रही है कि निकट समय में बेटे ही बेटे इस जमीं पर दौड लगाते दिखेगें। यह कुल दीपक धीरे धीरे जवानी के हायवे पर मेराथन दौड लगाते दिखेगे। 

        आज नारी ही नारी की दुश्‍मन होती जा रही है। वह तो बेटी को जन्‍म देना चाहती ही नहीं किन्‍तु उसी परिवार के मुछ मरोडने वाले लोग भी भिगी बिल्‍ली की तरह महिलाओं के सामने दुम हिलाते नजर आते हैं। बेटी का जन्‍म देने के जो हास्‍यास्‍पद कारण बतायें जा रहे हैं जरा उनकी बानगी लेवे।    

1- कहते हैं पराये धन की इच्‍छा कभी नहीं करना चाहिए फिर बेटी भी तो पराया धन है।
 2-बेटी पिता परिवार के दिये संस्‍कारों से ससुराल परिवार को सुख दे यह मां बाप कैसे सहन कर सकते हैं ।
 3- बेटी के जन्‍म लेते ही चिन्‍ता की लकीरे खींच जाती है और भविष्‍य में उसके लिये धन जुटाने की व्‍यवस्‍था की मुसीबत । इसलिए बेटी का न आना की कल्‍याणकारी माना जा रहा है।
4- मां बाप बेटी को उच्‍च शिक्षा देकर नौकरी लगवाऐं और उसका पूरा लाभ ससुराल वाले ले यह बात मां बाप के लिये असहनीय है।
5- बालिग होने तक बेटी अपने पिता के नाम से जानी जाती है  और शादी होते ही इतने वर्षो की मेहनत पर पानी फेर उसके लिऐ पति ही सर्व सुखदाता  हो जाता है । ऐसे और भी अनेक कारण है जो बच्‍चीयों को धरा पर आने में रूकावट बन रहे है।
       जब बेटी के जन्‍म पर इतनी आपत्ति  तो अब हम बेटों की भी सुध ले लें जिनके जन्‍म पर मां बाप  और परिवारजन कितनी मान मन्‍नत करते है और जन्‍म होते ही अवर्णनातीत खुशी मनाते हैं। क्‍यों कि बेटा वंशावली नाम की पिक्‍चर का डायरेक्‍टर माना जाता है । बालिग होने  तक उसकी कोई चिंता नहीं,कोई रोक टोक नहीं चाहे जहां भटके,पढे तो  मर्जी न पढे तो कोई दवाब नहीं। कई बेटे तो मां बाप की कमाई पर ही गुलछर्रे उडाना अपना अधिकार समझते हैं । बेटे को बुढापे की लाठी भी कहा जाता है । बेटे का महत्‍व इसलिए भी अधिक है कि वह बाप की संपत्ति का अधिकारी और रक्षक है। बेटा दिवंगत  पिता की मिटटी को भी सुधारन कर मोक्ष का साधक बनता है। यह तो जन्‍म लेने और देने वाले पिता पुत्र की सत्‍य कथा है किन्‍तु  जो मां बाप बिना औलाद के है वे भी गोदी भरने की आशा में लडके को ही गोद लेने की अर्जी लगाते है । यदि बेटा इतना फलदायक है तो फिर बेटे को ही बेटी मानना शुरू कर देना चाहिए। पर यह भूता न भविष्‍यति होगा। बच्‍ची का गर्भपात करा कर चाहे जितना पाप कमालो  पर उसकी सशक्‍त आवाज सर पर चढ कर बोलेगी। उसके जन्‍म पर कोई डाका नहीं डाल सकता ।
       भारतीय संस्‍क्रति में चार आश्रम के मानक तय किए गये हैं।जिनमें ग्रहस्‍थाश्रम को अधिक महत्‍व दिया गया है क्‍योकि यही आश्रम परिवार को व्‍यवस्थित कर अपनी पाठशाला में संस्‍कार,संस्‍क्रति,अनुशासर अतिथि सेवा सत्‍कार की शिक्षा भी देता है। जीवन में सुख सौंदर्य भी परिवार की देन है और यह सब होता है नर और नारी के सम्मिलित प्रयास से। यदि आज की परिस्थिति अनुसार बच्चियां जन्‍म ही नहीं लेंगी तो परिवार नामकी संस्‍था समाप्‍त होकर बेटे पागलों की तरह चारों तरफ भटकेगें और अंत में पागलखाना उनकी शरणस्‍थली होगा और मां बाप का कुल दीपक किसी काम का न होकर सबके लिऐ मुसीबत बन जायगा ।
      सहयोग की साधना,ईश्‍वर की आराधना और आत्मिक प्रेम की धरोहर  को बचाने के लिए ही ग्रहस्‍थश्रम की कल्‍पना की गई है। जिसमें हर सदस्‍य की नकेल एक दूसरे के हाथ में देकर उन्‍हे शिक्षति करने का काम एक दूसरे को सोंपा गया है।  नारी की आरी नर के सर पर चढे भूत को बखूबी उतारना जानती है । नारी के बिना  घर को भूत का डेरा या शमशान तक कहा गया है। आज तो परिवार के महत्‍व को समझने वाले कई समाज कन्‍या के घर वालों को मुहमांगा धन देकर बहू ला रहे हैं। और अधिकांश बेटे तो पत्‍नी की तलाश करते करते आधी उम्र तक के हो गये हैं। अधिक उम्र की परिपक्‍व स्‍वभाव वाली बहू का तो ससूराल में मन ही नहीं लगता और अपनी ग्रहस्‍थी अलग बसाने में प्रोढ पति भी उसका साथ देता है। आज बढती हूई व्रध्‍दाश्रमों की संख्‍या भी इसकी देन है। इसलिए प्रक्रति के नियमों पर चलो अपनी अकल लगा कर मुसीबत मत पैदा करों । स्‍वयं महिलाऐ और अपने पति के सुरक्षित भविष्‍य को देखना चाहती है तो समझ लो कि बेटी एक बार बेटे का फर्ज निभा सकती है किन्‍तु बेटा कभी भी बेटी की जगह नही ले सकता ।  इसलिए सबसे निवेदन है कि
       कन्‍या का न गर्भपात कराओ,उसे धरा पर आने दो। यदि सुधारना है बुढापा तो बेटे को ग्रहस्‍थी बसाने दो।
                                                                                                                       उघ्‍दव जोशी उज्‍जैन ................................................................................................................................

इस साईट पर उपलब्ध लेखों में विचार के लिए लेखक/प्रस्तुतकर्ता स्वयं जिम्मेदार हे| इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

कर्त्‍तव्‍य और अधिकार

मानव शरीर का प्रत्‍येक अंग जेंसे अपने कर्त्‍तव्‍य का निष्‍पादन  करता है तो शरीर में बल,उर्जा,ताजगी और सौंदर्य बने रहते हैं । यदि किसी अंग में शिथिलता आ जाती है तो उसका प्रतिफल पूरे शरीर को भोगना पडता है। ठीक इसी प्रकार एक मानव का दूसरे मानव के प्रति अपने कर्त्‍तव्‍यों का निर्वहन करना परिवार,समाज और राष्‍ट्र को बल प्रदान करता है । कर्त्‍तव्‍य का पालन करना मानव को अधिकार प्राप्‍त करनें का अधिकारी बना देता है किन्‍तु यदि कोई बगैर कर्त्‍तव्‍य का पालन किए अधिकार प्राप्ति की कामना करता है तो यह अनुचित ही नहीं अविवेकपूर्ण भी होगा । कर्त्‍तव्‍य बोध और अधिकार बोध दोनों अपनी अपनी भूमिकाओं में अलग अलग है। फिर भी दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। बगैर पानी के जिस प्रकार भोजन का पाचन नहीं हो सकता ठीक उसी तरह कर्त्‍तव्‍य की प्‍यास के बिना अधिकार की भूख का कोई अर्थ नहीं क्‍योंकि अधिकारों के पाचन की क्रिया में कर्त्‍तव्‍य के जल की उपस्थिति सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण है । पहले हम अपने पराये स्‍वजनों स्‍नेहीजनों के साथ मानवीय कर्त्‍तव्‍यों का निर्वहन करेगें तभी अपने अधिकारों की मिठास का आनन्‍द पा सकेगें । मनुष्‍य और पशु के अन्‍तर को बताते एक पश्चिमी विव्‍दान के उदगार हैं कि पशु भी जानता है और मनुष्‍य भी जानता है किन्‍तु पशु यह नहीं जानता की वह जानता है ,जबकि मनुष्‍य यह जानता है कि वह जानता है।  संस्‍कुत सुभाषित में बताया गया है कि भोजन,नींद,भय और प्रजनन की प्रव्रत्ति पशुओं और मनुष्‍य में समान रूप से पायी जाती है किन्‍तु एक धर्म तत्‍व मनुष्‍य में अधिक होता है।
            कर्त्‍तव्‍य बोध हमें दूसरों के लिये जीना सीखाता है एवं अधिकार बोध स्‍वयं की स्‍वार्थ पूर्ति के लिये प्रेरित करता है। स्‍वामी विवेकानन्‍द कहते हैं कि  निस्‍वार्थ भाव ही धर्म की कसौटी है जो जितना अधिक निस्‍वार्थी होगा वह उतना ही आध्‍यात्मिक  और शिव के समीप होगा । किन्‍तु स्‍वार्थ का चोला  पहर कर धर्म का स्‍वांग रचाता है वह आध्‍यात्मिकता और शिवत्‍व को कैसे धारण कर सकता है । आये दिन हम देख रहे हैं कि धरना,जाम,प्रदर्शन और रैली के व्‍दारा हर आदमी अधिकार की मांग में मशगुल है और अपने कर्त्‍तव्‍य का पालन करने में अरूचि और शिथिलता अपनाये हुवे है। यदि मानव स्‍वयमेव समर्पण भाव से अपने कार्यस्‍थल पर जैसी भी परिस्थिति हो ,कर्त्‍तव्‍यों का पालन करें तो उसके अधिकारों की प्राप्ति के मा्र्ग में कोई बाधा नहीं होगी ।
           यदि देश का हर व्‍यक्ति कर्त्‍तव्‍य पालन को सर्वोच्‍य प्राथमिकता दे तो परिवार,समाज और देश अपनन्‍त की महक से सराबोर होगा । अपने कर्त्‍तव्‍य के पालन में ही जीवन का सुख और सार्थकता है । यह हमारी कर्म निष्‍ठा को प्रकट कर हमें सच्‍चे अर्थो में मनुष्‍य बनाता है । जिस देश में जितने अधिक मनुष्‍य अपने कर्त्‍तव्‍यों का पालन करते है, वह देश उतना ही सम्‍पन्‍न और मजबूत होता है ।
            कर्त्‍तव्‍य का फल कहने से नहीं करने से मिलता है ,अधिकारों का कमल भी जीवन में तभी खिलता है।                
      आओ हम कर्त्‍तव्‍य के हल से अधिकरों के बीत बोकर सुख की लहलहाती फसल पैदा कर परिवार समाज और देश को धन्‍य करें ।

                                                                                                                उघ्‍दव जोशी उज्‍जैन
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कतरने -वैवाहिक विज्ञापन -अक्तूबर 2012

कतरने -वैवाहिक विज्ञापन औदीच्य बन्धु पत्र अक्तूबर 2012 से
प्रकाशित 10/10/2012


इस माह से वैवाहिक विज्ञापनों के प्रति पाठको की अधिक रूचि के कारण इस प्रकार की कतराने भी प्रकाशित की जा रही हें। इस बारे में आपकी टिप्पणी  की प्रतीक्षा हे। 


 इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

मूल से सूद ज्‍यादा प्‍यारा !


मूल से सूद के रूप में अतिरिक्‍त कमाई कर व्‍यक्ति अपनी भौतिकता में वृद्धी के साथ स्‍वयं को सम्‍पन्‍न बनाता है और इस आर्थिक प्रेम के कारण वह संवेदना,सहिष्‍णुता,सरलता, सेवा को मन के दरिया में डूबोकर अहंकार व स्‍वार्थ के जहाज  पर अकेला ही करता है । 
अब हम मूल के उस सूद की चर्चा करेगें जिसके व्‍दारा दादा दादी को अपनी बाल सुलभता की पतवार से पोता और नाना नानी को अपनी खिलखिलाहट से नाती नौका बन कर आनन्‍द की सैर कराते हैं ।
बेटा बेटी अपने माता पिता को उनकी यौवनावस्‍था तक हम सफर समझते है इसके बाद वे अपने हम सफर का हाथ पकड कर ऐसे गुम होते हैं कि उनके पास फिर माता पिता के लिए समय का अभाव हो जाता है। 
वे अपने को अकेला महसूस करने लगते हैं किन्‍तु परमात्‍मा किसी को भी अकेला नहीं रहने देता है । वह अपने अपने तरीके से सब पर प्रेम और आनंद की वर्षा करता है और साल दो साल में उन्‍हे पोता और नाती के रूप में सूद मिल जाता है और वे मूल को भुल कर सूद में रम जाते हैं । यही सूद उनकी आयु में वृध्दि और आनंद की सम्रध्दि करता है । बच्‍चे भी भगवान के समान भाव के भूखे होकर दादा दादी नाना नानी के पास सौ फीसदी सुरक्षित महसूस करते है। इसमें एक फायदा और हो जाता है कि सूद जहां होगा वहां मूल निश्चित रूप से होगा ही। तीन हठ याने राज हट,बाल हट और स्‍त्री हट से अपनी बात मनवाने में किसी भी सीमा तक जा सकते है। आजकल राज हट तो रही नहीं बाल हट की पूर्ति दादा नाना के पाले में चली जाती है और स्‍त्री हठ की पूर्ति पति की जिम्‍मेदारी होती है। भारतीस सभ्‍यता और संक्रति की सबसे बडी देन है कि वह बुढापे को कभी बिगडने नहीं देती है1 जबकि पश्चिम में बुढापे का जहाज डूब कर ही दम लेता है। इसीलिए बच्‍चों के बारे में कहा भी गया है्
 नन्‍हे हाथ पतवार थाम , भविष्‍य की लेगें परीक्षा । यही पथिक बन नापेगें कल की दुनिया का नक्षा ।
सूद के रूप  में बच्‍चों का महत्‍व तो दादा दादी नाना नानी ने जाना ही है किन्‍तु बहुराष्‍टीय कम्‍पनियों ने भी टेलीविजन  और अखबारों के माध्‍यम से बच्‍चों के बीच अपने उत्‍पादों की जानकारी परोस कर लाळा का माध्‍यम बना लिया है।जैसे धारा वनस्‍पति के विज्ञापन में घर से रूठा हुआ बच्‍चा घर जलेबी बनी है यह जानकर तुरन्‍त घर आ जाता है।
मूल से सूद इसीलिए ज्‍यादा प्‍यारा होता है कि वह कमाई का अतिरिक्‍त जरिया है । इसी प्रकार यही सूद बुढापे में लकडी का सहारा बन कर अपने शैशव को यौवन के पथ पर विकसित करने का वृद्धावस्‍था को सहारा बनाता है।
बुढापे को सुखी बनाना हो तो सूद के पास ज्‍यादा रहो मूल की सुनो उसे सलाह मत दो ।
उघ्‍दव जोशी उज्‍जैन

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